http://www.bbcchindi.com

रविवार, 14 जनवरी, 2007 को 01:21 GMT तक के समाचार

संजीव श्रीवास्तव
भारत संपादक, बीबीसी हिंदी सेवा

मुलाक़ात- ख़ुर्शीद महमूद कसूरी के साथ

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद कसूरी से.

पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश-

सबसे पहला सवाल आप हमेशा ही सजे-धजे अंदाज़ में दिखते हैं, बढ़िया सूट, बढ़िया टाई. ये शौक भी पुराना है क्या?

जी हाँ, ये शौक पुराना है. मेरे वालिद को कपड़ों का ख़ास शौक नहीं था, लेकिन मेरी वालिदा का पूरा खानदान कपड़ों का ख़ासा शौकीन था. चूँकि मैं वालिदा का सबसे बड़ा लड़का था और वालिदा मेरा ख़ास ख्याल रखती है. शायद मेरी वालिदा से ही मुझे विरासत में ये मिला. पहले फितरतन और फिर आदतन.

पहले जमाने में सजने-सँवरने और अच्छे कपड़े पहनने को ठीक नहीं समझा जाता था, लेकिन आजकल तो इसके लिए नया शब्द ‘मैट्रो सैक्सुअल’ गढ दिया गया है?

मैं आपका मतलब समझ गया हूँ. मगर पाकिस्तान में ये परंपरा नहीं रही है. हिंदुस्तान में अगर महात्मा गाँधी आदर्श थे तो पाकिस्तान में स्वाभाविक तौर पर क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना.

हमारे यहाँ ड्रेस को कभी पैमाना नहीं माना गया और न ही इसे नकारात्मक रूप में लिया जाता है. न कायदे आजम के लिए समझा गया, न भुट्टो साहब के लिए, न मोहतरमा फातिमा जिन्ना के लिए और न नवाज शरीफ़ साहब के लिए और न अब परवेज मुशर्रफ़ साहब के लिए समझा गया.

तो सोच में फ़र्क है. लोग ये देखते हैं कि आप कर क्या रहे हैं, ये नहीं कि आप कौन से कपड़े पहन रहे हैं. जहाँ तक पाकिस्तान के मतदाताओं का सवाल है तो मैं देहाती इलाक़े से चुना गया हूँ. अगर लोगों पर ड्रेस का नकारात्मक असर होता तो मैं समझता कि मुझे इसका नुक़सान हुआ है, लेकिन ऐसा नहीं है.

एक बार मुझे जल्दबाजी में चुनाव क्षेत्र में जाना पड़ा और मैं सूट के बजाए पाकिस्तान की राष्ट्रीय पोशाक सलवार-कुर्ते में गया, तो वहाँ लोग निराश हो गए. मैंने उनसे इसकी वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि वे मुझे सूट में देखना चाहते थे.

मैं लंदन में सेवलरो में अपने सूट सिलवाता हूँ. हिंदुस्तान के भी कई लोग वहीं से कपड़े सिलवाते थे. मैने उससे पूछा कि पाकिस्तान-भारत के तुम्हारे ग्राहक कौन-कौन से हैं. उसने बताया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और कायदे-आजम. उसने बताया कि विदेशी कपड़े जलाने के आंदोलन के दौरान पंडितजी ने सारे सूट जला दिए थे और उसे बहुत दुख हुआ था.

इसलिए मैं कहना चाहूँगा कि हमारे यहाँ ड्रेस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता, लेकिन ये ज़रूर देखा जाता है कि उस व्यक्ति ने मुल्क़ के लिए किया क्या है.

आपने जिन्ना से लेकर मुशर्रफ साहब की पोशाकों का जिक्र किया. आपकी नज़र में सबसे अच्छा ‘ड्रेस सेंस’ किसका था?

मेरे ख़्याल से क़ायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना का. मेरा मानना है कि उनका ड्रेस सेंस बेहतरीन था. पंडितजी को तो मैने सूटों में नहीं देखा. लेकिन उनकी बड़ी शोहरत थी. कई लोग कहते थे कि उनके कपड़े पेरिस से धुलकर आते थे. ये सच हो या झूठ. ये तो नहीं पता, लेकिन इसका मतलब है कि उन्हें भी कपड़ों का बेहद शौक था.

