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रविवार, 03 दिसंबर, 2006 को 05:48 GMT तक के समाचार
 
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एक मुलाक़ात- शीला दीक्षित के साथ
 

 
 
शीला दीक्षित
शीला दीक्षित ने बेबाकी से अपनी ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं पर बात की
बीबीसी हिंदी की इस विशेष प्रस्तुति में हर सप्ताह आप भारत की जानी-मानी हस्तियों के जीवन के अनकहे पहलुओं के बारे में जानेंगे.

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के साथ - एक मुलाक़ात में हमने उनके निजी और सार्वजनिक जीवन के कई पहलुओं पर बातचीत की है.

पेश है इसी मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश-

रोज़ की बेतहाशा दौड़ में ख़ुद के साथ, दिल्ली में, जब आप दौड़ रही होती हैं तो उस समय अपने आपको, अपने दिमाग को आराम पहुँचाने के लिए आप क्या करती हैं?

नहीं, वो कूल डाउन होना ऐसे ही हो जाता है क्योंकि समस्याओं में बदलाव आता है न. होता यह है कि एक वक़्त हम पानी की समस्या से जूझ रहे होते हैं तो फिर अगले ही पल में शिक्षा के बारे में कुछ हो गया या तीसरे पल कहीं कोई घटना हो गई या कहीं पर एक्सिडेंट हो गया. फिर नीतियाँ भी बनानी हैं. अभी भी मुसीबतों को झेलना है और आगे भविष्य के लिए भी तैयार रहना है. ऐसे में जो विविधता है, जो विभिन्नता है, वहीं से एक रिलैक्सेशन हो जाता है.

थकान
 म्यूजिक भी सुनती हूँ, वॉक भी करती हूँ, सिनेमा भी देखती हूँ, नाटक भी देखती हूँ. बच्चों के स्कूलों में जो कार्यक्रम होते हैं, उसको देखती हूँ. कभी डॉक्टर बुला लेते हैं तो कभी वकील बुला लेते हैं. कभी बुक स्टॉल वाले प्रकाशक बुलाते हैं. इन कई तरह की चीज़ों में विविधता की वजह से कभी थकान महसूस नहीं होती है
 

जैसा कि आम लोग करते हैं, रिलैक्स करने के लिए अनुलोम-विलोम कर रहे हैं बाबा रामदेव का या कोई म्यूजिक सुनता है आईपॉड लगाकर, कुछ लोदी गार्डेन में घूमने जाते हैं. आपका इस तरह का कोई.... ?

नहीं-नहीं, मैं बिल्कुल करती हूँ. म्यूजिक भी सुनती हूँ, वॉक भी करती हूँ, सिनेमा भी देखती हूँ, नाटक भी देखती हूँ. बच्चों के स्कूलों में जो कार्यक्रम होते हैं, उसको देखती हूँ. कभी डॉक्टर बुला लेते हैं तो कभी वकील बुला लेते हैं. कभी बुक स्टॉल वाले प्रकाशक बुलाते हैं. इन कई तरह की चीज़ों में विविधता की वजह से कभी थकान महसूस नहीं होती है. कई दफ़ा थकान इसलिए हो जाती है क्योंकि एक काम करते-करते मन उकता जाता है. ये जो बदलाव होता रहता है वो अपने आप में आराम देता है.

अब हम आगे बढ़ें इस सफ़र में, इससे पहले आप बताएँ कि आपके पसंदीदा गाने कौन से हैं?

संगीत में शास्त्रीय भी बहुत पसंद है, पॉप भी बहुत पसंद है. जो मन में आ जाता है अच्छा लगता है. और कभी-कभी इतना ज़्यादा सुन लेती हूँ कि फिर मन उकता जाता है.

एआर रहमान बहुत अच्छे हैं. रोज़ा के बहुत अच्छे गाने दिए, जिसमें ‘छोटी सी आशा...’ मुझे बहुत प्यारा लगता है. उसमें उतार-चढाव भी है और उससे जो एक आशा प्रकट होती है, ख़ुशी की उम्मीद. वह बहुत खूबसूरत है.

इसके अलावा किशोर कुमार में बहुत विविधता थी और उनके गाने में एक बड़ा जोश था. अगर ग़मी का गाना था तो उसमें ग़म आता था, ख़ुशी का था तो उसमें उतार-चढ़ाव आता था.

वैसे लता मंगेशकर हमेशा ही पसंदीदा रही हैं. मेरे ख़्याल से इतनी विविधता और स्पष्टता शायद किसी और में नहीं होंगी.

