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शनिवार, 06 जनवरी, 2007 को 21:05 GMT तक के समाचार
 
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एक मुलाक़ात: बाबा रामदेव के साथ
 

 
 
बाबा रामदेव और संजीव श्रीवास्तव
बाबा रामदेव बीबीसी हिंदी सेवा के इस विशेष कार्यक्रम के लिए बीबीसी स्टूडियो पहुँचे
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इसी श्रंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं विश्व और भारत में योग का पुनर्जन्म करने वाले और भारतीय संस्कृति का अहसास कराने वाले स्वामी रामदेव यानी बाबा रामदेव से.

पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश-

सबसे पहले यह बताएँ कि आप बाबा कैसे बने?

देखिए कोई बाबा बनता नहीं है. मैं अपनी ज़िंदगी के बारे में महसूस करता हूँ कि जब मैं लगभग नौ बरस का था तब से मेरे मन में यह विचार पैदा हुआ कि मुझे ऐसा ही बनना है. अब इसे भारतीय संस्कृति के पुनर्जन्म से जोड़कर देखें तो कहना चाहूँगा कि पूर्वजन्म के संस्कार थे जिसने मुझे इस रास्ते पर आगे बढ़ाया.

विज्ञान का भी सिद्धांत है कि कभी कोई चीज़ समाप्त नहीं होती, परिवर्तित ज़रूर होती है. तो पूर्वजन्म के मेरे कुछ संस्कार होंगे कि बन गया बाबा रामदेव.

इस सवाल से मेरा मतलब यह था कि स्वामी रामदेव के जो रूप हम आज देख रहे हैं, यानी शरीर के अंगों को किसी भी तरह हिला-डुला सकते हैं, इसके लिए मेहनत तो बहुत करनी पड़ी होगी?

देखिए मैने प्रारंभिक दौर में योग की सारी कठिन क्रियाओं को किया. आज भी मैं कभी-कभार इन क्रियाओं को लोगों के सामने करता हूँ, लेकिन मैं इनकी बहुत अधिक आवश्यकता आम आदमी के जीवन में नहीं समझता. मैं लोगों का शीर्षासन नहीं कराता, यद्यपि मेरे प्राणायाम कराने से बहुत लोगों का शीर्षासन हो जाता है और फिर मुझपर वाद-विवाद की लंबी श्रृंखला भी शुरू हो जाती है. मैं मानता हूँ कि योग की जो कठिन क्रियाएं हैं उनकी हमारी जीवन में ज्यादा उपयोगिता या प्रासंगिकता नहीं है. मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि योग करने के लिए जिंदगी नहीं है, जिंदगी को संवारने के लिए योग है.

मगर हमारी दिलचस्पी इस बात में है कि आप कैसे सीखे. अगर कोई अगला स्वामी रामदेव बनना चाहे तो वह किस गुफा में बैठे, कहाँ वनवास करे, कितने बरस का वनवास होगा. आखिर वह क्या करे. कहने का आशय है कि आपने क्या किया?

मैं शुरू में करीब एक घंटा योग करता था. जब गुरुकुल में आया तो योग आसनों के साथ-साथ कुछ कठिन व्यायाम भी करने लगा. मैं एक साथ 500 दंड बैठक लगाता था और पसीने से तर-बतर हो जाता था. चार-पाँच किलोमीटर दौ़ड़ता भी था. पहलवानी का भी शौक था और कुश्ती में अपने से डेढ़ गुना वजनी पहलवान को चित कर देता था. गुरुकुल में हर दिन एक-डेढ़ घंटा योगाभ्यास किया करता था. जब हम पढ़ा करते थे कुछ बच्चे मानते थे कि शारीरिक व्यायाम से व्यक्ति पहलवान हो जाता है और बुद्धि मोटी जाती है, लेकिन मैने इसे नहीं माना और व्यायाम जारी रखा. प्राणायाम मेरे साथ 20 साल पहले गहराई के साथ जुड़ा. शुरू में मैने इसे साधना के तौर पर लिया. इससे मेरी जिंदगी में नया मोड़ तब आया जब बिजनौर के एक संत महात्मा ने मुझसे कहा कि कपाल भांति, अनुलोम-विलोम करना चाहिए. फिर मैने इसे खुद भी किया और लोगों से भी कराया. इससे लोगों की बीमारियां दूर होने लगी, यानी हम व्याधि से समाधि की ओर लौटे.