बात आगे बढ़ाएं उससे पहले हम जानना चाहेंगे कि आपके पसंदीदा गाने कौन से हैं?

फ़ैज अहमद फ़ैज का और नूरजहाँ का गाया गीत ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग’ बहुत पसंद है. इसके अलावा ‘ये हवा , ये रात, ये चाँदनी’ भी मुझे पसंद है. एक जमाने में यह पाकिस्तान में भी बहुत मशहूर हुआ था. हालाँकि मुझे नहीं पता कि ये गाना किसका था.

मिर्ज़ा ग़ालिब की गज़ल जिसे जगजीत सिंह ने गाया है ‘रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जब आँख से ही न टपके तो लहू क्या है’, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का क्रांतिकारी गाना ‘जब ताज उछाले जाएंगे, जब तख्त उखाड़े जाएंगे, हम देखेंगे’ और ‘महल’ फ़िल्म का गाना ‘आएगा आने वाला’ भी मुझे बहुत पसंद है.

फ़िल्में हिंदुस्तानी हों या पाकिस्तानी. या फिर क्लासिकल, सेमीक्लासिक या फिर अंग्रेजी. मुझे सब तरह की फ़िल्में पसंद हैं. खाना हो या संगीत बचपन से ही मुझे सभी तरह का पसंद है.

आपने खाने की बात की तो खाने में खास क्या पसंद है?

मुझे जापानी, भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, चाइनीज आदि सभी तरह के व्यंजन पसंद हैं.

पंजाब विश्वविद्यालय से इतिहास से स्नातक करने के बाद मैं 21 साल की उम्र में ही पाकिस्तान से बाहर चला गया था.

इंग्लैंड मैं पाँच साल रहा. लंदन कास्मोपालिटन शहर है. वहाँ हर किस्म का खाना मिलता है. अगर अच्छा पकाया गया हो तो हर किस्म का खाना मुझे पसंद है. बेहद पसंदीदा व्यंजन की बात करें तो भिंडी गोश्त और सादी रोटी.

और ये किसके हाथों की?

अब वो जमाना गया जब हम कहें कि बेगम की हाथ की, अब तो खानसामा ही पकाता है. पहले जब मैं मंत्री नहीं था तो वक्त मिल भी जाता था. बच्चों के साथ छुट्टियां मनाने ब्रिटेन और अमरीका जाते थे, तो फ्लैट किराए पर लेते थे, तब मेरी पत्नी बहुत शौक से खाना बनाती थी.

हालाँकि मेरी पत्नी नसीम कसूरी पाकिस्तान की बहुत सफल महिलाओं में से हैं. वो दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा प्राइवेट स्कूल सिस्टम चला रही हैं. कैम्ब्रिज ‘ए’ और ‘वो’ लेवल की तैयारी कराती हैं. उन्होंने तीस साल पहले 19 छात्रों से स्कूल शुरू किया था और अब छात्रों की संख्या बढ़कर एक लाख 20 हज़ार हो गई है.

व्यस्तता के बावजूद उन्हें खाना पकाने का शौक है, लेकिन मौका पाकिस्तान से बाहर जाने पर ही मिल पाता है.

पिछले दिनों ही वह मुझसे कह रहीं थीं कि मैं तो फ्रेंच क्विज़ीन का कोंग्दोब्लों कोर्स शुरू करने जा रही हूँ. मैने कहा जरूर, इससे तो मुझे ही फ़ायदा होगा. क्योंकि इसका तजुर्बा भी मुझ पर ही होगा.

आप भी क्या उन पतियों में शामिल हैं कि पत्नी कुछ भी पकाए तारीफ़ तो करनी ही पड़ेगी?

हाँ वो तो करनी ही चाहिए. मेरे ख़्याल से कामयाब शादी का राज भी यही है. खासतौर पर अगर बीबी खाना बनाए. खाना कैसा बना है, ये बहुत अहम नहीं है ज़्यादा ज़रूरी आपके विचार हैं.

मुझे बहुत दिलचस्प लग रहा है कि अभी तक के इंटरव्यू में आपने सबसे ज्यादा वक्त अपनी बेगम को दिया है और उनकी खुलकर तारीफ़ की है?

