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शनिवार, 16 दिसंबर, 2006 को 20:00 GMT तक के समाचार
 
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एक मुलाक़ात- इरफ़ान पठान के साथ
 

 
 
इरफ़ान पठान
इरफ़ान पठान हरफ़नमौला खिलाड़ी के रूप में उभरे हैं
बीबीसी हिंदी की इस विशेष प्रस्तुति में हर सप्ताह आप भारत की जानी-मानी हस्तियों के जीवन के अनकहे पहलुओं के बारे में जानेंगे.

क्रिकेट खिलाड़ी इरफ़ान पठान के साथ- एक मुलाक़ात में हमने उनके निजी और सार्वजनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की.

पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ खास अंश -

बीच में ऐसा लग रहा था कि थोड़ा मोटापा आ गया था, लेकिन आपने अपना वज़न काफी सही कर लिया है

नहीं, मोटापा नहीं था. मैं वेट ट्रेनिंग में काफी ध्यान दे रहा था. जैसे आप वेट ट्रेनिंग करते हैं तो थोड़ा मोटे नज़र आते हैं, लेकिन मैने पिछले एक साल से ‘वेट्स’ करना कम कर दिया है, जिससे मेरे क्रिकेट में काफी फ़र्क भी पड़ा है और प्रदर्शन में सुधार हुआ है.

इसलिए अब रनिंग पर ज़्यादा ध्यान दे रहा हूँ, वेट्स भी करता हूँ. जिम में बेंच प्रेस वगैरह. लेकिन पहले जितना नहीं कर रहा हूँ क्योंकि जब ज़्यादा क्रिकेट खेलते हैं तो वेट ट्रेनिंग कम करनी पड़ती है और ख़ासकर पिछले एक दो साल में जितना क्रिकेट हुआ है, उतना पहले नहीं होता था. मैं थोड़ा व्यस्त भी था और उतना ध्यान नहीं दे पाता था. लेकिन ऐसा नहीं था कि जब मैं थोडा ‘बल्की’ (मोटा) था तो गेंदबाजी पर विपरीत असर पड़ रहा था.

मैं ज़्यादा स्ट्रौंग महसूस कर रहा था. बस यही था कि वेट्स उठाने पर ज़्यादा ध्यान दे रहा था.

शाहरुख़, सलमान जैसे हीरो टाइप लोगों से मिलता हूँ तो मुझे लगता है कि उन्हें काफ़ी पसीना बहाना पड़ता है?

करना पडता है, काफी ट्रेनिंग करनी पड़ती है. सबका अलग होता है. किसी को वेट्स पर ज़्यादा ध्यान देना होता है, तो किसी को कुछ और, लेकिन सबमें संतुलन ज़रूरी है. वही मैं सीख रहा हूँ.जब तक आप क्रिकेट खेल रहे हैं तब तक तो आपको सीखना ही है. मेहनत तो करनी ही है. नेट प्रैक्टिस करनी होती है. इसके अलावा फील्डिंग, बॉलिंग, बैटिंग इन सब पर अतिरिक्त ध्यान देना होता है. ये सब करना पड़ता है. अग़र आप कुछ पाना चाहते हैं तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगी.

आपकी लाइफ ‘ड्रीम लाइफ’ रही है. मैं आपके घर भी गया हूँ. ऐसी पृष्ठभूमि से उठकर आना और इतना नाम कमाना. शुरू से ही इतनी लगन थी क्या?

शुरू से ही. मेहनत तो करते थे. लगन थी. मैं और मेरा भाई क्रिकेट खेलते थे. दोनो को क्रिकेट का बहुत शौक था. पहले मुहल्ले में खेलते थे. बाद में माँ-बाप और अंकल ने हमें बड़ौदा स्पोर्ट्स क्लब में दाख़िला दिलाया. जब से अंडर-14 खेलना शुरू किया तो स्कूल के आख़िरी के दो पीरियड छोड़कर प्रैक्टिस करने जाते थे. शुरू से ही जुनून और लगन तो थी ही.

उस वक्त में मुश्किल और संघर्ष के दौर में किस-किस तरह के ‘सैक्रिफाइस’ करने पड़ते थे?

