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गुरुवार, 04 मई, 2006 को 17:00 GMT तक के समाचार
 
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प्रमोद महाजन के बाद...
 

 
 
प्रमोद महाजन की विदाई
प्रमोद महाजन पार्टी में ख़ासे लोकप्रिय थे
वो 2004 का मई का तपता महीना था. चौदहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम आ रहे थे. जितने भी परिणाम आ गए थे उनसे तय हो गया था कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार हो गई है.

ऐसे में जबकि भाजपा का हर छोटा-बड़ा नेता मीडिया से कतरा रहा था. प्रमोद महाजन बीबीसी के स्टूडियो में आए. चेहरे पर निराशा तो थी लेकिन हिम्मत जवाब दे गई हो, ऐसा भी नहीं लगता था.

औपचारिक साक्षात्कार ख़त्म होने के बाद हमने पूछा कि क्या हुआ, तो तपाक से बोले, "सफलता की कई माँ होती हैं लेकिन असफलता का बाप एक ही होता है. और इस बार वो बाप मैं हूँ. चलिए वो भी स्वीकार है."

ये प्रमोद महाजन की साफ़गोई थी, उनका राजनीतिक पुरुषार्थ था, उनकी ऐसी राजनीतिक कमाई थी जो उन्हें न तो विरासत में मिली थी और न उस चमत्कार से जिसे लोग क़िस्मत कहते हैं.

वो उनका अपना हासिल किया हुआ था और भाजपा को उनके जैसा एक नेता भी बहुत दिनों बाद हासिल हआ था.

प्रमोद महाजन के रूप में एक ऐसा नेता चला गया है जो वाकचातुर्य में अटलबिहारी वाजपेयी का शिष्य था और सांगठनिक गुणों में लालकृष्ण आडवाणी का.

लेकिन राजनीतिक कुटिलता और चालाकी में वे अपने इन गुरुओं से कहीं आगे थे और इसीलिए वे अपने समकालीनों के लिए ईर्ष्या के पात्र भी थे.

'लक्ष्मण'

जिस समय वाजपेयी अपने मन से अपनी पारी ख़त्म घोषित कर चुके हैं और आडवाणी बेमन मैदान से बाहर हो गए हैं, उस समय दोनों नेताओं की जगह भरने के लिए पार्टी को एक ऐसे नेता की ज़रुरत थी जो दो रिक्त स्थानों को एक साथ भर सके.

ऐसा कह देना अतिशयोक्तिपूर्ण होगा कि प्रमोद महाजन होते तो दोनों की जगह भर ही लेते लेकिन उनके भीतर एक ऐसे नेता को देखा जा सकता था जो भविष्य के नेता के रूप में तैयार हो रहा था.

अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रमोद महाजन को भाजपा के रजत जयंती समारोह में जब पार्टी का 'लक्ष्मण' कहा था तो वाजपेयी पूरी तरह चैतन्य थे. वे जानकर कह रहे थे कि वे क्या कह रहे हैं और क्यों कह रहे हैं.

तब उन्होंने आडवाणी को 'राम' बताया था और वे तब ये भी जानते थे कि संघ परिवार इस राम को वनवास दे चुका है.

प्रमोद महाजन एक ऐसे नेता थे जिनके भीतर धीरज की कोई कमी नहीं थी. वह संभवतः जानते थे कि भविष्य उनका है और इसलिए उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में एकाधिक बार कहा कि 2009 में पार्टी को एक नेता की ज़रूरत होगी.

हालाँकि उन्होंने यह कहने की भूल फिर भी नहीं की, कि वो नेता वे ख़ुद ही होंगे. लेकिन निहितार्थ और कुछ था भी नहीं.

जब उमा भारती बाहर जा चुकी हों तब राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी के अलावा पार्टी में कोई नेता है भी नहीं जिसका कोई जनाधार दिखता हो. लेकिन इन दोनों नेताओं की स्वीकार्यता की अपनी सीमाएँ हैं.

कहने वाले कहते रहे कि जो ख़ुद लोकसभा के दो चुनाव हार चुका हो, उसका जनाधार कैसा लेकिन राजनीति में चुनाव हारना-जीतना ही जनाधार का पैमाना नहीं होता. जिन्होंने चुनाव प्रचार करते हुए प्रमोद महाजन को देखा हो वे इसका अर्थ जानते होंगे.

इन मायनों में जनाधार सुषमा स्वराज का भी है लेकिन सुषमा स्वराज में संगठन को साधने की वो क्षमता अनुपस्थित है जो प्रमोद महाजन को उनकी पीढ़ी में एक पायदान आगे का नेता बनाती थी.

सबसे आगे

वैसे प्रमोद महाजन कई और मामलों में अपने समकालीनों से बहुत आगे थे. अपनी पार्टी में भी और दूसरी पार्टियों में भी.

एक स्कूल शिक्षक से संघ में आकर राजनीति शुरू करने वाले प्रमोद महाजन को वाजपेयी ने आगे बढ़ाया. 1980 के दशक में वे वाजपेयी के प्रिय पात्रों में थे तो 1990 में वे आडवाणी जी के क़रीबी हो गए.

भाजपा के इतिहास में ऐसे उदाहरण कम ही हैं कि कोई व्यक्ति वाजपेयी और आडवाणी नाम के दो नावों में एक साथ सवार होकर भी मँझधार में नहीं गिर गया.

तीन दशकों तक पार्टी के लिए चंदा उगाहने वाले प्रमोद महाजन ने यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं दिखाई कि वे पार्टी के लिए पैसा माँगते हैं.