क्योंकि मैं रत्ती भर संदेह के बिना कह सकता हूँ कि वह पाकिस्तान की सबसे सफल शख्सियतों में से है. ऐसा नहीं है कि इसका उद्देश्य सिर्फ़ मुनाफ़ा कमाना है.

अभी हमने एक यूनीवर्सिटी स्थापित की है और मैं गर्व के साथ कह सकता हूँ इसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं है. उसका ट्रस्टी मंडल पूरी तरह स्वतंत्र है. हमारे खानदान के इसमें सिर्फ दो सदस्य हैं. मैं समझता हूँ कि राष्ट्र निर्माण में यह यूनीवर्सिटी बड़ी भूमिका निभाएगी.

कहा तो ये जाता है कि हर सफल व्यक्ति के पीछे एक महिला होती है, लेकिन बदकिस्मती से अक्सर ये स्वीकार नहीं किया जाता है कि हर सफल महिला के पीछे भी पुरुष होता है. मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि मेरी पत्नी की सफलता के पीछे मैं हूँ. लेकिन मैं मानता हूँ कि अगर पति पत्नी से सहयोग नहीं करेगा तो जीवन मुश्किल हो जाएगा.

तो क्या आप मानते हैं कि आपकी पत्नी आपसे ज़्यादा सफल हैं?

मैं समझता हूँ कि कई मामलों में वो मुझसे ज़्यादा कामयाब हैं.

आपकी बेगम से शादी क्या अरेंज्ड थी?

कुछ-कुछ. इसे सेमी अरेंज्ड कहा जा सकता है. पहले हम मिले और फिर हमने अपने माता-पिता को अपनी पसंद के बारे में बताया.

आपकी शिक्षा जबरदस्त रही है. क्या आपको लगता है कि सियासत में ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज की पढ़ाई काम आती है या फिर लगता है कि अगर ये पढ़ाई नहीं भी की होती तो सियासत तो कर ही सकते थे?

देखिए अग़र जिंदगी का मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ सियासत में कामयाबी है तो फिर तो कोई फ़ायदा नहीं, लेकिन मेरा मक़सद ये नहीं है. मैं राजनीति में भी किसी मकसद से हूँ. मैं समझता हूँ कि तालीम व्यक्ति की जिंदगी में हर क़दम पर उसकी मदद करती है.

चाहे मैं विदेश मंत्री रहूँ या न रहूँ. मैं तो इस पर अमल करता ही हूँ. लेकिन तालीम का लाभ सार्वजनिक जीवन में ज़रूर मिलता है. आपकी सोच का पैमाना बदल जाता है. हर व्यक्ति राष्ट्रीय हित को बढ़ाने की कोशिश करता है. लेकिन राष्ट्रीय हित की परिभाषा क्या हो, ये बहुत हद तक उस व्यक्ति की शिक्षा और पृष्ठभूमि पर निर्भर करता है.

हालाँकि कुछ लोग राष्ट्रपति मुशर्रफ़ और हमारी आलोचना करते हैं, लेकिन हम राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा दे रहे हैं. हो सकता है कि मेरी तालीम मुझे बता रही हो कि हमारे इन कद़मों से ही राष्ट्रीय हित बढ़ेगा.

आप क्या विदेश मंत्री होने का लुत्फ़ उठा रहे हैं?

अगर चुनौती नहीं होती तो काम का कोई मजा नहीं था, लेकिन चुनौती है तो लुत्फ़ आ रहा है. अगर सिर्फ़ गाड़ी पर झंडा है, आवभगत है तो ये तो मेरे लिए बड़ी मुश्किल होती. इससे प्राइवेसी ही खत्म हो जाती है.

पाकिस्तान में तो मौक़ा मिलता नहीं, लंदन में अपनी बेगम के साथ फ़िल्म देखने के लिए गया तो वहाँ भी लोगों ने हमें घेर लिया और साथ में तस्वीरें उतारने के लिए कहने लगे.

माफ़ कीजिएगा, लेकिन चाहे फ़िल्म स्टार हो या रॉक स्टार, या फिर शीर्ष राजनीतिज्ञ. हर कोई ये ज़रूर कहता है कि उनकी प्राइवेसी ख़त्म हो जाती है. जबकि कितने लोग उस पोजीशन पर पहुँचने के लिए तरसते हैं कि उनकी प्राइवेसी ख़त्म तो हो?