बचपन में जब आप गाँव में रहते थे और पहलवानी करते थे तो किस तरह से गाने पसंद थे, किस तरह की धुन गुनगुनाने का मन करता था?

दरअसल मैं जिस गाँव में पैदा हुआ, वहाँ जब तक मैं रहा तब तक कोई टेलीविजन नहीं था. रेडियो पर भी समाचार अधिक सुने जाते थे. गाँव में हिंदी नहीं बोली जाती थी, ठेठ देसी भाषा बोली जाती थी, हिंदी समझ में ही नहीं आती थी. बहुत बाद में हिंदी समझ में आई. फ़िल्म आज तक नहीं देखी. इसलिए गानों में बहुत समय बाद रुचि हुई. ‘है प्रीत जहाँ कि रीत सदा, मैं गीत वहाँ के गाता हूँ’ जैसे राष्ट्रभक्ति के गाने मुझे बहुत पसंद हैं.

मुझे राष्ट्रीयता बहुत पसंद है. इसलिए राष्ट्रभक्ति के गीत मेरे पसंदीदा गाने हैं. इन्हीं को मैं अपने शिविरों में भी गुनगुनाता हूँ, लोग भी इन पर खूब झूमते हैं और मस्त हो जाते हैं. मैं लोगों से कहता हूँ कि मैं भक्ति के साथ-साथ शक्ति का भी उपासक हूँ और मैं उन्हें भीतर से संन्यासी बनाना चाहता हूँ. क्योंकि अगर उन्हें वस्त्रों से संन्यासी बना दिया तो उनके घरवाले उन्हें भगा देंगे. इसलिए मैं उन्हें भीतर से राष्ट्रभक्ति के रंग में रंगता हूँ. यही वजह है कि मुझे ‘मेरा रंग दे बसंती चोला....’ बहुत पसंद है.

जो इतनी फिट बॉडी है, काले बाल, लंबी दाढ़ी. इसका क्या राज़ है. योग तो आप करते ही हैं, ये तो हमें पता है, इसके अलावा खाते पाते क्या हैं और आपकी दिनचर्या क्या है?

मैं बहुत साधारण भोजन में विश्वास रखता हूँ. मैं जमीन पर दरी में सोने में यकीन रखता हूँ और दो वक्त खाना खाता हूँ.

नाश्ता नहीं?

मैं समझता हूँ कि समय का नाश क्यों किया जाए. जब दो बार खाने से गुज़ारा हो सकता है तो तीन बार क्यों.

 शनि-मंगल सब लोगों का अंधविश्वास है. हर घड़ी, हर मुहूर्त शुभ है. हर दिशा में परमात्मा है. कौन सी दिशा ऐसी है जहाँ शैतान रहता है. धर्म और अध्यात्म को मैं विज्ञान की आँख से देखता हूँ. इसलिए मैं धर्म, संस्कृति और परंपराओं का प्रखर संवाहक होने के साथ-साथ धर्म के नाम पर भ्रम, अज्ञान और पाखंड का आलोचक भी हूँ
 
बाबा रामदेव

पहला भोजन सुबह लगभग 11 बजे करीब और शाम को सात से आठ बजे के बीच होता है. उबली हुई सब्जी और उसमें भी ज़्यादातर लौकी, तुरई, परवल, टिंडे, हरी सब्जियाँ और गाजर आदि. गाय का दूध पीता हूँ. अनाज खाए हुए मुझे लगभग 10 साल हो गए हैं. बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि आपको खाने में क्या पसंद है, मैं कहता हूँ जो तुम्हें अच्छा लगता हो, मुझे खिला दो. दरअसल, भोजन की पसंद के बारे में कभी सोचा ही नहीं. हम तो गुरुकुल में थे तो वहाँ भी छह-छह महीने अनाज खाए बगैर गुजार देते थे.

आप इतने जबरदस्त तरीके से पेट कैसे हिला लेते हैं?

कोई मेरे पास आता है तो मैं उसका पेट ही नहीं दिमाग और पूरा शरीर भी हिला देता हूँ. मेरा काम ही हिलाना है. मेरे पेट हिलाने से बहुत लोग हिलते हैं और बोलने से भी. क्या करूँ मेरी किस्मत ही कुछ ऐसी है. जहाँ भी मैं बैठता हूँ, लोग हिलने लगते हैं. मुझे लगता है कि ये गति बनी रहनी चाहिए. क्योंकि इस गति में शक्ति आएगी और देश भी जागेगा.