संगीत
  मैं सारी रात कोई न कोई एफएम लगाए रखती हूँ या सीडी लगाए रखती हूँ. चलते ही रहते हैं. जिस वक़्त ज़रा-सी करवट लेती हूँ तो कानों में संगीत की धुन आती है. बहुत अच्छा लगता है.
 

मैं सोचती हूँ कि एसडी बर्मन का सबसे खूबसूरत संगीत था क्योंकि उसमें सुर, खूबसूरती, उत्साह और उतार-चढ़ाव सबकुछ आ जाता है. वो ‘बंदिनी’ के गाने... मैं समझती हूँ कि उससे खूबसूरत संगीत किसी और फ़िल्म में नहीं दिया है.

जो ये इतनी अलग-अलग रुचियाँ हैं, इससे लगता है कि आप ज़रूर गाती होंगी?

ना बाबा ना, मैं बिल्कुल नहीं गाती हूँ. मैं इसलिए नहीं गाती हूँ क्योंकि पहले गाया करती थी तो कुछ आवाज़ सुर से निकलती थी पर अब बिल्कुल नहीं निकलती है. अब उसकी जगह पर मैं कुछ संगीत लगा लेती हूँ. उसको सुन लेती हूँ तो गाने की आवश्यकता नहीं होती है. मैं सारी रात कोई न कोई एफएम लगाए रखती हूँ या सीडी लगाए रखती हूँ. चलते ही रहते हैं. जिस वक़्त ज़रा-सी करवट लेती हूँ तो कानों में संगीत की धुन आती है. बहुत अच्छा लगता है.

अरे क्या बात है आप तो संगीत में बहुत ही रुचि लेती हैं. कितनी अच्छी कल्पना है कि रात में जब कभी आँख खुले तो कुछ अच्छा-सा, मधुर-सा संगीत कानों में गूँजे.

आजकल परिणीता का संगीत बहुत अच्छा लगता है जिसमें विद्या बालन और सैफ़ अली ख़ान गाते हैं.

उसमें म्यूजिक बहुत प्रासंगिक या रेलिवेंट या मोडर्न होते हुए भी मेलोडियस है.

ट्रेन में फ़िल्माया गया गाना बहुत अच्छा है, रेखा वाला गाना भी अच्छा है. टाइम्स का गाना है. लेकिन मै सोचती हूँ कि जो मेलोडी उसमें आती है, डुएट के तौर पर गाते हैं वो बहुत खूबसूरत गाना लगा, उसकी लय बहुत अच्छी लगी.

आपको किस तरह की फ़िल्में अच्छी लगती हैं?

निर्भर करता है, जो मन को भा जाती है वही अच्छी लगने लगती है. कुछ फ़िल्में बहुत मशहूर मानी जाती हैं, वह मुझे नहीं अच्छी लगती है क्योंकि एक फ़िल्म क्या प्रभाव किस मन पर डालती हैं, वह उस पर निर्भर करता है. जो फ़िल्म अच्छी लगती है, उसे दो-दो या तीन-तीन बार देखती हूँ, क्योंकि उसकी हर चीज़ ग्रैंड करना चाहती हूँ.

अंतिम बार आपने कौन सी फ़िल्म तीन बार देखी हैं?

‘ओंकारा’. मेरा ख़याल है ज़्यादातर लोगों को पसंद आई. मुझे लगा कि इसे बहुत ही सुंदरता से, खूबसूरती से और हालाँकि उसकी भाषा कभी-कभी कानों को अच्छा नहीं लगती थी, खटकती थी. लेकिन, बहुत खूबसूरत फ़िल्म बनाई है.

मेरा ख़याल है कि शेक्सपियर की जो तासीर थी, पूरी जेलेसी की, पूरी ट्रेजडी की, उसको उसने बहुत अच्छी तरह से पकड़ा. लेकिन अब ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ भी भा गई है. उसे भी मैंने दो बार देखा है.

कोई चीज़ पसंद आ जाती है तो देख लेती हूँ और कुछ नहीं पसंद आती है तो दोबारा नहीं देखती.

ये तो बिल्कुल आज की हिट फ़िल्में हैं. ओंकारा या लगे रहो मुन्ना भाई. लेकिन आपकी सदाबहार फ़िल्में कौन-सी हैं और सदाबहार अभिनेता कौन-से हैं?

