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रविवार, 26 नवंबर, 2006 को 07:53 GMT तक के समाचार
 
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मुलाक़ात- लालकृष्ण आडवाणी के साथ
 

 
 
आडवाणी
राजनीति से परे, आडवाणी ने अपने जीवन के कुछ निजि पहलुओं पर बातचीत की है
बीबीसी हिंदी की इस विशेष प्रस्तुति में हर सप्ताह आप भारत की जानी-मानी हस्तियों के जीवन के अनकहे पहलुओं के बारे में जानेंगे.

लालकृष्ण आडवाणी के साथ - एक मुलाक़ात में हमने उनके निजी और सार्वजनिक जीवन के कई पहलुओं पर बातचीत की है.

पेश हैं इसी मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश-

सवाल- जब आप कराची के सेंट पैट्रिक्स स्कूल में पढ़ रहे थे तब क्या कभी आपने सोचा था कि आप एक राजनीतिक नेता बनेंगे और वो भी एक हिंदूवादी पार्टी के सबसे शीर्ष नेता?

जवाब- राजनीति में पहुँच गया हूँ अन्यथा अधिक दिलचस्पी तो पुस्तकों और फ़िल्मों में रही है. कभी राजनीति का विचार तो नहीं आया था लेकिन यह मैं कह सकता हूँ बचपन से ही परिवार में जो संस्कार हैं उसमें रामायण, महाभारत का एक अहम स्थान था. मैंने रामायण और महाभारत सिंधी में पढ़ी. दादी मुझे अवश्य कहती थी कि देखो लाल तुम महाभारत पढ़ रहे हो लेकिन शुरू से अंत तक मत पढ़ो, नहीं तो घर में झगड़ा हो जाएगा, पढ़ना है तो बीच-बीच में से पढ़ो.

अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ा और अंग्रेज़ी पुस्तक में रुचि बढ़ी, तब भी मैंने रामायण और महाभारत दोनों पढ़ी़ थी. इसीलिए सेंट पैट्रिक्स हाई स्कूल में पढ़ने के कारण मैं अपने यहाँ की संस्कृति से दूर रहा, यह कहना सच नहीं होगा.

सवाल- आपके पसंदीदा गाने कौन से हैं?

जवाब- ऐसे कई गीत हैं जो मुझे पसंद हैं. मैंने 'हम दोनों' फ़िल्म देखी थी. एक बार मैं एक म्यूज़िक प्रोग्राम के लिए आमंत्रित था. वहाँ जयदेव जी आए थे और उनका ‘हम दोनों’ का एक गीत, मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया... मुझे बहुत पसंद आया था. वो फ़िल्म भी मुझे बहुत पसंद है. अभी भी मैंने बहुत बरसों बाद उसका डीवीडी मँगाकर देखा था.

क्रिकेट पर...
 सचिन की क्षमता पर सवाल उठाना ठीक नहीं है. इतने लंबे समय तक वो जैसे छाए रहे, यह अदभुत उपलब्धि है उनकी. यह ठीक है कि पिछले दिनों में देश में और भी अच्छे बल्लेबाज़ हुए हैं जिन्होंने नाम कमाया है, लेकिन वो (सचिन) और कप्तान राहुल द्रविड़, जिन्हें हम ‘वॉल’ (दीवार) कहते हैं, दोनों ही आउटस्टैंडिंग हैं
 
लालकृष्ण आडवाणी

बहुत साल पहले एक फ़िल्म देखी थी- 'भाभी की चूड़ियाँ.' इसे देखने के बाद इसका एक गीत मेरे मन पर छा गया. फिर दो ऐसे मौके आए जब मैनें इसे लता जी से सुना भी. मुझे याद है कि एक बार गोआ में जब लता मंगेशकर का सम्मान किया जा रहा था और मुझे मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था और उसके बाद मुंबई में लता जी का सम्मान समारोह, दोनों ही अवसरों पर मैंने उनसे यह गीत सुनाने के लिए कहा और हालांकि लता जी बिना पूर्व सूचना के और बिना ऑक्रेस्ट्रा के नहीं गातीं लेकिन उन्होंने मेरा पसंदीदा गीत, ज्योति कलश छलके... मुझे सुनाया.

बहुत वर्ष पहले किसी होटल में जगजीत सिंह का एक गीत, ये दौलत भी ले लो..ये शोहरत भी ले लो....सुना था. यह गीत भी मुझे बहुत पसंद आया था.

जो ग़ज़ल अच्छे लगते हैं उनमें से एक ग़ज़ल अर्थ फ़िल्म में था- तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो. इसके अलावा मन्ना डे का गाया हुआ गीत, ऐ मेरे प्यारे वतन.... मुझे बहुत पसंद है.

