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रविवार, 14 अगस्त, 2005 को 11:31 GMT तक के समाचार
 
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बाड़ कहीँ बाँट न दे घर-परिवार
 

 
 
सीमा पर बाड़
बाड़ से लोगों के बंट जाने का ख़तरा है
पूर्वोत्तर भारत के काफी भारतीयों के लिए इस बार स्वतंत्रता दिवस काफी दर्द भरा होगा.

पूरे पूर्वोत्तर भारत में सीमा पर बाड़ लगाने का काम तेज़ी से चल रहा है. पर जम्मू कश्‍मीर के विपरीत इन इलाकों में सीमा पर घनी बस्ती रहती है.

वर्ष 1975 के भारत बांग्लादेश समझौते के अनुसार कोई भी देश सीमा से 150 मीटर की दूरी तक बाड़ नहीं लगा सकता.

पर भारत सरकार के बाड़ लगाने के फैसले से अकेले त्रिपुरा में ही कई लाख लोगों के बाड़ से बाहर रह जाने का ख़तरा मंडरा रहा है.

हज़ारों लोग बाड़ के बाहर

त्रिपुरा की बांग्लादेश के साथ 856 किलोमीटर लंबी सीमा है. त्रिपुरा की सरकार के अनुसार अब तक 352 किलोमीटर सीमा पर बाड़ लगाने का काम पूरा हो चुका है जिसके तहत 7123 परिवारों यानि लगभग 40 हज़ार लोगों के घर बाड़ के उस पार रह गए हैं.

 पिछली छह जून को ‍शिवराज पाटिल से मिलकर हमने केंद्र से इन 7123 परिवारों के पुनर्वास के लिए 93 करोड़ रूपए की मांग की है लेकिन केंद्र के पास ऐसे परिवारों के पुनर्वास के लिए कोई योजना नहीं है
 
मुख्यमंत्री मानिक सरकार

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार कहते हैं, "पिछली छह जून को ‍शिवराज पाटिल से मिलकर हमने केंद्र से इन 7123 परिवारों के पुनर्वास के लिए 93 करोड़ रूपए की मांग की है लेकिन केंद्र के पास ऐसे परिवारों के पुनर्वास के लिए कोई योजना नहीं है".

"सिर्फ त्रिपुरा में ही नहीं पश्चिम बंगाल में भी ऐसे कई गांव हैं जहां पूरा का पूरा गांव बाड़ के उस पार रह गया है".

त्रिपुरा की ‍स्‍थिति और भी विचित्र है. यहां तो कई शहर भी ठीक सीमा पर बसे हुए हैं. यहां स्कूल, बैंक, सरकारी दफतर, यहां तक की उत्तरी त्रिपुरा जिले के मुख्यालय कैलाश शहर का जिलाधीश कार्यालय भी बाड़ के उस पार चला जाएगा यदि इस बारे में बांग्लादेश से भारत की बातचीत सफल नहीं होती है.

मानिक सरकार
मुख्यमंत्री कहते हैं केंद्र से कोई मदद नहीं मिली

इन्ही सब कारणों से स्थानीय लोगों ने कई जगहों पर बाड़ लगाने का काम रूकवा दिया है. वे कहते हैं, "क़ानून तो सिर्फ 150 मीटर भीतर बाड़ लगाने का है पर कई जगहों पर यह 500 मीटर तक अंदर है इससे हमारी काफी उपजाऊ जमीन बाड़ के उस पार रह गई है".

त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से लगभग 50 किमी दूर कुलुबाड़ी गांव के रोशन अली का घर भी बाड़ के उस पार रह गया है.

दबाव

वे कहते हैं, "बीएसएफ़ हम पर दबाव डाल रही है कि हम अपना घर नई जगह बना लें. अगर हम अपना घर नई जगह बना भी लेते हैं पर अब मेरी फ़सल की कोई सुरक्षा नहीं है. चार बजे के बाद बीएसएफ़ वाले दरवाज़ा बंद कर देते हैं. साहब पता नहीं अब मैं अपने बच्चे कैसे पालूंगा".

 बीएसएफ़ हम पर दबाव डाल रही है कि हम अपना घर नई जगह बना लें. अगर हम अपना घर नई जगह बना भी लेते हैं पर अब मेरी फ़सल की कोई सुरक्षा नहीं है. चार बजे के बाद बीएसएफ़ वाले दरवाज़ा बंद कर देते हैं. साहब पता नहीं अब मैं अपने बच्चे कैसे पालूंगा
 
रोशन अली

इस समय दिन के करीब 11 बजे थे हम बाड़ की एक ओर थे और रोशन अली दूसरी ओर. इतने में हमें बीएसएफ़ के कुछ जवान आते हुए दिखाई दिए उन्होंने हमें रोशन अली और उसके घर का चित्र लेने से यह कहते हुए रोका कि हमारे पास सीमा पर चित्र लेने की विशेष अनुमति नहीं है.

बीएसएफ़ के सिख जवानों पर मेरी टूटी फूटी पंजाबी का कोई असर न होता देख रोशन अली ने मुझसे बांग्ला में कहा, "अपने ही देश में परदेशी हो गए भाईसाहब. आप सोचिए ये हमारे साथ कैसा बर्ताव करते होंगे".

त्रिपुरा भारत के विभाजन से सर्वाधिक बुरी तरह प्रभावित प्रदेशों में से एक है. पूरा त्रिपुरा राज्य तीन दिशाओं में बांग्लादेश से घिरा हुआ है. इसकी थोड़ी सी सीमा असम से लगती है पर अगरतला से असम की राजधानी गौहाटी पहुंचने में भी 24 घंटे लग जाते हैं. दिल्ली तो अभी बहुत दूर है.

कुलुबाड़ी गांव से बाहर आते आते रोशन अली के आठ साल के बेटे सोनामोनी से मुलाकात हुई. मैंने पूछा 15 अगस्त कैसे मनाओगे? उसने काफी सोचकर जवाब दिया, "स्कूल में झंडा तो बहुत जल्दी फहरता है पता नहीं तब तक बीएसएफ़ वाले गेट खोलेंगे या नहीं".

 
 
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