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सोमवार, 14 अगस्त, 2006 को 11:46 GMT तक के समाचार
 
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जिनके लिए तिरंगा भगवान है
 

 
 
टाना भगत
टाना भगत अभी भी दिन की शुरुआत तिरंगे की पूजा के साथ करते हैं
लगभग एक सदी से भी ज़्यादा हो गए मगर महात्मा गाँधी के पदचिन्हों पर चलने वाले झारखंड के लगभग 80 हज़ार टाना भगतों के लिए आज भी परिस्थितियाँ वही हैं जो ग़ुलाम भारत में उन्हें झेलने को मिली थी.

मूल रूप से उराँव जनजाति से आने वाले इन टाना भगतों में पहुत सारे ऐसे परिवार हैं जिनकी ज़मीनें ब्रितानी हुकूमत ने नीलाम कर ली.

इनकी बदकिस्मती देखिए, ये परिवार आज़ाद भारत के छह दशक बाद भी इस देश के रहनुमाओं से अपनी छिनी ज़मीन पाने की आस लगाए हुए हैं. ये बात और है कि आज़ादी के आंदोलन को अंजाम तक पहुँचाने में योगदान देने वाले उनके पड़दादा इसी आस के साथ इस दुनिया से विदा हो गए.

'तिरंगा भगवान है'

पूरे भारत में शायद टाना भगत ही ऐसा समुदाय है जिसके सदस्यों का दिन शुरू होता है तिरंगे की पूजा के साथ. 1914 में 24 वर्षीय जतरा टाना भगत के नेतृत्व में उराँव जनजाति के लोगों ने संकल्प लिया कि वो ज़मींदारों के खेत में मज़दूरी नहीं करेंगे और अंग़्रेज़ी हुकूमत को लगान नहीं देंगे.

बस फिर क्या था. एक छोटी सी पहल ने आगे चलकर पंथ का रूप तब ले लिया जब इस समुदाय के लोगों का संपर्क महात्मा गाँधी के साथ हुआ. अहिंसा और सत्याग्रह के आह्वान पर टाना भगतों ने भोग विलास को त्याग कर एक सादी ज़िंदगी जीने का संकल्प लिया जिस पर वो आज भी क़ायम हैं.

 आज़ादी मिलते ही टाना भगत फूले नहीं समा रहे थे. सबको उम्मीद जगी कि नीलाम की गई ज़मीन वापस मिल जाएगी. मगर आज भी बहुत सारे परिवार ऐसे हैं जो अदालतों के चक्कर काट-काटकर थक गए हैं
 
गंगा टाना भगत

स्वतंत्रता संग्राम में असहयोग आंदोलन के दौरान गाँधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने का ख़ामियाजा उन्हें तब भोगना पड़ा जब अंग़्रेजी हुकूमत ने लगान नहीं दिए जाने के कारण उनकी ज़मीनों को नीलाम कर दिया.

मगर इन टाना भगतों के इरादे नहीं बदले और वो आज़ाद भारत में आज़ाद हवाओं में सांस लेने का सपना देखते रहे. उन्हें उम्मीद थी कि आज़ादी के बाद उन्हें उनकी क़ुर्बानी का फल ज़रूर मिलेगा और उनकी ज़मीनें वापस हो जाएंगी.

मगर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि टाना भगतों की लगभग 2486 एकड़ ज़मीन आज भी उन्हें वापस नहीं मिली और इस संबंध में आज भी 703 मामले झारखंड की विभिन्न अदालतों में चल रहे हैं.

अपनों से शिकवा

सन 1985 से 1990 तक मांडर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक रहे गंगा टाना भगत कहतै हैं, ‘‘आज़ादी मिलते ही टाना भगत फूले नहीं समा रहे थे. सबको उम्मीद जगी कि नीलाम की गई ज़मीन वापस मिल जाएगी. मगर आज भी बहुत सारे परिवार ऐसे हैं जो अदालतों के चक्कर काट काटकर थक गए हैं.’’

