BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
 
सोमवार, 04 सितंबर, 2006 को 21:06 GMT तक के समाचार
 
मित्र को भेजें कहानी छापें
एक साहित्यिक रचना का राजनीतिकरण
 

 
 
बंकिम चंद्र
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में किसी समय वंदे मातरम् को लिखा
अक्सर विवाद ऐसे लोग पैदा करते हैं जिनका मुद्दे से कोई संबंध नहीं होता. हमारे समाज के लोगों का एक समूह है, शायद छोटा सा, जो महसूस करता है कि वंदे मातरम् मूर्ति की वंदना है और उनके धर्म के अनुकूल नहीं है.

अगर यही भावना है तो हमें वंदे मातरम् गाना अनिवार्य करने के बारे में भूल जाना चाहिए और इसे सबके लिए ज़रूरी और बाध्यकारी नहीं करना चाहिए.

मैं मानता हूँ कि गीत गाना एक भावनात्मक अनुभव है. यह एक सांस्कृतिक रचना का समर्थन है.

मैं यह कहना चाहता हूँ कि अगर किसी को आपत्ति है तो उसके लिए वंदे मातरम् गाना अनिवार्य नहीं करना चाहिए.

व्यख्याएँ
 यह एक साहित्यिक रचना के राजनीतिकरण की कहानी है. अलग-अलग पार्टियों ने इसकी नई-नई व्याख्याएँ अपनी सुविधानुसार कीं, जो बंकिम चंद्र और उनकी रचना की भावना से अलग है
 

मेरा मानना है कि गीत के पहले दो छंदों में मातृभूमि की सुंदरता का गीतात्मक वर्णन किया गया है.

लेकिन 1880 के दशक के मध्य में गीत को नया आयाम मिलना शुरू हो गया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बंकिम चंद्र ने 1881 में अपने उपन्यास आनंदमठ में इस गीत को शामिल कर लिया.

उसके बाद कहानी की माँग को देखते हुए उन्होंने इस गीत को लंबा किया. बाद में जोड़े गए हिस्से में ही दशप्रहरणधारिणी (दुर्गा), कमला (लक्ष्मी) और वाणी (सरस्वती) के उद्धरण दिए गए हैं.

लेखक होने के नाते बंकिम चंद्र को ऐसा करने का पूरा अधिकार था और इसको लेकर तुरंत कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं हुई. यानी तब किसी ने ऐसा नहीं कहा कि यह मूर्ति की वंदना करने वाला गीत है या 'राष्ट्रगीत' नहीं है.

काफ़ी समय बाद जब विभाजनकारी मुस्लिम और हिंदू सांप्रदायिक ताकतें उभरीं तो यह राष्ट्रगीत से एक ऐसा गीत बन गया जिसमें सांप्रदायिक निहितार्थ थे. 1920 और ख़ासकर 1930 के दशक में इस गीत का विरोध शुरू हुआ.

मोहम्मद अली जिन्ना इसका विरोध करने लगे.

'राजनीतिकरण'

यह एक साहित्यिक रचना के राजनीतिकरण की कहानी है. राजनीतिक पार्टियों के लिए इसके मायने साहित्यिक दृष्टि से एकदम उलट हैं.

अलग-अलग पार्टियों ने इसकी नई-नई व्याख्याएँ अपनी सुविधानुसार कीं, जो बंकिम चंद्र और उनकी रचना की भावना से अलग है.

एक ओर जहाँ इसे मूर्तिपूजक और मुस्लिम विरोधी उपन्यास अंश बताकर विरोध किया जा रहा है, वहीं दूसरा समुदाय इन्हीं तत्वों को इसका गुण बताकर समर्थन कर रहा है.

मैं बांग्ला बोलता हूँ और मेरा पालन-पोषण भारत में उस समय हुआ जब यह गीत स्कूलों में नियमित रूप से गाया जाता था.