सच कहूँ तो स्ट्रगल कभी ख़त्म नहीं होता. पहले जो संघर्ष होता था वो अलग किस्म का था, अब अलग है. जब तक हम क्रिकेट खेलेंगे और जब तक जिएंगे, तब तक स्ट्रगल करते रहेंगे. लेकिन इस स्ट्रगल को कैसे हैंडल करते हैं वो ज़रूरी है.

 सच कहूँ तो स्ट्रगल कभी ख़त्म नहीं होता. पहले जो संघर्ष होता था वो अलग किस्म का था, अब अलग है. जब तक हम क्रिकेट खेलेंगे और जब तक जिएंगे, तब तक स्ट्रगल करते रहेंगे. लेकिन इस स्ट्रगल को कैसे हैंडल करते हैं वो ज़रूरी है
 
इरफ़ान पठान

शुरुआत में हमने सोचा नहीं था कि ये स्ट्रगल है. जिस तरह से साइकिल पर मैं और मेरे भाई का डबल सवारी जाना, अच्छे पैड्स, बैट, जूते न होना, लेकिन हमने सोचा कि जो हमें मिल रहा है कई लोगों को इतना भी नहीं मिलता.

इस तरह से सोचा. मैं और मेरा भाई बहुत लकी हैं जो हमें उस तरह के माँ बाप नहीं मिले. हम अमीर नहीं थे, लेकिन कभी किसी चीज के लिए मना नहीं किया. बेशक हमने भी कभी बहुत ज़्यादा डिमांड नहीं की. अभी जैसे पाँच हज़ार के जूते पहनते हैं पहले 500 के जूते पहनते थे. पहले कभी ये नहीं कहा कि पाँच हज़ार के जूते पहनने हैं. स्ट्रगल होती है और हर जगह होती है.

ये आपने बहुत ठीक कहा. क्या कोई गाना पसंद है?

बहुत. मेरे पास लेपटॉप पर आठ हज़ार गाने हैं और आइपॉड पर तीन हज़ार. लकी अली के गाने बहुत पसंद हैं

बचपन में जब डबल सवारी करते हुए जाते थे तब भी क्या लड़कियाँ इसी तरह फ़िदा होती थीं?

ईमानदारी से कहूँ तो बचपन में मैं बहुत शर्माता था और स्कूल में मैं लड़कियों के पास तक नहीं बैठ पाता था. लड़कियों से बात करने में मुझे बहुत शर्म आती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अभी बिना शर्माए बात कर लेते हैं.

अब कितने बेशर्म हो गए हैं?

नहीं बेशर्म तो नहीं हुए हैं. लेकिन मैं समझता हूँ कि मुझमें आत्मविश्वास आ गया है. ऐसा नहीं है कि कोई लड़की बैठी है उससे बात कर लें. लेकिन अग़र कोई लड़की बात करती है तो अच्छे से बात करो और विश्वास के साथ.

बेशर्म तो नहीं हुए हैं, बेशर्म हुए तो घर से बाहर निकाल देंगी अम्मी. लेकिन कॉनफीडेंट हो गए हैं.

अभी हाल ही में कॉनफ़ीडेंटली कौन सा विकेट लिया है?

वो वाला विकेट लेने में तो अभी बहुत टाइम है. अभी ग्राउंड वाला विकेट लेने की तैयारी चल रही है. लेकिन बचपन में थोड़ा लगता था कि लड़की है उससे कैसे बात करेंगे. कभी साथ में नहीं बैठता था. हमेशा सबसे पीछे अकेले बैठता था. लड़कियों के साथ कभी नहीं बैठता था. कभी ध्यान ही नहीं दिया कि लड़कियाँ मरती हैं. वो तो जब बडे़ हुए तब पता चला...

कोई दूसरी साइकिल वाली पसंद आती थी?

जैसा मैने कहा कि मैं बहुत शर्माता था, लडकियों से बातें नहीं करता था. अपने काम के प्रति बहुत समर्पित था. मेरी दुनिया बहुत छोटी थी. स्कूल से ग्राउंड, ग्राउंड से घर और स्कूल. ये तीन चीजें थी मेरे लिए. घर मेरा मस्जिद में था. सो वहाँ घर तो दो-तीन ही होते हैं. वहाँ पर इतनी लड़कियाँ नहीं होतीं.