ज़मीन तो मान लीजिए हाशिए पर है. पलामू, हज़ारीबाग, रांची, सिमडेगा, लोहरदगा और गढ़वा ज़िलों में बसे इस समुदाय के लोगों को सबसे अधिक तक़लीफ इस चीज से होती है कि उनकी क़ुर्बानी को अज़ादी के बाद भी कोई सम्मान, कोई पहचान नहीं मिल सकी.

पिछले वर्ष टाना भगतों ने स्वतंत्रता दिवस का बहिष्कार किया था. उनका विरोध था कि आज भी न तो सरकारी नौकरी में उन्हें सरकार से कोई तरजीह मिलती है और न ही आर्थिक स्थिति से उबरने के लिए कोई आर्थिक मदद.

सत्याग्रह और असहयोग आँदोलन की अगुआई करने वाले जतरा भगत की मूर्ति भी लोगों ने अपने चंदे से बनवाई

बेड़ो के सोमरा टाना भगत कहते हैं,‘‘स्थिति यहाँ तक है कि अपने गाँव में अपने धर्म गुरू और महान स्वतंत्रता सेनानी जतरा टाना भगत की मूर्ति लगाने के लिए हमें आपस में ही चंदा इकट्ठा करना पड़ा. उसी तरह एक समुदायिक भवन की मांग भी हम करते रहे मगर कुछ नहीं हुआ.’’

वर्ष 1966 में अविभाजित बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने टाना भगत वेलफ़ेयर बोर्ड की स्थापना की थी. मगर गंगा टाना भगत बताते हैं कि यह बोर्ड सिर्फ़ तीन महीनों तक ही चल पाया. उसके बाद से आज तक फिर उसका पुर्नगठन नहीं हो पाया है.

गंगा भगत कहते हैं, ‘‘आज़ादी के बाद भी अपनी मांगों को लेकर हमें वही सब कुछ करना पड़ रहा है जो हमारे पूर्वजों ने ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ किया था. अपनी आवाज़ सत्ता के गलियों तक पहुँचाने के लिए हमें कभी रेल रोकना पड़ता है तो कभी सत्याग्रह या फिर बहिष्कार. यह विडंबना नहीं है तो फिर और क्या है.’’

विडंबना

टाना भगतों की एक और विडंबना है. वो जिस तिरंगे को पूजते हैं वो पुरानी भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस का चरखे वाला झंडा है. इस झंडे को वो आज़ादी की लड़ाई का प्रतीक मानते हैं. इसलिए उनकी स्वभाविक राजनीतिक आस्था कांग्रेस पार्टी के साथ है.

विधायक रहे गंगा टाना भगत कहते हैं कि बेवफाई के बावजूद कॉंग्रेस का साथ नहीं छोड़ सकते

पूर्व विधायक गंगा टाना भगत की माने तो,‘‘एक सच्चा टाना भगत कॉंग्रेस को छोड़कर किसी और पार्टी के बारे में सोच भी नहीं सकता. मगर आज इस पार्टी में चापलूसों की जमात है और हमें कोई पूछने वाला नहीं है. अब तो नौबत यहाँ तक आ गई है कि टाना भगतों को पार्टी टिकट भी नहीं देती. हम फिर भी मजबूर हैं. इन सबके बावजूद हम कॉंग्रेस को नहीं छोड़ सकते. चाहे इस पार्टी के नेता हमें भूल गए हैं.’’

टाना भगतों का मानना है कि उनके पूर्वजों ने अपने बच्चों का नाम मिशन के स्कूलों से इस लिए कटवा दिया था कि वो अंग़्रेजों के एजेंट थे. बच्चों के नाम सरकारी स्कूलों से इसलिए कटवा दिया गया क्योंकि वो अंग्रेज़ हुकूमत के अधीन थे.

1914 से लेकर 1947 तक टाना भगत समुदाय के बच्चे देश की आज़ादी की ख़ातिर स्कूल नहीं गए और इस वजह से पूरा कुनबा बुरी तरह से पिछड़ गया. ‘‘आज हमारा भी हक़ बनता है कि हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें. इसके लिए अलग से व्यवस्था करनी चाहिए जो सरकार नहीं कर रही है.’’ यह कहना है सिरामटोली के छोटा टाना भगत का .

 
 
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