अब तो आप टेलीविजन पर और देश और विदेश में बडे़-बड़े शिविरों में दिखते हैं, लेकिन आपने पहला शिविर किस तरह से और कहाँ लगाया. आपने लोगों से कैसे कहा कि देखो मैं हूँ रामदेव और आओ मैं आपको योग सिखाता हूँ?

जब मैने लोगों को पहले-पहले योग सिखाना शुरू किया तो प्राणायाम ज़्यादा नहीं कराता था, मैं आसन ही कराता था. शुरू-शुरू में गंगा के किनारे दो-चार लोगों को योगाभ्यास कराता था. शिविर में पहली बार दो-ढ़ाई सौ लोगों के सामने आसन किए.

लेकिन जब आपने पहली बार दाढ़ी वाले बाबा की हैसियत से लोगों से कहा कि आइए बैठिए मैं आपको योग सिखाता हूँ तो क्या लोगों ने आपको आसानी से स्वीकार कर लिया था?

यह सच है कि देश को धर्मसत्ता और राजसत्ता ही दिशा देती है या दिशाभ्रमित करती है और इनकी ताकत भी बहुत होती है, लेकिन बाबा हों, पुलिसवाले हों या फिर राजनेता हों, इन पर अविश्वास के प्रश्नचिन्ह भी लगे होते हैं. जब मैने पहली बार सूरत में योग करवाया तो लाल कपड़े में नहीं था. उस समय मैं आचार्य रामदेव था और श्वेत वस्त्रों में रहता था. बाद में स्वामी और फिर बाबा बना. वैसे बाबा अधेड़ उम्र वाले को भी बोलते हैं और गुजरात में छोटे बच्चे को भी बाबा कहते हैं. बहुत से लोग मुझे बालरूप में देखते हैं और बहुत श्रद्धेय आचार्य के रूप में. वैसे मुझे इससे ख़ास फर्क नहीं पड़ता. मैं लोगों को प्राणायाम नहीं कराता था, लेकिन कुछ कठिन आसन शीर्षासन, चक्रासन आदि करता था. उस समय मैं एक दूसरी क्रिया भी लोगों से कराता था, शंख प्रच्छालन. लोगों को 10 से 15 गिलास पानी पिलाता था और ये पानी शौच के रास्ते बाहर आ जाता था. इसकी खासियत यह है कि इससे पेट एकदम साफ होता जाता है और एक ही दिन में व्यक्ति का करीब दो किलो वजन तक कम हो जाता है. मैं अधिकतम 1000 लोगों को शिविरों में ये आसन कराता था और ये आसन काफी मशहूर हुआ.

तो क्या आचार्यजी कभी ऐसा नहीं हुआ कि लोगों ने विरोध किया हो और आपको लंगोट बाँधकर भागना पड़ा हो?

जिंदगी में ऐसा कोई क्षण नहीं आया कि लोगों ने मुझ पर अविश्वास किया हो. बल्कि जब करोड़ों लोग मुझे प्यार करने लगे तब किसी ने मुझ पर शंका जताई तो उसने मुँह की खाई. ऐसा वक्त नहीं देखना पड़ा जब मुझे शर्मिंदगी उठानी पड़ी हो या कभी लोगों ने ये कहा हो कि बाबा क्या करा रहे हैं.

बहुत किस्मत वाले बाबा हैं आप?

नहीं, मैं किस्मत को नहीं पुरुषार्थ को मानता हूँ. एक बार जब किसी ने मेरा हाथ देखा तो मुझे बताया कि मेरे हाथ में तो भाग्य रेखा ही नहीं है. मैं राशिफल को भी नहीं मानता. आप ही देख लीजिए. भगवान राम और रावण, कंस और कृष्ण की राशि एक ही थी. वर्तमान युग में देखो तो बहन मायावती और मुलायम सिंहजी की राशि एक है. बहन सुषमा और सोनियाजी की राशि एक ही है. ज्योतिष और वास्तु को मैं उस रूप में नहीं मानता जिस तरह लोग इसे अंधविश्वास के रूप में मानते हैं. शनि-मंगल सब लोगों का अंधविश्वास है. हर घड़ी, हर मुहूर्त शुभ है. हर दिशा में परमात्मा है. कौन सी दिशा ऐसी है जहाँ शैतान रहता है. धर्म और अध्यात्म को मैं विज्ञान की आँख से देखता हूँ. इसलिए मैं धर्म, संस्कृति और परंपराओं का प्रखर संवाहक होने के साथ-साथ धर्म के नाम पर भ्रम, अज्ञान और पाखंड का आलोचक भी हूँ.