 ईमानदारी से कहूँ तो बचपन में मैं बहुत शर्माता था और स्कूल में मैं लड़कियों के पास तक नहीं बैठ पाता था. लड़कियों से बात करने में मुझे बहुत शर्म आती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अभी बिना शर्माए बात कर लेते हैं.
 
इरफ़ान

दोस्तों के घर भी बहुत कम जाते थे और जाते भी तो ज़्यादा देर नहीं रुकते थे. माँ बडी चिंता करती थी. घर में नौ बजे होना ज़रूरी था. हमें घर में रहना ही पसंद था. वैसे भी हम दो भाई आपस में मस्त रहते थे.

मस्जिद में भी क्रिकेट खेली?

मस्जिद में खेलते थे, लेकिन एक तरफ़. नमाज़ पढने वालों की कई बार गालियाँ भी खाई हैं. लेकिन ज़्यादा नहीं खेल पाते थे. मस्जिद में क्रिकेट नहीं खेल पाते थे, इसलिए मुहल्ले में खेलने जाते थे.

फिल्म अभिनेत्री कौन सी पसंद है?

जूही चावला. इसलिए नहीं कि वह लड़की है बल्कि इसलिए कि वह अच्छी अभिनेत्री है इसलिए उन्हें पसंद करता हूँ.

फिल्में देखने का शौक रहा है तो कौन से पसंदीदा एक्टर हैं?

जूही चावला. और मुझे पसंद हैं परेश रावल. सिर्फ कॉमेडियन नहीं. मुझे लगता है कि वह कोई भी किरदार कर सकते हैं. ख़ैर अमिताभ तो अपनी जगह हैं.

परेश रावल में ऐसी प्रतिभा है कि वह हीरो, विलेन, कॉमेडियन यानी हर किरदार निभा सकते हैं. अग़र उनकी फ़िल्म टीवी पर आ रही है और मैं क्रिकेट प्रैक्टिस नहीं कर रहा हूँ तो पूरी कोशिश करूंगा कि उनकी फ़िल्म ज़रूर देखूँ. मुझे नहीं लगता कि कोई उनसे अच्छी कॉमेडी कर सकता है.

उनकी हेराफेरी शानदार थी. वो असल में गुजराती हैं, लेकिन उन्होने मराठी की जोरदार भूमिका की है. ख़ास बात ये है कि वो बिना हँसे कॉमेडी करते हैं.

हॉलीवुड के एक्टरों में विल स्मिथ. उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा है. मुझे ऐसे लोग पसंद हैं जिनके पास अच्छा सेंस ऑफ ह्यूमर होता है.

 ये जीवन में ज़रूरी है. सेंस ऑफ ह्यूमर में कभी-कभी क्या होता है कि बात संभालनी पड़ती है. ऐसी बात करनी होती है जो सामने वाले को बुरी न लगे
 
पठान

ये जीवन में ज़रूरी है. सेंस ऑफ ह्यूमर में कभी-कभी क्या होता है कि बात संभालनी पड़ती है. ऐसी बात करनी होती है जो सामने वाले को बुरी न लगे.

एक बात बताता हूँ मेरी मम्मी ने रोजा रखा हुआ था और वो हमारे लिए कबाब बना रही थीं. उन्होंने मेरे भाई से कबाब में नमक मिर्च चखने के लिए कहा. भाई ने मम्मी को परेशान करने के लिए मना कर दिया. फिर माँ ने मुझसे कहा...चल छोड़ वो तो बेकार है तू टेस्ट कर ले. भाई ने पीछे से इशारे से मुझे भी मना किया. मैने भी टेस्ट नहीं किया और मम्मी को बुरा लग गया.

मजाक का बड़ा शौक है. टीम में भी धोनी, रैना आरपी के साथ मजाक चलती रहती है. एजग्रुप भी ज़्यादा बड़ा नहीं है. हम उनके साथ कोई भी मजाक कर सकते हैं और हम मजे करते हैं. जैसे हमेशा मैच तो जीत नहीं सकते, लेकिन हम टीम में हँसता खेलता माहौल बनाने की कोशिश करते हैं.