विमल रॉय की फ़िल्मों में से ‘बंदिनी’ बहुत अच्छी थी. मशहूर फ़िल्म जो बार-बार देखी उनमें से गुरुदत्त की फ़िल्म ‘प्यासा’ थी. बहुत अच्छी और ज़बर्दस्त लगी थी. मैंने ‘गाइड’ 10 बार देखी है और पाँच बार ‘ज्वेल थीफ़’ देखी है लेकिन ‘बंदिनी’ या ‘प्यासा’ ने काफ़ी प्रभाव छोड़ा. मुझे बहुत अच्छी तरह से पुरानी वाली देवदास याद तो नहीं है लेकिन वो पुरानी देवदास भी बहुत अच्छी थी, नई वाली में वो बात नहीं. एक बात है जो फ़िल्में बंगाल की कहानी पर आधारित होती हैं उनमें एक मार्मिकता होती है, साधारण इंसान की पहचान बहुत अच्छी तरह से हो जाती है और ये बहुत अच्छी लगती है.

आपने ‘ज्वैल थीफ़’ और ‘गाइड’ की बात की जो मेरी भी बहुत पसंदीदा फ़िल्म है. तो क्या आप भी देवानंद की फैन थीं?

हाँ, बिल्कुल थी. हम जब स्कूल में थे तो वो और कामिनी कौशल बहुत प्रिय थे और बहुत अच्छे लगते थे. मेरे ख़्याल से उस ज़माने में कोई स्कूल या कॉलेज की छात्रा नहीं होगी जिसको देवानंद से क्रश न हुआ हो. एक तो देवानंद का ग्रेगरी पेक से थोड़ा-बहुत मेल-जोल लगता था तो वह मन को बहुत अधिक भाता था. बाद में और बहुत सारे अभिनेता और अभिनेत्री आए. अशोक कुमार बहुत अच्छे थे, दिलीप कुमार बहुत अच्छे थे. दिलीप कुमार की एक फ़िल्म थी, ‘शहीद’ जो शायद बहुत लोगों ने नहीं देखी होगी, वह बहुत ही अच्छी और सशक्त फ़िल्म थी. उस वक़्त हम बच्चे थे. देश को आज़ादी तुरंत ही मिली थी तो उससे कुछ मेल भी ज़्यादा था और वह बहुत अच्छी फ़िल्म थी.

देवानंद के अलावा किससे आपको विशेष लगाव रहा?

वह वक़्त-वक़्त पर होता है. कुछ देर के लिए कोई पसंदीदा बन जाता है. एक तो जो अभिनेता या अभिनेत्री होते हैं, जिस चरित्र को पर्दे पर उतारते हैं उससे यदि मन जुड़ जाता है फ़िल्म में तो वह अभिनेता उस वक़्त पसंदीदा हो जाता है, जैसे देवानंद हुए, दिलीप कुमार हुए या अशोक कुमार.

देवानंद पर
 हाँ, बिल्कुल थी. हम जब स्कूल में थे तो वो और कामिनी कौशल बहुत प्रिय थे और बहुत अच्छे लगते थे. मेरे ख़्याल से उस ज़माने में कोई स्कूल या कॉलेज की छात्रा नहीं होगी जिसको देवानंद से क्रश न हुआ हो. एक तो देवानंद का ग्रेगरी पेक से थोड़ा-बहुत मेल-जोल लगता था तो वह मन को बहुत अधिक भाता था
 

लेकिन ज़िंदगी की खूबसूरती तो यही है कि हमेशा किसी से विशेष लगाव बना रहे. जैसे मेरी पत्नी को अभी शाहरूख़ ख़ान बहुत ज़्यादा पसंद हैं तो आपकी मौज़ूदा पसंद कौन हैं?

मैं सोचती हूँ सैफ़ अली ख़ान बहुत अच्छे हैं. शाहरूख़ खान बहुत अच्छे हैं. लेकिन इस वक़्त सैफ़ अली बहुत पसंद हैं जैसे ‘ओंकारा’ में उन्होंने बहुत ही अच्छा अभिनय किया है. सैफ़ ने ओंकारा में खलनायक का किरदार बहुत खूबसूरती से निभाया. इयागो के चरित्र को ऐसे निचोड़ कर रख दिया आपके सामने. मैं सोचती हूँ वह बहुत अच्छे कलाकार हैं. परेश रावल ने ‘गोलमाल’ और ‘मालामाल वीकली’ जैसी फ़िल्में की हैं. वह बहुत अच्छे कलाकार हैं. संजय दत्त बहुत अच्छे अभिनेता है. सर्किट वाले अरशद वारसी भी बहुत अच्छे अभिनेता हैं.

हाल में जो एक चलन है, चाहे ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ या ‘रंग दे बसंती’,‘लगान’ और ‘स्वदेश’ जैसी फ़िल्मों का. ये देशभक्ति के साथ राजनेताओं पर भी एक टिप्पणी है. उसके बारे में आपकी क्या सोच है?