उन्हें पत्रकारों को भी ये बताने में कोई संकोच नहीं हुआ कि कैसे उनकी पार्टी के कथित बड़े नेता भी संसाधन शून्य हैं लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने पार्टी से कहा कि वे अब चंदा नहीं उगाहना चाहते और जैसा कि वे बताते रहे कि पार्टी ने इसे स्वीकार भी किया.

वह एक ऐसे आयोजक थे जिनके होने भर से साधारण भी भव्य हो जाता था. चाहे वो आडवाणी का 'भारत उदय' हो या 'इंडिया शाइनिंग' हो या फिर पार्टी का रजत जयंती समारोह.

ये और बात है कि 'भारत उदय' में सूचना तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल को जनता ने स्वीकार नहीं किया और पार्टी को मुँह की खानी पड़ी लेकिन इसे भी प्रमोद महाजन ने सहज रूप से स्वीकार किया. और तभी तो उन्होंने कहा था कि वो असफलता का बाप बनने को तैयार हैं.

एनडीए सरकार के कार्यकाल में सबने देखा कि वह ममता बैनर्जी से लेकर जयललिता तक और सोमनाथ चटर्जी से लेकर लालू प्रसाद यादव तक किस तरह सबको साधे रख सकते थे.

और एक बार जब जयललिता ने उनसे यह कहकर मिलने से इनकार कर दिया कि वह हर किसी ऐरे-ग़ैरे से नहीं मिलतीं (उन्होंने अंग्रेज़ी के टॉम-डिक एंड हैरी के मुहावरे का प्रयोग किया था) तो माथे पर एक शिकन आने दिए बग़ैर प्रमोद महाजन दिल्ली लौट आए थे. इसे उन्होंने महज़ राजनीति कहकर टाल दिया था.

प्रमोद अपने आलीशान रहन-सहन पर संघ की निंदा की अनदेखी कर सकते थे और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बावजूद हर दल के लोगों के दोस्त बने रह सकते थे.

पत्रकार शिवानी भटनागर की हत्या के मामले में नाम उछाले जाने के बाद भी मीडिया को अपने क़रीब प्रमोद महाजन ही रहने दे सकते थे.

वह टेलीविज़न पत्रकारों के लिए ऐसे नेता थे जो नपे-तुले शब्दों में उनके मतलब भर की बात कह देता था और अख़बार के पत्रकारों के लिए तैयार ख़बर परोसने वाला प्रवक्ता. मैंने बीसियों बार उनसे सुना, "आपकी जगह मैं होता तो अपनी ख़बर में ये लिखता..."

अपनी तमाम मानवीय कमज़ोरियों को वो स्वीकार न भी करते रहे हों लेकिन उनसे बात करते हुए कभी नहीं लगा कि वो अपनी कमज़ोरियों से वाकिफ़ नहीं हैं.

रिक्त स्थान

प्रमोद महाजन का न होना न सिर्फ़ भाजपा में एक रिक्त स्थान की उत्पत्ति है बल्कि भारतीय राजनीति में भी एक रिक्तता पैदा करने वाली स्थिति है.

राजीव गाँधी के बाद माधवराव सिंधिया और फिर राजेश पायलट को खोने के बाद कांग्रेस जिन अहसासों से गुज़री है आज वही भाजपा भोग रही होगी. और आने वाले बरसों में बार-बार इसे महसूस करती रहेगी.

राजीव गाँधी तो ख़ैर अपनी विरासत के कारण प्रधानमंत्री बने लेकिन राजेश पायलट ने अपने लिए जिस तरह की जगह बनाई थी उससे एक उम्मीद जागती थी.

बहुत से लोगों को बहुत बार लगता रहा कि प्रमोद महाजन में उस राजनीतिक अभिजात्य की कमी थी जो राजेश पायलट ने अर्जित की थी या माधवराव सिंधिया में स्वाभाविक रुप से थी, लेकिन ये स्वीकार करने में किसे आपत्ति हो सकती थी कि प्रमोद महाजन ने अपने व्यक्तित्व को एक आदर्श के रूप में उभारा था.

एक पत्रकार मित्र से अमर सिंह ने कभी कहा था कि वह समाजवादी पार्टी के प्रमोद महाजन हैं तो इसका मतलब समझना कठिन नहीं है.

आज हर राजनीतिक दल का युवा एकबार प्रमोद महाजन जैसा होने की ज़रुर सोचता होगा. उनके जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व वाला, मित्रता में माहिर और संसाधन जुटाने में ज़ाहिर.

किसी के जाने से ये सवाल स्वाभाविक रुप से उठता है कि उनकी जगह कौन लेगा, उनकी ज़िम्मेदारियाँ अब कौन संभालेगा और इसका जवाब न व्यावहारिक जीवन में देना आसान होता है और न राजनीतिक जीवन में.

इसका जवाब इस बार भी आसान नहीं है क्योंकि जाने वाले के बाद उसके होने की एक ख़ाली जगह होती है, एक शून्य होता है. वो ख़ाली जगह कभी नहीं भरी जा सकती.

प्रमोद महाजन के चले जाने से जो जगह ख़ाली हुई है वो ख़ाली ही रहेगी. और बहुत दिनों तक खलती रहेगी. भाजपा को ज़्यादा और दूसरों को कुछ कम.

लेकिन फिर सब कुछ यथावत सा दिखने लगेगा... जैसा कि किशन पटनायक ने कहा था, विकल्पहीन नहीं है दुनिया.

 
 
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