हार पर अफ़सोस तो हमेशा ही होता होगा, लेकिन कभी-कभी क्या बहुत दुख होता है कि यार ये क्या हो गया?

होता है. स्वाभाविक है दुख तो होता ही है. जिस तरह हमारे लोग हार से बहुत ज़्यादा दुखी हो जाते हैं. लेकिन उनसे ज़्यादा दुख हमें होता है क्योंकि हमें लगता है कि हमने इतने सारे लोगों को निराश किया है और टीम हारती है.

ये 11 लोगों का गेम है, हार से हमें दुख ज़रूर होता है. लेकिन हम ये भी तो नहीं कह सकते कि हार के लिए ये दोषी है या वो. ऐसा होना भी नहीं चाहिए. इसलिए टीम में अच्छा माहौल बनाने की कोशिश करते हैं. माहौल उदास रहेगा तो टीम पर नकरात्मक असर डालेगा.

लोगों की चाहत बदलती रहती है. ऐसा नहीं है कि जो इरफ़ान पठान के फैन हैं वो पठान चाहे अच्छा करे या न करे, हमेशा प्रशंसक बने रहेंगे. लेकिन उनका वर्ग अलग होता है. आम प्रशंसक की नज़र में आप अगर अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो हीरो हो नहीं तो नहीं..

ऐसा किसी हद तक ठीक भी है, लेकिन कई बार फ्लाइट, एयरपोर्ट में तानें भी सुनने पड़ते हैं.

क्या कोई ख़ास हार का सबसे ज्यादा दुख है जो मन में चुभती है?

चाहे दुनिया की नंबर वन टीम हों, हारती तो है ही. सिर्फ़ एक हार ही नहीं. मुझे सारी जीत और हार याद है. ये नहीं बोल सकते कि ये हार मुझे बहुत बुरी लगी. हारना हमेशा बुरा लगता है, चाहे एक रन से हारें या बहुत बुरी तरह से. बुरा तो ज़रूर लगता है.

ऐसा नहीं होता कि खेल को खेल की भावना से खेलो?

होता है. खेल भावना से खेलना ज़रूरी है, लेकिन जीतना बहुत ज़रूरी है.

हाल में पठान बल्लेबाज़ के रूप में भी चमकने लगे और कई बार चौके, छक्कों की बौछार की अच्छी पारियाँ खेली. क्या आपको मालूम था कि आपके भीतर एक बल्लेबाज़ छुपा हुआ था या आप बचपन से ही ऑलराउंडर बनने की चाहत थी?

बल्लेबाज़ी का बचपन से ही शौक था. अंडर-16 में बड़ौदा के लिए तीसरे नंबर पर बल्लेबाज़ी कर चुका हूँ. बाकी सब तो नसीब की बात है और सही टाइम पर सही मौका मिलने की बात होती है. लेकिन टीम के लिए गेंदबाज़ी करना मेरा प्रमुख काम है, बल्लेबाज़ी बाद में.

आपको गाने का भी शौक है.

मुझे पता था कि आप इस पर ज़रूर आएंगे. मैं गाता ज़रूर हूँ, लेकिन माइक पर कभी नहीं गाऊंगा. अग़र किसी दिन मुझे गाना ही होगा तो एलबम ही निकालूंगा, लेकिन माइक पर नहीं गाऊंगा.

खाने का शौक है?

खाने का बहुत शौक है. इंसान दिन भर मेहनत करता है, थका हारा घर आता है, तो वह क्या चाहता है. बस अच्छा सा खाना हो. मुझे बिरयानी पसंद है. इंडियन, चाइनीज, थाई, इटालियन, कॉंटिनेंटल फूड पसंद है. विदेशी दौरों पर जाने पर हमें हर तरह के भोजन की आदत डालनी पड़ती है क्योंकि हर जगह भारतीय खाना नहीं मिलता.