'लिटमस टेस्ट' नहीं
 पहले दो छंदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में रखना चाहिए और सार्वजनिक रूप से इसके गाने और सुनने को अनिवार्य नहीं करना चाहिए. वंदे मातरम् को देशभक्ति की सही कसौटी के रूप में पेश करना भी अत्यंत आपत्तिजनक है जैसा कि हिंदू सांप्रदायिक तत्व कर रहे हैं
 

वे प्रेसीडेंसी कॉलेज से पहले स्नातक थे, जहाँ से मैं भी हूँ. इसके अलावा यह गीत मेरी और शायद उस पूरी पीढ़ी की संस्कृति का हिस्सा है जिससे मैं हूँ. इसलिए व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह एक सुंदर और प्रेरणादायक गीत है, ख़ासकर पहले दो छंद.

लेकिन अगर आप गीत के बाद के हिस्से की बात करेंगे तो यह सच है कि इसमें हिंदू धर्म के प्रतीकों की बात की गई है.

1937 में जब जवाहर लाल नेहरू ने रवींद्रनाथ ठाकुर से इसे राष्ट्रगीत बनाने के सवाल पर सलाह माँगी तो उन्होंने कहा कि शायद पहले दो छंदों को ही अपनाना ठीक होगा. और यह सही निर्णय साबित हुआ.

राजनीतिक और सांस्कृतिक वजहों को ध्यान में रखकर वंदे मातरम् गीत के पहले दो छंदों को ही राष्ट्रगीत रखना चाहिए और सार्वजनिक रूप से इसके गाने और सुनने को अनिवार्य नहीं करना चाहिए.

वंदे मातरम् को देशभक्ति के 'लिटमस टेस्ट' या सही कसौटी के रूप में पेश करना भी अत्यंत आपत्तिजनक है जैसा कि हिंदू सांप्रदायिक तत्व कर रहे हैं. इससे देश में विघटन को बढ़ावा मिलेगा.

(बीबीसी संवाददाता रेणु अगाल के साथ बातचीत पर आधारित)

 
 
भारत का राष्ट्र ध्वजराष्ट्रगीत पर राजनीति
वंदे मातरम् का मुद्दा उठाने के पीछे कोई राजनीतिक खेल है? एक विश्लेषण.
 
 
एक विहिप कार्यकर्तागाना होगा वंदेमातरम
मध्यप्रदेश के सभी सरकारी कार्यालयों में प्रत्येक माह वंदेमातरम का गायन होगा.
 
 
सैयद अहमद बुख़ारीशाही इमाम की राय...
जामा मस्जिद के शाही इमाम वंदे मातरम् को 'थोपने' के ख़िलाफ़ हैं.
 
 
बकिम चंद्र चट्टोपाध्यायकौन थे बंकिम चंद्र
बहुमुखी प्रतिभा के धनी बंकिम चंद्र के जीवन के बारे में जानें.
 
 
राष्ट्रगीत पर विवाद
राष्ट्रगीत वंदे मातरम् गाने या न गाने पर छिड़े विवाद की विवेचना.
 
 
बंकिम चंद्र बंकिम चंद्र का लेखन
वंदे मातरम् और आनंद मठ को सही संदर्भ में समझे जाने की ज़रूरत है.
 
 
इससे जुड़ी ख़बरें
जश्न-ए-आज़ादी के दिन भी 'अपमान'
20 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस
'आज़ादी के बावजूद असमानता कायम'
20 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस
जिनके लिए तिरंगा भगवान है
14 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस
आज़ादी के छह दशक बाद हिंदी साहित्य
12 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
 
 
मित्र को भेजें कहानी छापें
 
  मौसम |हम कौन हैं | हमारा पता | गोपनीयता | मदद चाहिए
 
BBC Copyright Logo ^^ वापस ऊपर चलें
 
  पहला पन्ना | भारत और पड़ोस | खेल की दुनिया | मनोरंजन एक्सप्रेस | आपकी राय | कुछ और जानिए
 
  BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>