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गुरुवार, 11 जनवरी, 2007 को 14:52 GMT तक के समाचार
 
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क्या होता है एक हत्यारे के मस्तिष्क में?
 

 
 
एक अबूझ पहेली है इंसान का दिमाग़
पिछले दिनों निठारी नरकंकाल मामले में आए बेहद भयानक मोड़ों ने सारे भारत को सकते में ला दिया है. क्यों इतनी बेरहमी से बच्चों का क़त्ल किया गया?

क्या मिला क़ातिलों को मासूमों का शोषण करके और उनके शरीर के टुकड़े करके? क्या किसी को जान से मारने में भी किसी को आनंद आ सकता है? क्या इससे कोई अजीब तरह की संतुष्टि मिलती है?

इस तरह के क़ातिल को पहचानना मुश्किल है. ये देखने और बोल-चाल में अकसर सामान्य लगते हैं. तो क्या चल रहा होता है इनके दिमाग़ के अंदर?

दिल्ली के मशहूर मनोवैज्ञानिक डॉक्टर संदीप वोहरा कहते हैं, "अक्सर देखा गया है कि इस तरह के क़ातिल मानसिक रूप से परेशान होते हैं. इन पर अब तक जो भी अध्य्यन हुआ है और इनसे जो भी बातचीत की गई है उसके ज़रिये पता चलता है कि इनका बचपन सामान्य नहीं होता. इनका या तो शारिरिक या मानसिक शोषण किया गया होता है, या इनके घरेलू हालात अच्छे नहीं होते."

डॉक्टर वोहरा बताते हैं कि उन्होंने क्रूरता अपने ऊपर महसूस की होती है या किसी और पर होते हुए देखी होती है.

 ये लोग अपने आप को समाज का अंग नहीं मानते और समाज से एक तरह से नाराज़ रहते हैं. इस वजह से उनके निजी संबंध पनप नहीं पाते. तो लोगों की हत्या करके और उनके शरीर का शोषण करके वो अपने आपको ताकतवार महसूस करते हैं
 
डॉ. संदीप वोहरा

कभी-कभी ये लोग अपने आप को दुनिया में बिल्कुल अकेला महसूस करते हैं और सोचते हैं कि कोई उनकी परवाह नहीं करता. इसके चलते उनके दिमाग़ में विकृत मानसिकता वाली सोच पैदा हो जाती और वे भी दुनिया के नियम-क़ायदों की परवाह करना बंद कर देते हैं.

डॉक्टर वोहरा कहते हैं "दरअसल, तरह-तरह की कल्पनाएँ तो सभी लोग करते हैं लेकिन उनके दिमाग़ और इस तरह के क़ातिलों के दिमाग़ में फ़र्क़ ये होता है कि आम आदमी के दिमाग़ में एक तरह का सेंसर लगा होता है जिसके ज़रिये वो जानता है कि उसे इस तरह का काम नहीं करना चाहिए लेकिन ऐसे क़ातिलों के दिमाग़ में ये सेंसर अनुपस्थित होता है. इस वजह से उनके अंदर आत्मग्लानि की कोई भावना नहीं होती."

दिमाग़
अब भी दिमाग़ के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है

इस तरह के क़ातिल सामाजिक, जैविक और आनुवंशिक स्थितियों का मिश्रण होते हैं. ऐसा कम ही होता है कि इनमें कोई मानसिक बीमारी हो. लेकिन ये देखा गया है कि अकसर इस तरह के लोग दस साल की उम्र के बाद भी बिस्तर गीला करते हैं और जानवरों के प्रति क्रूरता भी इनमें देखी गई है.

ऐसा अक्सर सुना जाता है कि इस तरह के लोगों को हत्या करने में एक अजीब सा आनंद या संतुष्टि महसूस होती है. और ऐसे लोगों का सबसे आसान शिकार होते हैं बच्चे और महिलाएँ.

डॉक्टर वोहरा कहते हैं, “ये लोग अपने आप को समाज का अंग नहीं मानते और समाज से एक तरह से नाराज़ रहते हैं. इस वजह से उनके निजी संबंध पनप नहीं पाते. तो लोगों की हत्या करके और उनके शरीर का शोषण करके वो अपने आपको ताकतवार महसूस करते हैं, उन्हें एक अजीब तरह की विजय महसूस होती है. उन्हें लगता है कि उन्होंने समाज से बदला लिया है, और इसी संतुष्टि का एहसास बार-बार महसूस करने के लिए ये बार-बार हत्याएँ करते हैं.”

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि ज़्यादातर मामलों में ऐसे आदमी का चिकित्सा के ज़रिए उपचार मुश्किल होता है. अगर किसी की दिमाग़ी बनावट में ही खोट हो तो फिर भी उसे डॉक्टरी मदद दी जा सकती है वरना ऐसे हत्यारों के लिए कोई सफ़ाई नहीं दी जा सकती और उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा मिलना ही जायज़ है.

 
 
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