जब मैं पहली बार ऑस्ट्रेलिया गया तो कुछ नहीं खाता था. लक्ष्मण भाई मुझसे कहते थे कि कुछ तो ट्राई करो. एक बार उन्होंने पाश्ता खाने के लिए साथ चलने को कहा, पर मैं गया ही नहीं. फिर उनकी बात को ध्यान में रखकर मैने कोशिश की और बाद में मुझे आदत भी हो गई.

ऑस्ट्रेलिया में पहली बार प्रैक्टिस मैच के दौरान लंच में चूंकि खाना हलाल नहीं था, इसलिए मुझे सिर्फ़ चावल और दूध खाना पडा. मुझे अहसास हुआ कि मुझे हर चीज खानी चाहिए. फिर मैने पाश्ता और हर चीज खानी शुरू कर दी.

अच्छा और किस तरह के शौक हैं. हल्का, फुल्का, सीरियस. कुछ पढ़ने लिखने का शौक भी रखते हैं क्या?

पढ़ाई करना ज़रूरी है, मैं तो बच्चों से भी यही कहना चाहूँगा कि पढ़ाई करनी चाहिए. मैं अपने आपको इस मामले में थोड़ा सा बदकिस्मत मानता हूँ कि मैं ज़्यादा पढ़ाई नहीं कर पाया.

चूँकि जब भी मेरी बारहवीं की परीक्षा होती थी तब या तो पाकिस्तान जाना होता था या पाकिस्तान की टीम भारत में होती थी या फिर कोई और टूर्नामेंट चल रहा होता था. किस्मत से करियर भी बन गया और अभी बन रहा है. इसलिए इतना अफ़सोस नहीं है.

फिर भी मुझे शौक था पढ़ाई का. मैं ठीक-ठाक छात्र था. सिर्फ़ एक महीना पढ़ाई करके 60-70 प्रतिशत नंबर आ जाते थे. यहाँ तक कि दसवीं में भी सिर्फ़ 20 दिन पढ़ाई करके अच्छे नंबर आ गए थे. मेरा यही है जो भी काम करता हूँ दिल से करता हूँ वरना नहीं करता.

लेकिन टेकसैवी आप लगते हैं. क्योंकि लेपटॉप, आइपॉड की बात कर रहे हैं तो कंप्यूटर वगैरह का शौक है?

हाँ गाने, फ़नी वीडियोज डाउनलोड करते रहते हैं. कभी चैटिंग कर ली. पर ज़्यादा वक्त नहीं मिलता है. ज्यादातर टाइम मैं मूवीज के लिए रखता हूँ.

आप समझ ही गए होंगे कि मेरा दिमाग कहाँ अटका है. तो ये चैटिंग किससे होती है जनाब?

दोस्त से होती है. काफी दोस्त हैं उनसे होती है.

चैट गर्ल फ्रेंड भी हैं आपकी?

आप ये बताएँ आपका ध्यान अभी उधर ही अटका है क्या. लेकिन ईमानदारी से कहूँ तो ऐसा नहीं है कि लड़कियाँ मेरी दोस्त नहीं हैं.

लेकिन इश्क विश्क नहीं है अभी या है?

इश्क विश्क है, लेकिन क्रिकेट से है. देखिए आप चाहे कान इधर से पकड़ें या उधर से आपको जवाब एक ही मिलने वाला है.

अच्छा ये बताएँ ड्रेसिंग रूम में आप किस क्रिकेटर से प्रेरणा लेते हैं?

सीनियर प्लेयर हैं जैसे राहुल द्रविड़ हैं, गांगुली हैं और सचिन भाई. सचिन हमेशा सकारात्मक बातें करते हैं. ख़ासकर मेरे करियर में शुरू के एक डेढ साल में उन्होंने मेरी काफी मदद की. मिड ऑफ पर खड़े होकर मुझे कुछ न कुछ बताते रहते थे. ड्रेसिंग रूम में भी इन तीन चार खिलाड़ियों की मौजूदगी का अहसास होता है. एक अलग ही माहौल होता है.

इतने दबाव में वो लोगों से कैसा बर्ताव करते हैं और परिवार के साथ कैसे रहते हैं वह काबिलेतारीफ़ है. कोई और आदमी ऐसा नहीं कर सकता.