देखिए, मैं समझती हूँ कि इन सब फ़िल्मों ने कुछ ऐसे पहलुओं को छुआ है जिसका एहसास सब करते हैं लेकिन न तो कोई वाणी होती है न संदर्भ होता है. मैं समझती हूँ कि प्रेम कहानी से इतर ये चीज़े उठकर आईं हैं. इनमें देशभक्ति भी है. जैसे ‘मुन्नाभाई’ में महात्मा जी को उस स्थान पर रखा जहाँ आज तक हम भगवान कृष्ण, विष्णु, शिव या राम को रखते हैं और उनसे वार्तालाप करते हैं वैसे ही कर दिया है. उन्होंने उठाकर आत्मबोध को सामने रख दिया और कहा कि अपने को टटोलो कि क्या ठीक है, क्या नहीं है. और, महात्मा गाँधी का कोई उसमें उपदेश नहीं है. कोई ऐसा नहीं है कि कोई वो स्वरूप लेकर आए हैं.

मैं सोचती हूँ कि इस फ़िल्म ने हमारी और हमारे युवाओं की चेतना को जाग्रत करने का प्रयास किया. महात्मा गाँधी ने कभी नहीं कहा कि कोई उनकी बात इसलिए माने कि वो राष्ट्रपिता हैं. फ्रेंड ऑफ द कंसेंस, फ्रेंड ऑफ द नेशन, फ्रेंड्स ऑफ द गुड सोसाइटी. गुड सोसाइटी की परिभाषा क्या है. सभ्यता की क्या परिभाषा है, मनुष्य की क्या परिभाषा है. वो इसमें आता है. फ़िल्म में जो बात महसूस होती है वो सबके अंदर है.

हालाँकि ‘रंग दे बसंती’ का जो अंत होता है वह थोड़ा-बहुत आतंक वाला है. उससे मुझे थोड़ी-सी तकलीफ हुई कि उसका समापन हिंसा की तरफ चला गया. लेकिन मुद्दे उसने उठाए और वह युवा पीढ़ी को बहुत पसंद आए. मेरे घर में भी बच्चों ने दो-दो दफ़ा देखा और वह बहुत पसंद आया.

जब आप बिल्कुल छोटी थीं, अपनी नातिन की उम्र की जो पास में ही खड़ी हैं तो क्या आप शरारती थीं या बड़ी धीर-गंभीर सोचने वाली हर मुद्दे पर या सिर्फ़ खेल-कूद में बिल्कुल मस्त, बिंदास?

नहीं, मस्त तो मेरे ख़्याल से हर बच्चे को होना चाहिए और हम भी थे. लेकिन मै यह नहीं कह सकती कि मैं कुछ ज़्यादा शैतान थी या कम शैतान थी.

पढ़ने में अच्छी थीं?

ठीक थी. बहुत अच्छी भी नहीं थी, बहुत बुरी भी नहीं थी. लेकिन शरारत तो जैसे सभी करते हैं, हमलोग भी करते थे. थोड़ी बहुत चोरियाँ भी करते थे, इसमें बड़ा मज़ा आया. किसी दुकान पर गए, छोटी-सी चीज़ उठा लें, किसी को पता ही न चले, अपने को हीरो समझ लिया.

आप तो ख़ासी बिगड़ी हुई लड़की थीं, माफ़ कीजिएगा?

बिगड़ी हुई कैसे. आपका मेरे बारे में यही ख़याल है मैं बिगड़ी हुई लड़की थी. मुझे बताइए कि कौन ऐसा होगा जिसने शरारतें नहीं की होंगी.

स्कूल के बाद आप पहुँची हॉट एंड हैपेनिंग गर्ल्स कॉलेज मिरांडा हाउस में. आप भी हॉट एंड हैपेनिंग थी या बहुत फ़ैशन वाली या मॉडर्न या समय से आगे चलने वाली या जैसी मिरांडा हाउस की छवि आम लोगों के दिमाग में होती है?

अगर आप जो यह स्पष्टता के साथ कहना चाहते हैं कि मिरांडा हाउस की लड़कियाँ ज़्यादा बदनाम होती थीं तो वह ज़रूर होती थी लेकिन उसमें बहुत सी अच्छी लड़कियाँ भी थीं. एक-दो लड़कियाँ उस ज़माने में वाकई ज़्यादा तेज़ हो जाती थीं क्योंकि उस ज़माने में आप लड़कों के साथ या सेन्ट स्टीफ़न कॉलेज के साथ या औरों के साथ कहीं कॉफी पीने भी चले गए तो एक चर्चा का विषय बन जाता था.