सवाल- रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य और कुछ बहुत बड़ी पुस्तकें आप अपनी युवावस्था के समय में पढ़ रहे थे. लेकिन क्या उस समय आपका कोई 'रोल मॉडल' था आज की पीढ़ी के लिए सचिन या अटल जी या आप. उस समय कौन ऐसा प्रभावी रोल अदा कर रहा था?

'सचिन की क्षमता पर सवाल नहीं'

जवाब- आपने सचिन तेंदुलकर का नाम लिया तो मैं यह भी बताना चाहूँगा कि स्कूल में था तो क्रिकेट में रूचि थी. मैं खेलता भी था. कोई आउटस्टैंडिंग प्लेयर तो था नहीं पर टीम में था.

मैट्रिक में जब था तब रणजी ट्रॉफ़ी का महाराष्ट्र बनाम सिंध का पाँच दिनों का मैच था. उस समय मैं स्कूल में अपनी क्लासें छोड़कर मैच देखने गया था.

उन दिनों टीवी तो था नहीं, रेडियो ही था और रेडियो में भी बस एक ही कॉमेंट्रेटर था, एएफ़एस तलयार ख़ान. हमने तो उन्हीं को सुना था और हम उन्हीं की नकल भी करते थे. स्कूल में अन्य साथी मुझसे कंमेट्री सुनते थे.

सवाल- क्रिकेट में आपकी दिलचस्पी अभी बरकरार है. तो अभी आपके कौन पसंदीदा खिलाड़ी हैं?

जबाव- अभी तो सचिन ही हैं. मेरा बेटा अक्सर उनसे मिलता है. कई बार उन्हें यहाँ लाता भी है. मेरा सचिन से मिलना होता रहता है.

उनकी क्षमता पर सवाल उठाना ठीक नहीं है. इतने लंबे समय तक वो जैसे छाए रहे, यह अदभुत उपलब्धि है उनकी. यह ठीक है कि पिछले दिनों में देश में और भी अच्छे बल्लेबाज़ हुए हैं जिन्होंने नाम कमाया है, लेकिन वो (सचिन) और कप्तान राहुल द्रविड़, जिन्हें हम ‘वॉल’ (दीवार) कहते हैं, दोनों ही आउटस्टैंडिंग हैं.

सवाल- कई लोगों का मानना है कि आप फ़िल्मों और गीतों के बारे में भी ख़ासी जानकारी रखते हैं. क्या फ़िल्मों का शौक आपको शुरू से ही है?

जवाब- बचपन से मैं हिंदी और अंग्रेजी फ़िल्में देखता आया हूँ. मैं बहुत समय से थियेटर में नहीं जा सकता हूँ क्योंकि बाक़ी दर्शकों को सिक्योरिटी के कारण परेशानी होती है.

एक बार वर्षों बाद मैं चाणक्य थियेटर में एक फ़िल्म देखने गया 'हम आपके हैं कौन'. उस फ़िल्म को देखने के अगले दिन अख़बार में ख़बर छपी - "आडवाणी अपने परिवार के साथ फ़िल्म देखने पहुँचे. उन्हें अपने बीच पाकर दर्शक चौंक-से गए. आडवाणी ने पूरी फ़िल्म देखी, बीच में वो पॉप-कॉर्न (मकई का लावा) लेते हुए दीदी तेरा देवर दीवाना...गीत गुनगुना रहे थे."

इसके तीन दिन बाद एक कार्टून छपा जिसमें मैं लोगों से पार्टी के लिए वोट माँग रहा था और एक ग़रीब आदमी मुझसे कह रहा था कि - 'हम आपके हैं कौन.'

सवाल- आडवाणी जी, अंग्रेजी फ़िल्मों में अपनी पसंद के बारे में बताएँ.

ख़ूबसूरत अदाकारा...
 वो अभिनेत्री जिसे कई पुरस्कार मिले - 'ब्लैक' में भी जिसने बेहतरीन अभिनय किया - रानी मुखर्जी. इसके अलावा 'कोई मिल गया' में प्रीति जिंटा बहुत अच्छी लगी हैं
 
लालकृष्ण आडवाणी

जवाब- 1957 में मैं बॉम्बे गया. अपने मामा के यहाँ ठहरा था तो उन्होंने कहा, 'लाल, कोई फ़िल्म देखने चलें?' मैने कहा - 'मैंने बहुत समय से फ़िल्म नहीं देखी है.' अगली ही सुबह मैं अख़बार उठाकर एक ख़बर देखता हूँ कि स्ट्रैंड सिनेमा में एक दर्शक फ़िल्म देखकर मर गया. उसे हार्ट अटैक हुआ था. यह फ़िल्म थी- ‘हाउस ऑफ वैक्स’ जो एक डरावनी फ़िल्म थी. मैंने कहा, 'मामा इसे देखने चलना है. चलो आज चलते हैं.' तो इतने सालों बाद मैंने फ़िल्म देखी वो भी यह ख़बर पढ़कर. हिचकॉक की भी सारी फ़िल्में मैंने देखी हैं.