वैसे सचिन की तो जैसे क्रिकेटप्रेमियों में भगवान जैसी हैसियत है, लेकिन कभी-कभी ऐसा नहीं लगता कि वो बहुत ही संजीदा हैं?

पठान
इरफ़ान पठान इन दिनों अपनी बल्लेबाज़ी पर भी ध्यान दे रहे हैं

सचिन अपने काम के प्रति बहुत समर्पित हैं. लेकिन वो भी मजाक मस्ती करते हैं. ज़रूर करते हैं. लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं. वो बहुत परिपक्व इंसान हैं और ऐसा नहीं है कि हर बात पर मजाक वगैरह करते हों.

काफी युवा खिलाड़ी कहते हैं कि सचिन टिप्स देते हैं. कप्तान बहुत कम समय के लिए रहे, लेकिन दिलचस्पी खेल के हर विभाग में रखते हैं?

बिल्कुल सही, इसलिए तो लोग उनकी ज़्यादा इज्ज़त भी करते हैं और ख़ुदा भी उसी को ज़्यादा देता है जो अच्छा इंसान होता है और दिल से सबकी मदद करना चाहता है.

और राहुल द्रविड़. हालाँकि वो कप्तान हैं, तो आपसे पूछना बेकार है. लेकिन थोड़ी तारीफ़ ही कर दीजिए.

राहुल भाई में कई खूबियाँ हैं. कभी भी कोई भी समस्या है हमेशा सलाह देते हैं. वैसे भी कप्तानी करना आसान काम नहीं है ख़ासकर भारतीय टीम की कप्तानी. इतने दबाव में अपने परिवार को भी संभालना. फिर भी वह बहुत अच्छे तरीक़े से टीम, परिवार और अपने प्रदर्शन से तालमेल बिठा रहे हैं.

बीते ज़माने की पसंदीदा फिल्मों में कौन सी पसंद है. क्या आपने शोले, मुग़ले आज़म नहीं देखी?

सब देखी हैं. शोले काफ़ी बार देखी है. पर मुगले आज़म मेरे लिए थोड़ा.. दरअसल, मुझे रोमांटिक फिल्में ज़्यादा पसंद नहीं हैं.

मधुबाला भी पसंद नहीं आईं?

क्या बात करते हैं, मधुबालाजी बहुत सुंदर हैं, लेकिन रोमांटिक फ़िल्में मैं ज़्यादा देर तक नहीं झेल सकता. मेरा मानना है कि आम आदमी जब थिएटर जाता है तो मनोरंजन के लिए जाता है. रोने-धोने के लिए नहीं. पैसा और साढे तीन घंटा ख़र्च करके मैं रोने के लिए तो नहीं जाऊँगा. दिल चाहता है, हेराफेरी, झंकार बीट्स जैसी हल्की-फुल्की फ़िल्में मुझे पसंद हैं.

आपने भी खूब मॉडलिंग की है. मजा आता है?

ये सब करना पड़ता है. लेकिन ये इतना आसान नहीं है. टेलीविज़न पर मॉडलों को वाक करते देखते हैं तो लगता है सिर्फ चलना भर है, लेकिन जब खुद किया तो पता चला कि इतना आसान नहीं है. दबाव होता है, काफ़ी लोग होते हैं. थोड़ा भी गड़बड़ हो गया तो..

पर ऐसा भी नहीं है कि बिल्कुल भी मजा नहीं आया. लेकिन आपको पता होना चाहिए कि ज़्यादा लुत्फ़ भी ठीक नहीं है. क्योंकि आपको पता होना चाहिए कि आपका मूल काम क्या है.

अब आप अपने सेलिब्रिटी स्टेटस से तो काफी सहज हो गए होंगे या अब भी कुछ अजीब सा लगता है?

हाँ, सहज तो हो गया हूँ. लेकिन कभी-कभी कुछ अजीब सा तो लगता ही है कि हमेशा लोग आपके पीछे हों. लोगों के पीछे होने में कोई समस्या नहीं है, लोग तब तक ही पीछे होंगे जब तक आप लाइमलाइट में हैं. जब ये सब नहीं रहेगा तब आप भी हमारा इंटरव्यू नहीं लेंगे.

