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रविवार, 16 जुलाई, 2006 को 22:42 GMT तक के समाचार
 
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मनमोहन सिंह
मनमोहन सिंह को लेकर काफ़ी टीका टिप्पणियाँ की जाती हैं
भारत में किसी भी बड़ी घटना के बाद राजधानी दिल्ली में बैठे विश्लेषकों को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में टिप्पणी करने का इंतज़ार रहता है.

हर बार उनके कमज़ोर और प्रभावहीन प्रधानमंत्री होने के अलग-अलग तर्क पेश किए जाते हैं.

इसके दो लाभ हैं – इन विश्लेषकों को हर बार अपनी उपयोगिता साबित करने का मौक़ा मिल जाता है और पाठकों व दर्शकों को नई बहस छेड़ने का.

पिछले सप्ताह मुंबई में हुए बम धमाकों को ही लीजिए. जहाँ अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारतीय नेतृत्त्व के साथ इन धमाकों की निंदा कर रहा था, वहीं दिल्ली स्थित कुछ विश्लेषकों की राय थी कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने धमाकों के एक दिन बाद राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कुछ भी ख़ास नहीं कहा और पाकिस्तान पर कड़ा प्रहार क्यों नहीं किया ?

लेकिन मुंबई पहुँचकर जब प्रधानमंत्री ने कड़ा बयान दिया, तो इन बुद्धिजीवियों का मानना था कि यह कांग्रेस पार्टी और मीडिया द्वारा उनके कमज़ोर संबोधन की भरपाई करने का प्रयास था !

खैर सरकार और नेताओं पर टिप्पणी करने में ये लाभ तो हमेशा ही रहता है कि आप अपने तर्क को किसी भी समय न्यायोचित ठहरा सकते हैं.

अगर सरकार पड़ोसी देश पर हमला करे तो इसे घरेलू मुश्किलों से ध्यान हटाने का नाम दे दीजिए और अगर सरकार पड़ोसी देश पर न बरसे तो उसे सरकार की कमज़ोरी करार दिया जा सकता है.

लेकिन एक सवाल जिसका जवाब कोई नहीं दे रहा है, वो यह है कि पाकिस्तान के साथ बातचीत भी जारी रखी जाए लेकिन उसे आतंकवाद का समर्थन बंद करने के लिए भी स्पष्ट शब्दों में कह दिया जाए – दोनों बातें एक साथ कैसे संभव हैं ?

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स्वायत्तता ज़रूरी है

जब बात राजनीति की चल रही हो तो आजकल देश के प्रमुख चिकित्सा केंद्र अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानि एम्स का ज़िक्र किए बिना ये चर्चा अधूरी रह जाएगी.

दिल्ली हाईकोर्ट के एम्स के निदेशक डॉ वेणुगोपाल की बर्ख़ास्तगी पर रोक लगा दिए जाने के साथ ही अचानक सभी दलों को अब एम्स की स्वायत्तता की याद सताने लगी है.

विपक्षी भारतीय जनता पार्टी को तो मानो यूपीए सरकार ने इस मामले के रूप में संजीवनी बूटी थमा दी है.

पार्टी महासचिव अरुण जेटली हाई कोर्ट में डॉ वेणुगोपाल के वकील के रुप में पेश हुए और लगे हाथों अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर एम्स की स्वायत्तता बनाए रखने की माँग कर डाली.

ऐसे में भला वामपंथी भी कहाँ पीछे रहने वाले थे, उन्होंने भी डॉ वेणुगोपाल को हटाए जाने के तरीके पर आपत्ति कर डाली.

अचानक एम्स का चर्चा का केंद्र बनने से वहाँ के डॉक्टर हैरान हैं और सवाल पूछ रहे हैं कि विपक्ष में आने के बाद ही नेताओं को उनके संस्थान की याद क्यों आती है ?

ध्यान रहे कि बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने घुटने के ऑपरेशन के लिए मुंबई का पॉश ब्रीच कैंडी अस्पताल चुना था और ऑपरेशन के लिए डॉ चितरंजन रानावत को खासतौर से अमरीका से बुलवाया गया था.

वहीं वरिष्ठ वामपंथी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत और प्रकाश कारत भी अपने-अपने इलाज के लिए दिल्ली के निजी अस्पतालों को प्राथमिकता देते रहे हैं और यही हाल बड़े कांग्रेसी नेताओं का भी है – लेकिन स्वायत्तता ज़रुरी है !

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कांग्रेस की कार्यशैली

सत्ताधारी काँग्रेस पार्टी के नेता अपनी अध्यक्ष सोनिया गांधी की कार्यशैली को आठ साल बाद भी समझ पाने में पूरी तरह विफल रहे हैं.

कौन कब संगठन में महत्वपूर्ण स्थान पा जाएगा और कब किसका पत्ता साफ़ हो जाएगा, इस बारे में कोई भी भविष्यवाणी कर जोखिम मोल लेना नहीं चाहता.

ज़्यादातर नेताओं का मानना है कि इसके पीछे पार्टी के हालात से ज़्यादा, देश में हुए अप्रत्याशित घटनाक्रम का दोष है.

सोनिया गांधी
सोनिया गांधी को समझने में कांग्रेसी नेता असफल रहे हैं

एक नेता का तो यहाँ तक कहना है कि “सपने में भी सोचे बिना हम 2004 का लोकसभा चुनाव जीत गए, शायद इसलिए वरिष्ठ नेताओं को मंत्री बनाने के सिवाए पार्टी अध्यक्ष के पास कोई और विकल्प नहीं था, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता था कि आप लोकसभा की सीट जीतकर आए थे या नहीं.”

जिस बात से काँग्रेस पार्टी के जनाधार वाले नेता और कई राज्यों के मुख्यमंत्री नाराज़ हैं, वह है दिल्ली दरबार में हाज़िरी की प्रथा.

इन नेताओं का मानना है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन दुख इस बात का है कि उनसे मिलने का समय तो मिलता नहीं, उल्टा उन लोगों की सेवा करनी पड़ती है, जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा और यदि लड़ा है तो जीता नहीं.

साथ ही यूपीए सरकार बनने के बाद संगठन में हो रहे बदलावों के बारे में अब भी पार्टी नेता समझने की कोशिश में हैं.

एक समय सबसे शक्तिशाली मानी जाने वालीं महासचिव और पार्टी मीडिया विभाग की प्रभारी अंबिका सोनी के मंत्रिमंडल में जाते ही उन्हें पार्टी के कोर ग्रुप से भी बाहर कर दिया गया और मंत्रिमंडल में भी वो कोई भारी भरकम महकमा नहीं हासिल कर सकीं.

अंबिका सोनी की जगह अब कई वर्षों से पार्टी मुख्यालय के चक्कर काट रहे जनार्दन दिवेदी ने ले ली है, जो अचानक सबसे महत्त्वपूर्ण महासचिव और पार्टी के मीडिया विभाग के अध्यक्ष हो गए हैं.

दूसरी तरफ पार्टी के युवा सांसदों को अब भी काम का इंतज़ार है.

लेकिन पत्रकार से नेता बने राजीव शुक्ला अब कुछ वक्त आराम कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें प्रवक्ता पद से हटा दिया गया है. लेकिन क्या उनसे मैडम नाराज़ हैं, कांग्रेसियों का कहना है कि वे ऐसे सवालों का जवाब नहीं देते !

(हमारी साप्ताहिक दिल्ली डायरी का यह अंक आपको कैसा लगा? लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर).

 
 
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