अमिताभ जैसा दूसरा नहीं

सवाल- फ़िल्मों में आपके पसंदीदा कलाकार कौन हैं? जैसे किसी का अमिताभ बच्चन या दिलीप कुमार या अभी की बात करें तो शाहरुख ख़ान...

जवाब- अच्छे कलाकार तो बहुत हैं, लेकिन इतने समय तक इतना बढ़िया कलाकार होना कि छाए रहना...शायद अमिताभ के मुकाबले में मुझे दूसरा कोई सूझता नहीं.

कई का नाम लिया जा सकता है. लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि अमिताभ अपने आप में एक मिसाल हैं. हाल-फिलहाल में उनकी 'ब्लैक' मुझे बहुत अच्छी लगी.

मौजूदा पीढ़ी में से ऋतिक को देखा 'कोई मिल गया' में, जो कि बहुत कठिन रोल था, एक अविकसित प्रकृति वाला व्यक्ति जो कि हीरो का रोल करे - बहुत कठिन था. उसने बहुत खूबी से इस किरदार को निभाया. मुझे ऋतिक अच्छा लगता है.

सवाल- आपका कभी मन करता है कि कोई लौटा दे बचपन.

जवाब- उस उम्र का एक अपना मज़ा होता है लेकिन मैं उनमें से हूँ जिनके पूरे जीवन में चाहे बचपन, यौवन या बढ़ी हुई उम्र का दौर रहा हो, मन में आत्मविश्वास बहुत रहा है. यह धारणा कि वो काल बहुत अच्छा था और अब कुछ तकलीफ़ है, ऐसा मेरे मन में नहीं रहा.

सवाल- किस तरह की पुस्तकें पढ़ने का आपको शौक रहा है?

जवाब- 1942 में मुझे पुस्तकों को पढ़ने का शौक शुरू हुआ जब मैं कॉलेज में आया ही था. 1942 के आंदोलन के कारण कॉलेज बंद रहता था और इस कारण पूरा का पूरा समय लाइब्रेरी में बीतता था. उन्हीं दिनों मैंने कॉलेज लाइब्रेरी में जितने भी क्लासिक उपन्यास उपलब्ध थे, सब पढ़े. मैंने चार्ल्स डिकिंस की सब पुस्तकें, विक्टर हू गो की 'द मिज़रेबल्स' से लेकर बहुत सारे उपन्यास पढ़े. यहाँ तक कि साइंस फ़िक्शन की 'जूल्स वर्न’ के सारे सीरीज़ भी उन्हीं दिनों पढ़े. इसीलिए मैं बाद में लोगों से कहता था कि बच्चों को उपन्यास पढ़ने से रोकें नहीं, क्योंकि उपन्यास पढ़ने से पुस्तक पढ़ने की आदत बनती है.

मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक 14 वर्ष की उम्र में बना. उस समय सिंध के प्रांत प्रचारक राजपाल पुरी थे. उन्होंने पहले दिन ही पूछा, 'लाल, पुस्तक पढ़ने का शौक है' और उन्होंने मुझे डेल कारनेगी की 'हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इनफ्लूएंस पीपुल्स' दे दी. उस पुस्तक का मेरे ऊपर बहुत असर पड़ा. मैं अपनी प्रकृति के कुछ पहलुओं को उससे रिलेट करता हूँ. तब से लेकर आज तक मुझे लगता है कि किसी से बेकार बहस नहीं करनी चाहिए.

'अटल जी से कॉम्पलेक्स रहा'

सवाल- कई लोग आपके और अटल जी के संबंधों के बारे में चर्चा करते है. उनकी कविताओं के बारे में आपकी क्या राय है?