बाबा रामदेव
बाबा रामदेव किस्मत नहीं, पुरुषार्थ में विश्वास रखते हैं

आचार्य से स्वामी की यात्रा में आपका अगला पड़ाव क्या रहा?

वर्ष 1995 में मैने नौ अप्रैल को रामनवमी के दिन संन्यास लिया और आचार्य रामदेव से मैं स्वामी बन गया. मैने जिन गुरूजी से संन्यास की दीक्षा ली वो आज भी जीवित हैं.

तो क्या संन्यास लेने से पहले आप गृहस्थ थे?

मैने सीधे ब्रह्मचर्य से संन्यास लिया. मैं पहले ब्रह्मचारी था और इसके बाद सीधे संन्यास ले लिया. आप लोग जो सुख भोग रहे हैं, भगवान ने हमें इसके लिए नहीं बनाया था. इसलिए हम सीधे संन्यासी बन गए.

आपको इस सुख की कमी महसूस होती है?

कभी ज़िंदगी में ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि मेरा जन्म गृहस्थ सुख को भोगने के लिए था. कभी सपने में भी इच्छा नहीं हुई कि विवाह रचाता. मतलब गृहस्थ सुख न मिल पाने का अफसोस नहीं है. बल्कि मुझे महसूस होता है जो मैं कर रहा हूँ, भगवान ने मुझे इसके लिए ही बनाया है.

बड़े-बड़े संतों की तपस्या टूट गई. तो क्या आप नहीं मानते कि ब्रह्मचारी बनना कठिन काम है?

मैं कहना चाहूँगा कि संन्यासी बनना आज भी इतना कठिन नहीं है. जब आप समाज में बहुत प्रतिष्ठा पा लेते हैं तो इस लोकप्रियता से भी लोगों में आकर्षण बढ़ जाता है. आत्मा से प्रेम करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो क़रीब आना चाहते हैं.

कोई पैदाइशी ब्रह्मचारी तो होता नहीं है, बचपन में कभी किसी लड़की को देखकर खास गाना गुनगुनाने का मन किया?

मैने बताया न कि मेरी परवरिश जिस गाँव में हुई, वहाँ रेडियो भी किसी-किसी के पास था और गाँव वाले इकट्ठे होकर समाचार सुनते थे. लेकिन मुझे मेरे मित्र ने एक गाना सुनाया था जो मुझे बहुत पसंद था. हालाँकि मुझे नहीं पता कि ये किस फ़िल्म का या किस गीतकार का गाना है. इसकी लाइनें हैं, ‘कल भी मन अकेला था आज भी अकेला है, जाने मेरी किस्मत ने कैसा खेल खेला है.’

तमाम लोग आपको गुरू मानते हैं, कुछ भगवान मानते हैं, कुछ डॉक्टर मानते हैं. आप अपने क्षेत्र में शीर्ष पर हैं. क्या वाकई आपको अकेलेपन का अहसास होता है?

जिंदगी में कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ. मैं अपने साथ हमेशा भगवान को पाता हूँ. मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में मानता हूँ. जो भी करता हूँ इस अहसास के साथ कि मेरे भीतर की शक्ति ये सब मुझसे करा रही है. मेरे दोस्त भी मुझसे कहा करते हैं कि तुम रात दिन लगे रहते हो, न खुद सोते हो, न औरों को सोने देते हो. मैं हमेशा विद्रोह की बात करता हूँ, धारा कि विरुद्ध बात करता हूँ. जब मैंने कहा कि नियमित योग और प्राणायाम से कैंसर, हैपेटाइटिस जैसी बीमारियां ठीक हो जाती हैं तो लोग कहते हैं कि मैं बड़बोला हूँ. हालाँकि कभी-कभी मैं भी सोचता था कि देश के लिए बात करने के बावजूद कहीं लोग मुझे अकेला तो नहीं छोड़ देंगे, लेकिन आज मुझे 100 फ़ीसदी यकीन है. मेरे साथ हज़ारों-लाखों लोग हैं और मैं कभी भी खुद को अकेला नहीं पाता.