मुझे यह भी याद है मेरे माता-पिता से कहा गया था कि आप किस कॉलेज में भेज रहे हैं. मिरांडा की लड़कियाँ ज़्यादा बिगड़ी हुई होती हैं लेकिन मेरा ख़्याल है कि मेरे माता-पिता ने चुनाव करते वक़्त इस बात को नहीं देखा और अच्छे कॉलेज को देखा. मुझे नहीं लगता हम कुछ ज़्यादा फैशनेबुल थे या कुछ था. हाँ ठीक होना चाहिए. आजकल के फ़ैशन को देखें तो उसके आसपास भी हम लोग नहीं फटकते थे लेकिन साफ-सुथरे रहते थे.

पसंदीदा कलाकार
 मैं सोचती हूँ सैफ़ अली ख़ान बहुत अच्छे हैं. शाहरूख़ खान बहुत अच्छे हैं. लेकिन इस वक़्त सैफ़ अली बहुत पसंद हैं जैसे ‘ओंकारा’ में उन्होंने बहुत ही अच्छा अभिनय किया है. सैफ़ ने ओंकारा में खलनायक का किरदार बहुत खूबसूरती से निभाया.
 

आपकी व्यक्तिगत रुचि जँच-संवर के जाने की रहती थी या बेफ्रिक्र, बिंदास रहने जैसा प्रभाव था.

बेफिक्र तो नहीं था लेकिन बहुत ज़्यादा रखरखाव हो कि ज़रा-सी इधर से उधर कोई चीज़ न हो, ऐसा नहीं था. स्वाभाविक था. अच्छी दिलचस्पी थी लेकिन उस वक़्त फ़ैशन पर ज़्यादा ध्यान नहीं था. मैं अच्छी तरह से तैयार होने वाली छात्राओं में थी.

कॉलेज की ज़िंदगी के दौरान क्या आपकी अपने पति से मुलाक़ात हुई थी या और कोई दोस्त?

बहुत सारे लड़के दोस्त थे. उसमें कुछ ज़्यादा अंतर नहीं लगा. लेकिन इसके साथ-साथ यह भी एहसास हुआ कि प्यार 50 या 100 से नहीं, बल्कि प्यार बहुत अलग है, दोस्ती कुछ अलग है. दोस्त रहे. आज भी मेरे बहुत सारे पुरुष दोस्त हैं. मैं उनको कभी अपने महिला दोस्त से ज़्यादा अंतर नहीं करती. मैं अपने पति से प्यार करती थी और वो भी कॉलेज में थे.

वो सेन्ट स्टीफन कॉलेज में पढ़ते थे. लेकिन एमए में इतिहास की क्लास एक साथ होती थी. हम दोनों पढ़ाई में अच्छे थे लेकिन ऐसा नहीं था कि पढ़ाई सबकुछ है. हम कलास में पीछे बैठकर नॉट्स एंड क्रॉसेज खेलते थे. नॉट्स एंड क्रॉसेज की वजह से उसके साथ बातचीत भी चलती थी. एक दूसरे को संदेश भी भेजते थे तो उससे हो गया. भविष्य का कुछ मालूम नहीं था. बस..हो गया तो हो गया.

पहली बार जब आप अपने पति से मिलीं तो कैसी रही ? कहाँ जाकर चाय-कॉफी या कौन सी फ़िल्म देखी या नोट्स एंड क्रॉसेज से आगे कैसे बढ़े ?

नॉट्स एंड क्रॉसेज हो गए, मैसेज हो गए, कभी फ़िल्म चले जाते थे. विश्वविद्यालय से घर बस से आते थे. एक ही बस में आते थे. कोई ऐसा तय तिथि हो या किसी ने यह कहा हो कि हाँ आप इस रोज़ कॉफी-चाय के लिए चलते हैं, ऐसा कुछ नहीं था.

जब शादी हुई तो किसी के परिवार से कोई विरोध ?

मेरे परिवार से यह विरोध था कि यह तुमने क्या तय कर लिया है. इस लड़के के पास न नौकरी है न कुछ है. अभी तुम लोग पढ़ते हो, ये कोई तरीका नहीं है. किसी को तो अपने पैरों पर खड़ा तो होना चाहिए.

मेरा जवाब था कि उसने एमए किया है, सेंट स्टीफेन में पढ़ा है, मोडर्न स्कूल में पढ़ा है. कहीं न कहीं चपरासी की नौकरी तो मिल ही जाएगी. देखिए, ऐसा था उस वक्त रोमांस का आत्मविश्वास. मेरे सास-ससुर का यह कहना था कि मैं ब्राह्मण नहीं थी और मैं ब्राह्मण परिवार में आना चाहती हूँ.

मेरी सास के लिए तो ख़ासतौर से समझिए कि दुनिया ही फट गई कि ये क्या हो गया और फिर उन्होंने कहा कि वो मिरांडा हाउस की लड़की है और पता नहीं कैसी होगी, क्या नचा देगी, क्या कर देगी. बहुत विरोध रहा. हमें करीब तीन वर्ष तक रूकना पड़ा था. फिर उनको मनाया. पहले खुश नहीं थी पर बाद में ठीक हो गया सब कुछ.