मैने ये नहीं कहा कि मुझे बुरा लगा, मेरी बेगम को बहुत बुरा लगा. कहने का मतलब है कि कीमत चुकानी पड़ती है.

विदेश मंत्री बनना मेरे लिए चुनौती है. आप आज पाकिस्तान के भारत, अफ़गानिस्तान और इस्लामिक देशों के साथ रिश्ते देखें तो मैं समझता हूँ कि हम इस स्थिति में हैं कि अंतर पैदा कर सकते हैं. अगर क़ायदे आजम के सपनों को साकार करना है तो यह रास्ता सही है जो हमने अपनाया है.

मैं अल्लाह का शुक्रिया अदा करता हूँ कि मुझे विदेश मंत्री के रूप में देश को क़ायदे आजम के पाकिस्तान की तरफ ले जाने का मौक़ा मिला है.

कुछ राजनयिक साफ़ झूठ बोल जाते हैं, कई बातें छुपानी पड़ती हैं?

चार साल से मैं मंत्री हूँ और मैं चुनौती देता हूँ कि मैने कभी वो बात नहीं की जिसपर मैं विश्वास नहीं करता. मैं धड़ल्ले से बात करता हूँ. बात दिल से निकलती है. दिमाग और दिल अगर एक साथ हों तो बात खुद-ब-खुद ऊँची हो जाती है.

फ़िल्मों का शौक है क्या?

शौक तो है पर अब वक्त नहीं मिल पाता. पढ़ाई के दिनों में खूब फ़िल्में देखी हैं. अब भी अगर वक्त मिले तो ज़रूर देखने जाऊँगा.

जवानी के दिनों की पसंदीदा फ़िल्मों को याद करना मुश्किल होगा. मुझे हॉलीवुड, बॉलीवुड, लॉलीवुड, देसी सभी तरह की फ़िल्में पसंद थी.

हॉलीवुड के पसंदीदा स्टार कौन हैं?

एक जमाने में मैं रॉक हडसल से बहुत प्रभावित था. उनकी रोमांटिक कॉमेडी मुझे पसंद थी. इसके अलावा रिचर्ड बर्टन, एलिजाबेथ टेलर, पीटर ओ टूल. पहले पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्मों पर प्रतिबंध नहीं था, इसलिए मुझे दिलीप कुमार की फ़िल्में भी काफ़ी पसंद थी.

दिलीप कुमार की कौन सी फ़िल्म बहुत पसंद थी?

मुझे याद है. तब मैं स्कूल में था. फ़िल्म ‘आन’ का संगीत पाकिस्तान में बहुत मशहूर था. मुगले आज़म मैं नहीं देख सका.

ईमानदारी से कहूँ तो ब्रिटेन में पढ़ाई के बाद मैने ज़्यादातर अंग्रेजी फ़िल्में देखी. ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी फ़िल्में मुझे पसंद थी, लेकिन लंदन में कोई दूसरा विकल्प नहीं था. जब वापस पाकिस्तान लौटा तो भारतीय फ़िल्में बंद हो गई थी. हाँ मोहम्मद अली की अदाकारी मुझे बहुत पसंद थी.

क्रिकेट का भी क्रेज है क्या?

मुझे शुरू से ही क्रिकेट में दिलचस्पी है. ख़ासतौर पर उन मैचों में जहाँ पाकिस्तान खेल रहा हो. जब मैं कॉलेज में था तो पाकिस्तान ने ओवल में पहला टेस्ट जीता था. फज़ल महमूद ने शानदार गेंदबाजी की थी और मुझे याद है कि तब अंग्रेजी अखबारों की हैडलाइन थी ‘इंग्लैंड फैजल्ड आउट’.

वैसे तो पाकिस्तान ने एक से बढ़कर एक क्रिकेटर दिए हैं, मसलन हमारी पीढ़ी में इमरान ख़ान पर तमाम लड़कियां फिदा थी. आपका पसंदीदा पाकिस्तान क्रिकेटर कौन था?

पाकिस्तान को अपने नेतृत्व में पहली टेस्ट विजय दिलाने वाले हफीज़ कारदार और दूसरे पाकिस्तान को विश्व कप दिलाने वाले इमरान ख़ान.

और भारतीय क्रिकेटरों में?

