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शनिवार, 06 अगस्त, 2005 को 19:02 GMT तक के समाचार
 
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यह नागलोक है, सचमुच का नागलोक
 

 
 
कोबरा सांप
इस इलाक़े में सांपो की 70 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर क्षेत्र में बसे फरसाबहार गाँव का नाम ही है 'नागलोक'.

नागलोक के नाम से मशहूर जशपुर ज़िले के इस गाँव और आसपास के एक बड़े हिस्से में बरसात का मौसम मौत का पैगाम लेकर आता है.

हर साल बारिश शुरु होते ही विषैले सांपों का कहर पूरे जशपुर में बरपता है और सैकड़ों लोग इनका शिकार हो जाते हैं.

आंकड़ों की मानें तो अकेले 'नागलोक' और उसके आस-पास के गांवों में पिछले 10 सालों में लगभग 900 लोगों की मौत सांप काटने से हो गई है.

अब तो हालत ये है कि जशपुर के साथ-साथ बिलासपुर, कोरबा और सरगुजा के इलाके में भी सांपों के काटने से होने वाली मौतों में वृद्धि हो रही है.

पिछले एक पखवाड़े में ही इन इलाकों में लगभग 50 लोगों की मौत सांप काटने से हो गई है.

आँकड़े का खेल

नागलोक के सांपों पर लंबे समय से शोध कर रहे अभय खाखा कहते हैं,"सांपों के काटने से होने वाली मौत का एक बड़ा आँकड़ा घने जंगलों में ही दफ़न हो जाता है. अगर इतने लोग किसी दूसरी आपदा में मौत के शिकार हो जाते, तो देश भर में हंगामा मच जाता. लेकिन इतने लोगों की मौत राजनीतिज्ञों के लिए भी कोई मुद्दा नहीं बन पाती."

 सांपों के काटने से होने वाली मौत का एक बड़ा आँकड़ा घने जंगलों में ही दफ़न हो जाता है. अगर इतने लोग किसी दूसरी आपदा में मौत के शिकार हो जाते, तो देश भर में हंगामा मच जाता
 
अभय खाखा, शोधकर्ता

अभय का दावा है कि सांपों के काटने से जो मौत होती है, वो अगर गाँव-जंगल की सरहद लाँघ कर बाहर आ भी जाए तो राज्य के सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है कि पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट में यह बताया जा सके कि मौत किस ज़हर से हुई है.

यही कारण है कि सर्पदंश से होने वाली अधिकांश मौतों को "अज्ञात ज़हर से मौत" घोषित कर दिया जाता है और सर्पदंश से होने वाली मौतों की संख्या सरकारी आंकड़ो में एकदम कम नज़र आती है.

ऐसे में अधिकांश मामलों में सर्पदंश से होने वाली मौत के बाद परिजनों को मुआवज़ा देने से भी सरकार बच जाती है.

ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए मुआवजे की यह रक़म 50 हज़ार रुपए है.

बढ़ रहे हैं सांप

नागलोक और उससे लगे इलाके में सांपों की 70 से ज़्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें कोबरा की चार और करैत की तीन अत्यंत विषैली प्रजातियाँ भी शामिल हैं.

नागलोक
पिछले 10 साल में लगभग 900 लोग शिकार हुए हैं सर्पदंश के

समशीतोष्ण जलवायु और यहां की भुरभुरी मिट्टी सांपों के अनुकूल है, यही कारण है कि इस इलाके में सांपों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

वहीं दूसरी ओर सांपों से बचने के सरकारी उपायों में लगातार कमी आ रही है.

इस इलाक़े में सांपों को पकड़ कर जंगल में छोड़ने और लोगों में जागरुकता पैदा करने के लिए विशेष अभियान चलाने वाली स्वयंसेवी संस्था जनजातीय ग्रामीण विकास समिति के अध्यक्ष डॉ. अजय शर्मा सरकारी प्रयासों को महज़ खानापूर्ति बताते हैं.

शर्मा कहते हैं,"सरकार को सांपों से बचाव के लिए जो उपाय करने चाहिए थे, उसके बजाय वह सर्पदंश से मरने वालों को मुआवजा दे कर अपना पल्ला झाड़ लेती है. सरकार अगर इस इलाके को लेकर ठोस कार्य योजना बनाए तो लोगों को रोजगार भी मिलेगा और लोग सर्पदंश का शिकार होने से भी बचेंगे."

योजनाएँ

हालाँकि पिछली सरकार ने नागलोक में स्नेक पार्क यानी सर्प उद्यान बनाने की घोषणा की थी लेकिन मामला फाइलों में ही उलझ कर रह गया.

 छोटे स्तर पर सर्पदंश से बचानेवाली दवाएँ रख पाना मुश्किल है और पीड़ित के आने पर ही उसकी ख़रीद की जाती है
 
डॉक्टर कृष्णमूर्ति, स्वास्थ्य मंत्री

नई सरकार के पास भी नागलोक में म्यूज़ियम बनाने से लेकर करैत के एंटी स्नेक वेनम बनाने तक की कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं हैं लेकिन हालत तो ये है कि सरकार के दावे के विपरीत राज्य के अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में एंटी स्नेक वेनम का भी कहीं अता-पता नहीं है.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी कहते हैं," छोटे स्तर पर इसको रख पाना मुश्किल है और पीड़ित के आने पर ही उसकी ख़रीद की जाती है. लेकिन फिर भी हमारी कोशिश है कि ज़्यादा से ज़्यादा स्वास्थ्य केंद्रों पर यह उपलब्ध हो."

झाड़फूँक

सांपों के काटने पर अभी भी लोग झाड़फूँक में ही अधिक विश्वास करते हैं.

झाड़फूँक का जब कोई असर नहीं दिखता तब जा कर वे अस्पताल पहुंचते हैं लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है.

सरकार के सर्पदंश से बचाव के अभियान भी केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित हैं.

 जिन ग्रामीण इलाकों में न डॉक्टर हैं और ना ही दवाइयां, वहाँ इन वैद्यों के अलावा कोई चारा नहीं है
 
डॉक्टर पंकज अवधिया

अस्पताल में बोर्ड लगाने और कुछ कस्बों में पर्चा बांटने के अलावा गांवों में सरकार की ओर से अब तक कोई विशेष काम नहीं किया गया है.

जबकि इस इलाके के हर दूसरे गांव में तंत्र-मंत्र के सहारे सांप का ज़हर उतारने का दावा करने वाले बैगा मौज़ूद हैं, जिनके जादू-टोने पर ग्रामीणों की ज़बरदस्त आस्था और विश्वास है.

दूसरी ओर, पारंपरिक चिकित्सा करने वाले वैद्यों का दावा है कि सर्पदंश से पीड़ित लोगों के मामले में उनका इलाज काफ़ी कारगर है.

छत्तीसगढ़ की वनौषधियों पर दस हज़ार से ज़्यादा लेख लिखने वाले वनस्पति विज्ञानी डॉक्टर पंकज अवधिया कहते हैं,"जिन ग्रामीण इलाकों में न डॉक्टर हैं और ना ही दवाइयां, वहाँ इन वैद्यों के अलावा कोई चारा नहीं है.

डॉक्टर अवधिया के अनुसार अफ़सोस की बात ये है कि देश में अब भी सर्पदंश के मामले में इनके उपचार को मान्यता नहीं मिल पायी है. सरकार अगर इन्हें संगठित करे तो राज्य में सांप से होने वाली मौतों पर क़ाबू पाने में मदद मिलेगी.

 
 
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