शादी का विरोध
 मेरी सास के लिए तो ख़ासतौर से समझिए कि दुनिया ही फट गई कि ये क्या हो गया और फिर उन्होंने कहा कि वो मिरांडा हाउस की लड़की है और पता नहीं कैसी होगी, क्या नचा देगी, क्या कर देगी. बहुत विरोध रहा
 

यह तो बहुत सुखद अंत वाली संबंध रहा और उसके बाद शादी हो गई. आपकी सास सोचती थीं कि ये नॉन ब्राह्मण और मिरांडा हाउस की लड़की आकर सबको नचा देगी आपने वैसा ही किया फिर ?

नहीं बाबा. इतनी हिम्मत नहीं थी बल्कि अपने आपको साबित करने के लिए दोगुना-तिगुना कड़ी मेहनत करनी पड़ती कि कहीं कोई उनको ठेस न पहुँचाए या अनादर न हो सके. मुझे आज भी याद है कि मैने अपने पिताजी को एक पोस्टकार्ड लिखा था जब मैं घूँघट के नीचे बैठी हुई थी लिखा कि मुझे लगता है कि मैं 16वीं सदी में पहुँच गई हूँ. लेकिन उसके पश्चात मेरे सास-ससुर मेरे पर ज़्यादा निर्भर करने लगे थे. अंत तक दोनों मेरे साथ रहे. मेरे ख़्याल से शादी के दो-तीन वर्ष अलग ज़रूर रहे. जब उनको एहसास हो गया कि ये ठीक है तो फिर उन्होंने मुझे वो आज़ादी दी जो शायद किसी और को नहीं देते.

राजनीतिक परिवार में आपका ससुराल था. आपके पति एक आईएएस अधिकारी थे. आपकी सियासत में किस तरह से रुचि बढ़ी, फिर कैसे आप राजनीति में आईं?

देखिए, रुचि तो मेरी बिल्कुल नहीं थी. जब मैं अपने सास-ससुर के साथ रही और ससुर के कामकाज को देखने लगी, क्योंकि वो उस ज़माने में गृहमंत्री थे. कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे. खजांची भी रहे. राज्यपाल भी रहे.

उस ज़माने में सचिव और कर्मचारी या चपरासी कुछ भी नहीं होता था, सब काम मैं ही करती थी. घर भी मैं ही देखती थी, उनके कार्यक्रम भी मैं ही देखती थी, जब वे बीमार होते तो उनसे मिलने आने वालों की चिंता भी मैं करती थी.

राजनीति में आगमन पर
 जब 1984 में इंदिरा जी की हत्या हुई और राजीव गाँधी आए और 1984 के चुनाव में जब कहा गया कि आप लड़िए तब मैं कूद पड़ी. मुझे कुछ पता नहीं था कि क्या करना होता है.
 

जब 1969-70 में कांग्रेस में टूट हुई और इंदिरा जी अलग हुईं तो उससे पहली मर्तबा प्रेरणा मिली की सही मायने में महिलाओं को भी आगे आना चाहिए. ऐसा कुछ नहीं था कि मैं ख़ुद चली आऊँ लेकिन जब 1984 में इंदिरा जी की हत्या हुई और राजीव गाँधी आए और 1984 के चुनाव में जब कहा गया कि आप लड़िए तब मैं कूद पड़ी. मुझे कुछ पता नहीं था कि क्या करना होता है.

जब पहली किसी जनसभा में गईं और लोगों ने घेर लिया तो आप विचलित हुईं या आत्मविश्वास के साथ बोलीं?

टाँगें मेरी काँप रही थी, हाथ काँप रहे थे. मुझे यह भी मालूम नहीं था कि जीतेंगे भी तो कैसे. मैं अपने पति को खो चुकी थी. लेकिन राजनीति से बहुत ज़्यादा लगाव हो ऐसा कुछ नहीं है. आज भी नहीं है. जिसको ‘राजनीति’ कहा जाता है उसमें शायद दिलचस्पी नहीं है और शायद उसके काबिल भी मैं नहीं हूँ.

सियासत के जो उतार-चढ़ाव आते हैं, उखाड़-पछाड़ होते हैं, दाँव-पेंच होते हैं, उसमें आप तो बहुत पारंगत और सही नज़र आती हैं?