अभी पिछले दिनों की ही बात है मैं अपने भाई से फोन पर बात कर रहा था और होटल की लॉबी में था. तभी काफी सारे लोग आए और मेरे पैर पर चढ़ गए. तब मैने कहा कि थोड़ा संभाल के. कई बातें देखनी पड़ती हैं. बात ये है कि हम तकलीफ़ पर रिएक्ट भी नहीं कर सकते.

जूही चावला भी आपसे एक पीढ़ी आगे की हीरोइन हैं, अभी की हीरोइनों में से कौन पसंदीदा हैं ?

नहीं.. कभी इंसान की पसंद हमेशा बदलती रहती है क्या. कई मामलों में बदलती है. मैं ये नहीं कहता कि नहीं बदलती, लेकिन कई मामले होते हैं कि आपकी पसंद नहीं बदलती.

शाहरुख़ ख़ान?

बेशक, अच्छे हैं. अगर उन्हें किंग ख़ान कहा जाता है तो यूँ ही थोड़े कहा जाता है.

पाकिस्तान में खेलते हुए कैसा लगता है. क्योंकि पाकिस्तान में ख़ासकर लोग ये सोचते हैं कि इरफ़ान पठान कैसे इतनी अच्छी गेंदबाज़ी कर रहे हैं?

चाहे कोई भी देश हो. हमें तो अच्छी गेंदबाज़ी करनी ही होती है. सिर्फ़ पाकिस्तान की बात नहीं है.

मुझे कई खिलाड़ियों ने कहा है कि पाकिस्तान में अधिक दबाव होता है. ख़ासकर भारतीय मुसलमान खिलाड़ी मसलन ज़हीर ख़ान, अज़हर और इरफ़ान पठान के अच्छा प्रदर्शन करने पर. ऐसा है क्या?

ये तो भारत-पाकिस्तान मुक़ाबलों को लेकर आम लोगों की भावना हो सकती है, लेकिन जब हम पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खेलते हैं तो जज़्बा अलग होता है और जब हम भारतीय टीम के लिए खेलते हैं तो हमारा धर्म क्रिकेट हो जाता है.

पेशावर में मैं जब मैच खेल रहा था कि दर्शकों में से मेरे चेहरे पर किसी ने कील मारी थी, लेकिन भीड़ को तो आप कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि वे भावुक होते हैं और पैसा खर्च कर मैच देखने स्टेडियम पहुँचते हैं.

ऐसा क्यूँ है कि एक सा वातावरण होने के बाद भी सीमा के इस और उस पार के तेज़ गेंदबाजी आक्रमण में इतना फर्क है. इमरान ख़ान, वसीम अकरम, वकार यूनुस, शोएब अख़्तर के मुकाबले हमारे पास थोड़े से उन्नीस कपिल देव, ज़हीर खान और अब आप हैं, वो इक्कीस क्यों नज़र आते हैं?

पाकिस्तान में सचिन तेंदुलकर है? वीरेन्द्र सहवाग है? राहुल द्रविड़ है? नहीं न. तो फिर वो भी तो हमसे उन्नीस हुए. हर किसी को हर कोई चीज़ नहीं मिलती. जिस तरह से मैं क्रिकेट खेल रहा हूँ, मुझे भी धीरे-धीरे पता लग रहा है कि रफ़्तार ज़रूरी है, लेकिन वही सब कुछ नहीं होता.

 मधुबालाजी बहुत सुंदर हैं, लेकिन रोमांटिक फ़िल्में मैं ज़्यादा देर तक नहीं झेल सकता. मेरा मानना है कि आम आदमी जब थिएटर जाता है तो मनोरंजन के लिए जाता है. रोने-धोने के लिए नहीं. पैसा और साढे तीन घंटा ख़र्च करके मैं रोने के लिए तो नहीं जाऊँगा. दिल चाहता है, हेराफेरी, झंकार बीट्स जैसी हल्की-फुल्की फ़िल्में मुझे पसंद हैं.
 