मेरा मतलब इस अकेलेपन से नहीं. बल्कि शीर्ष पर रहने के बावजूद आपके अकेलेपन से है. जैसा कि कहा भी जाता है जो शीर्ष पर होता है अकेला होता है?

मैने अपने मित्रों से बहुत प्रेम किया है. मेरे मित्रों ने मुझे इतना स्नेह दिया है. उनके साथ रहकर मुझे कभी ऐसा नहीं लगा निजी ज़िंदगी में कुछ सूनापन या अकेलापन है.

लेकिन मुश्किल तो होगा स्वामीजी. सुना है कई अभिनेत्रियां भी आप पर लट्टू हैं?

देखिए वो मुझ पर नहीं, योग पर फिदा हैं. लोग मुझसे प्यार करते हैं अर्थात मेरे काम से प्यार करती हैं. इनमें बहुत-सी फ़िल्मी हस्तियां, संभ्रांत परिवारों की माताएं-बहनें, बेटियां हैं, आम और खास आदमी है. मैं जिस राह पर चल रहा हूँ यदि कोई उसे प्यार करता हो मुझे क्या ऐतराज़ हो सकता है.

किसी ने ये सीमा तोड़ने की कोशिश नहीं की?

भगवान की कृपा से इस तरह की घटना आज तक नहीं हुई और मैं सोचता हूँ कि जिंदगी में यह दुर्भाग्य नहीं होगा.

अब चर्चा विवादों की. कई लोगों का कहना है कि रामदेव योग तो अच्छा सिखाते हैं, लेकिन कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा बोल जाते हैं, बेवजह टकराव मोल लेते हैं?

 कभी ज़िंदगी में ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि मेरा जन्म गृहस्थ सुख को भोगने के लिए था. कभी सपने में भी इच्छा नहीं हुई कि विवाह रचाता. मतलब गृहस्थ सुख न मिल पाने का अफसोस नहीं है
 
बाबा रामदेव

एक भी वाकया बताएं जहाँ मैने आवश्यकता से ज़्यादा बोला हो. जब मैं योग सिखाता हूँ तो सिर्फ़ प्राणायाम ही नहीं कराता. मैं हर दिन प्राणायाम कराते-कराते उनका पसीना भी निकालता हूँ और बीच-बीच में उनको जीवन के हर पहलू से जोड़ता हूँ. क्योंकि आदमी की बीमारियां उसकी सोच से पैदा हुई हैं. उनकी निजी, पारिवारिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सोच कैसी होनी चाहिए मेरा जोर इस पर रहता है. मैं योग को समग्र जीवन दर्शन के रूप में लेता हूँ. मैं इसे संपूर्ण चिकित्सा विधा के रूप में भी लेता हूँ. मैं ये भी कहता हूँ कि योग समग्र शारीरिक व्यायाम है. योग समाधि तक पहुँचाने वाली मुक्ति की विद्या है, व्याधियां भी इससे दूर होती हैं. लेकिन इसके साथ-साथ मैं ये भी कहता हूँ कि योग एक संपूर्ण जीवन दर्शन है. मैं सिर्फ़ योगी ही नहीं हूँ. मैं जब पैदा हुआ था तो संन्यासी के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय के रूप में जन्मा था. तो मैं जब देश की संस्कृति परंपराओं की बात करता हूँ तो इससे बहुत से लोगों के स्वार्थों पर आघात पहुँचता है. मैं प्राणायाम कराते-कराते लोगों को ये फार्मूले देता हूँ कि बर्गर खाके बर्बाद न हों, पिज्जा खाके अपनी फिजा खराब मत करो, कोल्डड्रिंक नाम का ज़हर मत पीओ.

ये तो ठीक है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्री रामदास का कहना है कि बाबा रामदेव योग कराएं-सिखाएं अच्छा है, लेकिन दवाओं के मामले में हस्तक्षेप क्यों कर रहे हैं. ऐसा क्यों कह रहे हैं कि एलोपैथी इलाज़ न कराएं?