यह तो मैं नहीं बता सकती इसका क्या कारण हो सकता है लेकिन शायद यह कि उसमें मैं पड़ती नहीं हूँ. जो काम नहीं आता उससे दूर रहती हूँ. अगर दाँव-पेंच के माध्यम से करना हो तो वह मैं नहीं कर सकती. लेकिन कुछ लोगों का राजनीति के क्षेत्र में विश्वास होगा तभी यह हो पाता है.

क्या आपका इशारा सोनिया गाँधी की तरफ़ है जो कांग्रेस की अध्यक्ष हैं और जिनके बारे में लोग कहते हैं आपको उनका आशीर्वाद और सहयोग प्राप्त है? क्योंकि बहुत कम लोग बहुत कम चीज़ जानते हैं सोनिया जी के बारे में, तो क्या ऐसी बात आप बता सकती हैं जो संवेदनशील न हो?

उन्होंने बहुत कष्ट और समस्याएँ झेली हैं. ऐसा शायद साधारण परिवार में हो या न हो. वो बहुत बुद्धिमान हैं और लगनशील हैं. हमारे जैसे लोगों को लगता है कि वो बहुत सीधी-सादी हैं और किसी दाँव-पेंच में नहीं पड़तीं. वो जो एक कैमिस्ट्री मिलती है इसीलिए लोगों को लगता होगा कि वो मेरा समर्थन करती हैं.

एक महिला और सफल राजनीतिज्ञ हैं आप लेकिन क्या आपको लगता है कि महिलाओं के राजनीति में आने पर अभी भी पुरुष पक्षपात करते हैं जो उन्हें कहीं आगे बढ़ने से रोकता है?

देखिए दोनों ही बातें हैं. महिलाओं को इतनी हिम्मत रखनी पड़ेगी कि राजनीति में उतार-चढ़ाव को झेल सकें क्योंकि ऐसा बहुत ज़्यादा होता है. चाहे आप कोई भी हों या किसी भी परिवार से हों. आप आज मुख्यमंत्री हैं कल कुछ भी न रहेंगे तो यह उतार-चढ़ाव होता रहता है. युवा पीढ़ी की लड़कियों के लिए अब हर तरह के करियर हैं. अब कितनी सारी महिलाएँ कॉर्पोरेट सेक्टर में सीईओ बन रही हैं. पसंद आपके सामने है. आप कम उतार-चढ़ाव वाले करियर को चुनेंगे या राजनीति को, जिसमें परेशानियाँ और उतार-चढ़ाव अधिक है.

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पर
 एक ट्रेजडी ज़रूर होती है क्योंकि हम कहते हैं कि 33 प्रतिशत (आरक्षण) हम दे देंगे और सोनिया गाँधी हमारी अध्यक्ष हैं. वे भी कहती हैं हम करेंगे और जब बात सामने आती है दिक्कत हो जाती है दो प्रतिशत या एक प्रतिशत भी नहीं हो पाता है,
 

एक ट्रेजडी ज़रूर होती है क्योंकि हम कहते हैं कि 33 प्रतिशत (आरक्षण) हम दे देंगे और सोनिया गाँधी हमारी अध्यक्ष हैं. वे भी कहती हैं हम करेंगे और जब बात सामने आती है दिक्कत हो जाती है दो प्रतिशत या एक प्रतिशत भी नहीं हो पाता है, तो ये दोनों तरफ़ का ही है. उनका कहना है कि औरतें उपलब्ध ही नहीं है, कोई आता ही नहीं है. दूसरे, वो कहते हैं हम उपलब्ध हैं और हमें प्राथमिकता ही नहीं देते. यहाँ दोनों ही पक्ष सही है. कुछ पक्षपात भी है कि महिला, पता नहीं, कर सकेगी या नहीं. उतनी ही पढ़ी लिखी हों तो कुछ सामाजिक कार्य कर लेंगी, शिक्षा, पर्यटन, सांस्कृतिक काम कर लेगी. ज़्यादा से ज़्यादा हेल्थ कर लेंगी लेकिन जो मुख्य मंत्रालय है वो पुरुष वर्ग के लिए ही है.

आप सोनिया गाँधी और स्वयं को अलग रखें, जो दूसरी महिला राजनीतिज्ञ हैं सुषमा स्वराज, वृंदा कारत, वसुंधरा राजे, अंबिका सोनी और रेणुका चौधरी उनमें सबसे ज़्यादा स्मार्ट कौन लगती हैं? किसमें सबसे ज़्यादा संभावना दिखती है?

ये तो कहना बड़ा मुश्किल है. आप उमा भारती को देख लीजिए, उनमें कुछ ऐसे गुण हैं, वे साहसी हैं और थोड़ी करिश्माई भी हैं. वृंदा जी का अपना तरीका है आर्टिकुलेट हैं, अंबिका जी भी बहुत आर्टिकुलेट हैं लेकिन इनमें कोई संपूर्ण नेता हो ये अभी नहीं दिखाई देता.