इरफ़ान पठान

मतलब पाकिस्तान में ऐसे कितने गेंदबाज़ हैं जिन्होंने टेस्ट मैचों में कपिल देव और अनिल कुंबले जितने विकेट लिए हैं. कुंबले का रिकॉर्ड देखिए. अविश्वसनीय है. टेस्ट और वनडे में उनके क़रीब एक हज़ार विकेट होने वाले हैं. मेरे हिसाब से इस तरह दोनो देशों के खिलाड़ियों की तुलना करना ठीक नहीं है.

ऐसा नहीं है कि हमारे यहां धीमे गेंदबाज़ हैं. हमारे यहां भी कई गेंदबाज़ों ने 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से गेंद फेंकी है.

शोएब अख़्तर के बारे में क्या राय है?

किससे पूछ रहे हैं आप, इरफ़ान पठान बल्लेबाज़ से या फिर गेंदबाज़ से?

बल्लेबाज़ से…

बेशक, काफी अच्छे गेंदबाज़ हैं, बहुत तेज़ हैं और मैच विनर हैं.

बतौर गेंदबाज़ आपके हीरो कौन हैं?

वसीम अकरम.

बतौर आक्रामक बल्लेबाज़ जो अब आपका नया रोल है?

आक्रामक बल्लेबाज तो बहुत हैं, जैसे धोनी हैं, युवराज हैं. लेकिन मेरा ऑलटाइम फेवरिट बल्लेबाज़ भारतीय टीम में वीवीएस लक्ष्मण हैं. क्लास बल्लेबाज़, बहुत अच्छे इंसान और बहुत अच्छे क्रिकेटर.

आपने सोचा था कि आप ये बनेंगे या इस हैसियत में होंगे?

उम्मीद थी कि मैं इंडियन टीम में खेलूँगा ज़रूर, लेकिन ये नहीं सोचा था कि इतना कुछ मिलेगा. जो अल्लाह का बहुत बड़ा एहसान है.

और अब आगे क्या बनना चाहते हैं, क्या ख़्वाहिश है, दिली तमन्ना क्या है?

देखिए मुझे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलते हुए तीन साल होने को आए हैं, यही कोशिश है कि आगे लंबा क्रिकट खेलना है. भारतीय टीम के लिए लंबे समय तक खेलना है.

जीवन का सबसे ज़्यादा एक्साइटिंग मोमेंट?

जब मुझे ऑस्ट्रेलिया में इंडियन टीम का कैप मिला था. मैं उस लम्हे को कभी नहीं भूल सकता. क्योंकि इंडियन कैप, टीशर्ट, मुझे हमेशा एक्साइट करती थी.

जब आपके नाम की घोषणा हुई तो क्या किया?

खुशी का कोई नज़ारा नहीं था. बहुत खुश था. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था.

अब तक का सबसे बड़ा फ्रस्ट्रेशन या कुंठा?

फ्रस्ट्रेशन, आप बढाना चाहो तो बढा सकते हो. लेकिन अल्लाह का शुक्र है कि मेरे जीवन में ऐसा कुछ नहीं है. इंसान निराश होता है. ऐसा नहीं है कि मैं नहीं होता. लेकिन छोटी-छोटी चीजें होती हैं, ऐसी नहीं कि जिसे मैं हमेशा याद रख रहा हूँ.

लेकिन किसी ख़ास चीज की ख्वाहिश बची है जो अभी पूरी नहीं हो सकी है?

बहुत अच्छा क्रिकेटर और गेंदबाज़ बनना है और वो क्रिकेट ख़त्म करने के बाद ही बन पाऊँगा. क्योंकि जब तक आप खेलते हैं, तब तक तो स्ट्रगल ही चलता रहता है. कई बार लोग आपकी आलोचना करेंगे. सबकी राय भी अलग-अलग होगी. लेकिन जब आप क्रिकेट ख़त्म करेंगे तभी आपका सही आकलन होगा.

अभी तो मेरा करियर शुरू भी नहीं हुआ. बस यही ख़्वाहिश है कि जितनी भी क्रिकेट खेलूँ बहुत अच्छी खेलूँ.

 
 
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