अटल बिहारी वाजपेयी पर...
 अटल जी ने 1973 में कहा कि वे चार साल पार्टी अध्यक्ष रहे और अब मैं बनूँ तो मैंने कहा मैं नहीं बन सकता. मुझे बोलना नहीं आता. इस पर उन्होंने कहा संसद में बोलते हो. तो मैंने कहा कि संसद में बोलना अलग चीज़ है लेकिन जनसभा में बोलना अलग बात है
 

जवाब- अटल जी वो शख्स हैं जिनसे मुझे शुरुआत से ही एक तरह का कॉम्पलेक्स रहा है. उनकी कविताओं के बारे में ही नहीं बल्कि 1952-53 में पार्टी के राष्ट्रीय नेता के नाते जब वे राजस्थान आते थे और राजस्थान के दो कार्यक्रमों में मैं उनके साथ रहा, तो अपने भाषणों से वे जिस प्रकार से लाखों लोगों को मंत्र मुग्ध करके रखते थे, मेरे मन में एक कम्प्लेक्स डेवलप (हीन भावना पैदा) हुआ. मुझे लगा कि मैं भी राजनीति में हूँ पर राजनीति में व्याख्यान देना एक महत्वपूर्ण गुण है जो मुझे मेरे बस की बात नहीं लगती थी.

1973 में जब उन्होंने कहा कि मैं चार साल पार्टी का अध्यक्ष रहा हूँ और अब आप बनिए तो मैंने कहा - 'मैं नहीं बन सकता. मुझे बोलना नहीं आता.' इस पर उन्होंने कहा कि संसद में बोलते हो, तो मैंने कहा कि संसद में बोलना अलग चीज़ है लेकिन जनसभा में बोलना अलग बात है. फिर बाद में मुझे पार्टी का अध्यक्ष बनना पड़ा.

पहली लोकसभा के वक़्त मैं पत्रकार था. उस लोकसभा में दो आउटस्टैंडिंग अंग्रेज़ी के वक्ता थे - एक श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दूसरे हिरेन मुखर्जी. दूसरी लोकसभा में दो हिंदी के आउटस्टैंडिंग वक्ता रहे - एक अटल बिहारी वाजपेयी और दूसरे प्रकाश वीर शास्त्री.

सवाल- आपकी अपनी पत्नी कमला से मुलाक़ात कब और कैसे हुई थी. आपके मन का रोमांटिक लालकृष्ण अडवानी कब-कब जगा, क्या अब भी कोई चीज़ अच्छी लगती है?

जवाब- मैं कमला से कभी परिचित नहीं था. कमला और मेरा विवाह 'अरेंज्ड मैरेज' था. मेरी बहन ने प्रबंध किया था और वह हुआ. आपको आश्चर्य होगा कि अगर मेरी पत्नी मेरे घर की चिंता न करतीं और मेरे व्यक्तिगत खर्चों की चिंता न करती तो मैं कुछ कर ही नहीं पाता. यहाँ तक कि मुझे यह पता नहीं कि मेरी आमदनी कितनी है, इनकम टैक्स कितना है. सब एकाउंट्स वहीं देखती हैं. इतने गुण उनमें हैं कि कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि मेरा सौभाग्य है कि अर्धांगनी के नाते कमला प्राप्त हुईं जो कि इतनी देखभाल कर सकती हैं.

सवाल- सिनेमा के पर्दे पर सबसे खूबसूरत अदाकारा आपको कौन लगती हैं?

जवाब- आजकल की फ़िल्मों की बात करूँ तो वो अभिनेत्री जिसे कई पुरस्कार मिले. 'ब्लैक' में भी जिसने बहुत अच्छा अभिनय किया - रानी मुखर्जी. इसके अलावा 'कोई मिल गया' में प्रीति जिंटा बहुत अच्छी लगी हैं.

सवाल- ज़िंदगी में इतना लंबा आपका अनुभव है. आपने इसे जिया है. पीछे मुड़कर देखने पर पूरी ज़िंदगी के दौरान कौन सी ऐसी चीज़ है जो आपको लगता है कि आपको नहीं करना चाहिए था?

जवाब- दरअसल, यह मेरे स्वभाव में नहीं है कि बीते हुए पर पछतावा करूँ. जो जी लिया, उसके बारे में इस तरह नहीं सोचता. जो किया उसमें से ही अच्छा परिणाम निकलने का प्रयास करना चाहिए. वही निकालने की कोशिश करो और जो बीत गया उसे छोड़ो. मुझसे लोग पूछते हैं कि आप इतने उम्र के बाद भी सक्रिय हैं तो मैंने कहा कि इसका एक कारण तो यह है कि परिवार मेरा पूरी चिंता करता है. दूसरा कारण है कि मैं प्रकृति से कम खाता हूँ.

(लालकृष्ण आडवाणी के साथ 'एक मुलाक़ात' सुनिए बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार रात आठ बजे. दिल्ली और मुंबई में वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार दोपहर 12 बजे भी इसे सुन सकते हैं.)

 
 
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