ऐसा कुछ जो आप अपनी पारी ख़त्म होने से पहले ज़रूर करना चाहती हैं कि ये तो मुझे करने का बेहद मन है चाहे वह छोटी सी ही चीज़ क्यों न हो?

मैं अपने जीवन के अनुभवों का दस्तावेज़ीकरण करना चाहती हूँ.

आप एक क़िताब लिखना चाहती हैं जो आपके अंदर ही कहीं छुपी हुई है?

बिल्कुल. लेकिन यह क़िताब सिर्फ़ मुझसे जुड़ी हुई नहीं होगी बल्कि मेरे समय के अच्छे अनुभवों से जुड़ी होगी. मुझे लगता है कि हमारी पीढ़ी के लोगों ने काफ़ी ख़ुशगवार समय गुज़ारा है. हमने महान नेता देखे, बड़े स्तर पर विकास होते देखा और अपनी महान संस्कृति को बनते देखा. मैं इन पलों को शब्दबद्ध करना चाहती हूँ.

सीनिसिज्म (कटुता) जो आज है उसे शायद एक पुस्तक के माध्यम से ख़त्म करने की कोशिश कर सकती हूँ क्योंकि और तो माध्यम है नहीं मेरे पास, अगर एक पुस्तक के माध्यम से जो कर सकूँ. शायद एक अधूरे काम को पूरा कर सकती हूँ.

यह तो बहुत ही अच्छी सोच है क्योंकि आज के युवा पीढ़ी में एक सीनिसिज्म है. लेकिन आपको नहीं लगता कि भविष्य शायद इतना आशावादी नहीं है या वो आपको ज़्यादा आशावादी लगता है?

मैं अधिक आशावादी महसूस करती हूँ. एक पेंडुलम की तरह जितना इंसान को मिलता है उतना ही असंतोष बढ़ता रहता है. इंसान कभी संतुष्ट नहीं हो सकता. मैं बताऊँ मेरे घर पर एक माली है, बेचारा 50-55 साल का है. काँटे की तरह सूखा हुआ है.

 मेरे लिए भगवान का कोई रूप नहीं है. कोई एक शख़्सियत है, चीज़ है जो हम लोगों को भिन्न बनाती है, दिशा में ले जाती है. मैं उसपर विश्वास करती हूँ लेकिन आज तक मैंने कभी उसे रूप नहीं दिया है.
 

कुछ दिन पहले ही मुझे पता चला कि उसे कोई पदोन्नति ही नहीं मिली और वह माली का माली रह गया. लेकिन वह बाग बगीचे के एक-एक पत्ते से प्यार करता है चाहे रविवार हो, मोहर्रम हो, दीवाली या कुछ भी हो. वह इंसान यहाँ आकर अपना काम इतनी तत्परता से करता है और इस बगीचे का कोई ऐसा पत्ता नहीं है जिससे वो परिचित न हो. इतना संतोष है उसे कि आज तक मुझसे यह नहीं कहा कि मुझे रोका गया है, मैं हेड माली बन जाऊँ. ऐसे आदमी से प्रेरणा मिलती है. इसके पास पैसे नहीं है लेकिन इसके पास संतोष है.

आप भगवान में विश्वास करती हैं?

मेरे लिए भगवान का कोई रूप नहीं है. कोई एक शख़्सियत है, चीज़ है जो हम लोगों को भिन्न बनाती है, दिशा में ले जाती है. मैं उसपर विश्वास करती हूँ लेकिन आज तक मैंने कभी उसे रूप नहीं दिया है.

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अपने जीवन में सबसे दुस्साहसी काम क्या किया है?

मुझे आज भी जो चीज़ बहुत अच्छी लगती है वो यह है कि मैं गाड़ी चलाऊँ और 110 से 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलाऊँ कि लगे कि गाड़ी नहीं चल रही है बल्कि हवाईजहाज़ ज़मीन पर उड़ रहा है.

शीला दीक्षित के साथ ‘एक मुलाक़ात’ सुनिऐ बीबीसी हिंदी पर – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19,25,41 और 49 मीटर बैंड पर भारतीय समयानुसार रात आठ बजे. दिल्ली और मुंबई के श्रोता रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.

 
 
आडवाणीएक मुलाक़ात- आडवाणी
जाने-माने लोगों के जीवन के अनछुए पहलुओं पर कार्यक्रम की शुरुआत.
 
 
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08 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस
सीलिंग के ख़िलाफ़ फिर दिल्ली बंद
07 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस
दिल्ली में अतिक्रमण हटाओ अभियान
19 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस
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