एलोपैथी के बारे में मैं कभी ऐसा नहीं कहता कि दवा मत लो. हमारे स्वास्थ्य मंत्री को ऐतराज इस बात पर था कि बाबा ये न कहें कि योग से कैंसर या एड्स अच्छा हो जाता है. मैने कभी नहीं कहा कि एड्स योग से अच्छा होता है. मैने इतना ज़रूर कहा था कि एड्स रोगियों का सीडीफोर काउंट कम हो जाता है और इसको ही एड्स कहते हैं. योग करने से सीडीफोर काउंट बढ़ता है ये तथ्य है. कैंसर के रोगी अच्छे हुए तो क्या अब मैं ये कह दूँ कि योग करने से कैंसर होता है. कैंसर से पीड़ित लोगों ने भले ही साधना के तौर इसे शुरू किया हो, लेकिन उन्हें फायदा हुआ है और ऐसे लोग एक-दो नहीं, ये तादाद सैकड़ों में हैं. अगर वो ठीक होते हैं तो इसमें किसी को क्या आपत्ति है. जहाँ तक एलोपैथी की बात है आज स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर देश में चार लाख 79 हज़ार 520 करोड़ रुपए का खर्चा है. यानी देश में विकास योजनाओं पर जितना खर्च होता है, उससे कहीं अधिक दवाओं और उपचार पर खर्च होता है. लोग करोड़ों रूपए की दवा तो खा ही रहे हैं, लेकिन योग करेंगे तो ही देश बच पाएगा . विश्व बैंक की रिपोर्ट से साफ है कि भारत में सिर्फ़ 35 फ़ीसदी लोग ही उपचार करा पाते हैं. दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के 71 करोड़ लोग तो बीमार पड़ने पर अपना उपचार ही नहीं करा पाते. यदि हमने योग, आयुर्वेद और उपचार के परंपरागत तरीकों को छोड़ दिया तो देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा ख़तरा पैदा हो जाएगा. अब मैं योग के साथ आर्थिक चिंतन भी देता हूँ तो इसमें क्या आपत्ति है.

लेकिन लोगों का कहना है कि स्वामीजी स्वयं अमरीका, इंग्लैंड, यूरोप जा सकते हैं और वहाँ हफ़्तों-महीनों रह रहे हैं तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बुराई क्यों करते हैं?

स्वास्थ्य के नाम पर जो भी लोग खिलवाड़ करते हैं मैं उनके ख़िलाफ़ बोलता हूँ. मेरा पहला निशाना बहुराष्ट्रीय कंपनियां थी. जब मैने शराब और तम्बाकू के ख़िलाफ़ बोला तो शराब की बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां चलाने वाले हिल गए. इन फैक्ट्रियों को चलाने वाले कुछ सांसदों ने ऐतराज़ जताया और कहा कि बाबा को मर्यादा में रहकर बात करनी चाहिए. विश्व में हर साल 48 लाख लोग तम्बाकू के सेवन से मरते हैं और क़रीब इतने ही लोगों की मौत का कारण शराब होती है. मेरा कहना है कि जब 151 लोगों की हत्या के इल्ज़ाम में सद्दाम हुसैन को फाँसी दी जा सकती है तो फिर 48 लाख लोगों की मौत के ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए. इस तरह जब मैं अपनी बात को आँकड़ों और तर्क के साथ कहता हूँ तो इससे कुछ लोगों के अस्तित्व हिलने लगते हैं. महात्मा गाँधी ने 1928 में कराची अधिवेशन में कहा था कि आजादी के बाद भारत में आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित किया जाएगा, आज हालत ये है कि हमारी परंपरागत उपचार की विधाओं को हाशिए पर रख दिया गया है. मेरी इन खरी-खरी बातों को सुन कर लोगों की सत्ताएं हिलने लगती हैं.

अब विदेशों में कई जगह ‘वाइन विद योगा’ शुरू हो गया है, तो क्या आप समझते हैं कि भारत में भी ऐसा कुछ सिलसिला शुरू हो सकता है?

‘योगा विद आयुर्वेदा’. योग कीजिए और साथ में अंगूर का जूस पीजिए. काजू, अंगूर को सड़ाकर शराब बनाकर पीना तो सड़े हुए दिमागों का काम है. प्राणायाम से जितना तन, मन, विचार पवित्र हो जाता है. योग से मानसिक तनाव से भी मुक्ति मिलती है और योग करने वालों के शराब की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. हमारे शरीर के भीतर इंडोर्फिन हार्मोन होता है, जब व्यक्ति अनुलोम-विलोम, प्राणायाम करता है तो मस्त हो जाता है. प्राणायाम करने से तो लोग शराब छोड़ रहे हैं और शाकाहारी हो रहे हैं.

 
 
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