हिंदुस्तान के क्रिकेटरों में सुनील गावस्कर, कपिल देव बेहतरीन थे. और बेशक सचिन तेंदुलकर तो हैं ही. ये ठीक है कि इन दिनों उनका बल्ला लय में नहीं है.

भारत और पाकिस्तान में क्रिकेटरों पर कुछ ज़्यादती होती है. जब अच्छा खेलते हैं तो उनकी वाहवाही होती है और जरा भी चूका तो उसे मौका ही नहीं देते. बुरा दौर हर खिलाड़ी का आता है. चाहे कोई भी खिलाड़ी रहा हो, ज़हीर अब्बास, इमरान खान, फ़जल महमूद सभी का बुरा दौर आया, लेकिन इन सभी ने वापसी की.

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड दोनो देशों की ऐसी संस्थाएं हैं जो एक-दूसरे का पूरी तरह से सहयोग करती हैं, फिर बाकी क्षेत्रों में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?

बिल्कुल हो सकता है. हम ऐसा ही चाहते हैं. पाकिस्तान ने इस दिशा में कई क़दम उठाए हैं. बल्कि विपक्ष तो हमारी आलोचना कर रहा है कि हमारी विदेश नीति ज़रूरत से ज़्यादा लचीली हो रही है और भारत के उदासीन रवैये के बावजूद हम एकतरफा क़दम उठा रहे हैं, लेकिन हम ये समझते हैं कि पाकिस्तान का राष्ट्रीय हित है और हो सकता है कि वो दिन आ जाए जब दोनो देशों के विदेश मंत्रालय सहयोग करने लगें.

जिंदगी में सबसे ज़्यादा शर्मिंदगी कब महसूस हुई?

मुझे याद है कि जब मैं सात-आठ बरस का था. मेरे पिता सियासत में थे. पाकिस्तान के तमाम विपक्षी नेताओं से उनकी दोस्ती थी. एक नई पार्टी बनाई जा रही थी. अब्दुल गफ़्फार खाँ साहब भी इसमें शामिल थे. हमारे घर पर बैठक हो रही थी और मुझे कमरे में दाखिल नहीं होने दिया जा रहा था. मैं दरवाजे के बाहर कान लगाए खड़ा था. तभी मेरे पिता ने अचानक दरवाजा खोला तो मुझे भारी शर्मिंदगी महसूस हुई.

मतलब बचपन से ही आपके मन में था कि जाना सियासत में ही है?

तीन पीढ़ियों से हमारा खानदान सियासत में है. मेरे दादा अहम स्वतंत्रता सेनानी थे. ऑल इंडिया ख़िलाफत कमेटी के हिंदुस्तान में मौलाना मोहम्मद अली जौहर के बाद दूसरे नंबर के नेता थे. उन्हें और उनके दो बड़े भाइयों को अंग्रेजों ने फाँसी की सज़ा सुनाई थी. हालाँकि इस सज़ा पर अमल नहीं हो पाया था. प्रथम विश्व युद्ध में जब अंग्रेजों को कांग्रेस के सहयोग की ज़रूरत पड़ी तो उन्हें माफ़ कर दिया गया था.

19 साल की उम्र में मेरे वालिद भारत छोड़ो आंदोलन के तहत गिरफ़्तार हुए थे. सो सार्वजनिक जीवन मेरे खून में है और आठ साल की उम्र में मैने जो कुछ किया वो हैरानी की बात नहीं है.

अच्छा कोई 18 साल की उम्र वाली शर्मिंदगी भी बताएं?

नहीं ऐसी घटनाएं नहीं हुई. कोई याद नहीं आ रही है.

जिंदगी में सबसे ज़्यादा अफ़सोस किस बात का है?

मैं खुद को बहुत खुशकिस्मत समझता हूँ, कि मुझे वालिद, वालिदा, भाई और बीबी का भरपूर सहयोग मिला. अग़र अफ़सोस है तो यही कि मेरी कोई बेटी नहीं है. मुझ पर हमेशा अल्लाह का करम रहा है, लेकिन बेटी के लिए अल्लाह की मर्ज़ी न होने की भी अपनी कुछ वजह होगी.

('एक मुलाक़ात' कार्यक्रम बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - रविवार भारतीय समयानुसार रात आठ बजे प्रसारित होता है.)