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बुधवार, 09 मई, 2007 को 14:50 GMT तक के समाचार
 
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1857: 19वीं सदी का सबसे बड़ा विद्रोह
 

 
 
बहादुर शाह ज़फ़र
कई हिंदू सिपाहियों ने मुगल बादशाह को अपना नेतृत्वकर्ता माना
भारत में वर्ष 1857 का विद्रोह दुनियाभर में अंग्रेज़ी हुकूमत और उपनिवेशवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ 19वीं सदी में हुआ सबसे बड़ा विद्रोह था. शायद यह एक वजह है कि किसी भी इतिहासकार के लिए यह एक बहुत बड़ा और बहुत ज़्यादा महत्व का विषय है.

दरअसल, 1857 के विद्रोह ने दो बहुत बड़े बदलाव भारतीय इतिहास में किए. यूँ कहें कि इससे दो महत्वपूर्ण चीज़ों का अंत हुआ. एक मुग़ल बादशाहत का और दूसरा ईस्ट इंडिया कंपनी का. विद्रोह के बाद ब्रिटेन की महारानी भारत की हुकूमत को ख़ुद अपने प्रभाव में ले लेती हैं.

1857 के संदर्भ में जिस बात को लेकर सबसे ज़्यादा बहस आज भी होती है वो यह है कि इसे पहला स्वाधीनता संग्राम कहें, गदर या विद्रोह कहें, सिपाहियों की बगावत कहें या फिर एक क्रांति कहें.

यह सवाल उठना इसलिए लाज़मी है क्योंकि अलग-अलग जगहों पर इस विद्रोह की अलग-अलग तस्वीर देखने को मिलती है.

यह सही है कि इसकी शुरुआत भी सैनिक विद्रोह के रूप में हुई और सिपाही ही इस विद्रोह की आखिर तक रीढ़ की हड्डी बने रहे पर इस बात को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि जब 10 मई को मेरठ में पहला सैनिक विद्रोह होता है, तभी से लोग भी इसमें शामिल हो गए थे.

मेरठ में बाज़ार के लोगों का समर्थन विद्रोहियों को मिलता है तो दिल्ली में बुनकर, आम व्यापारी, आम लोग विद्रोह को समर्थन देते हैं.

 दरअसल, 1857 के विद्रोह ने दो बहुत बड़े बदलाव भारतीय इतिहास में किए. यूँ कहें कि इससे दो महत्वपूर्ण चीज़ों का अंत हुआ. एक मुग़ल बादशाहत का और दूसरा ईस्ट इंडिया कंपनी का. विद्रोह के बाद ब्रिटेन की महारानी भारत की हुकूमत को ख़ुद अपने प्रभाव में ले लेती हैं
 

लखनऊ में यह क्रांति की तरह उभरता है तो मध्य प्रदेश में आदिवासियों के विद्रोह के रूप में. झाँसी जैसी रियासतें भी इस विद्रोह में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ खड़ी होती हैं.

उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ यह संघर्ष इस तरह खड़ा होता है कि जाति और कई जातियाँ संघर्ष में उतरती हैं. केवल अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ही नहीं बल्कि और रूपों में भी. आदिवासियों का विद्रोह और मेरठ के आसपास जाटों-गूजरों के बीच शुरू हुआ संघर्ष इसका उदाहरण है.

हिंदू-मुस्लिम समीकरण

कई बार हम कहते हैं कि इस विद्रोह में हिंदू और मुसलमान एक साथ खड़े हुए और अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़े और ऐसा देखने को भी मिलता है. बहादुरशाह जफ़र के साथ बड़ी तादाद में हिंदु सिपाही खड़े हुए.

यहाँ मुझे लगता है कि इस तर्क के साथ सावधानी से पेश आना चाहिए क्योंकि मगल शासक इससे कहीं पहले से हिंदुओं को साथ लेकर लड़ते आ रहे थे.

विद्रोह
अंग्रेज़ों ने बर्बरता पूर्वक इस विद्रोह का दमन किया

उदाहरण के लिए शाहजहाँ में दक्षिण भारतीय मुस्लिम शासकों को जीतने के लिए राजपूतों का इस्तेमाल किया. मुस्लिम तो अल्पसंख्यक थे और अगर मुगल शासक हिंदू विरोधी रवैये के साथ चलते तो लंबे समय तक टिके न रह पाते.

हालांकि 1857 के दौरान दिल्ली में कुछ जेहादी समूह भी सामने आए थे और उन्होंने चरमपंथी गतिविधियों की धमकियाँ भी दी थीं पर उन्हें काबू में रखा गया और जब उन्होंने ऐसा दोबारा करने की कोशिश की तो सख़्त क़दम भी उठाए गए.

मसलन, दिल्ली में गौ-हत्या जैसे मुद्दे को उस वक्त मुगल बादशाह के शासन ने गंभीरता से लिया और इसे न होने देने के लिए कार्रवाई की गई.

पर दिल्ली के पतन के साथ ही गंगा-जमुनी संस्कृति भी कमज़ोर हो गई. जैसे-जैसे भुखमरी, ग़रीबी और आर्थिक अस्थिरता बढ़ी, हिंदुओं ने विद्रोह के लिए मुस्लिमों को दोष देना शुरू कर दिया था.

महान शायर, कमज़ोर शासक

हिंदुओं और मुसलमानों के संदर्भ में ज़्यादा ध्यान देने लायक जो तथ्य है वो यह है कि विद्रोह के उस दौर में लाखों हिंदू सिपाहियों ने मुगल बादशाह को अपना नेता माना था. इन हिंदू सिपाहियों में से क़रीब 85 प्रतिशत पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के ब्राह्मण, राजपूत या सवर्ण थे.

ये सब अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक ऐसे व्यक्ति को अपना राजा मानते हैं जो बेशक एक अच्छा शायर है पर एक कमज़ोर शासक है.

इसलिए भी क्योंकि उसकी अवस्था उस वक्त 82 वर्ष की है. एक इतनी बड़ी सेना के नेतृत्व के लिए यह बादशाह एक अनुपयुक्त नेता था.

हालांकि सावरकर जैसे कई राष्ट्रवादी प्रभाव वाले इतिहासकार झांसी और मंगल पांडे जैसे नामों को ज़्यादा महत्व देते हैं पर इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि एक लाख, 39 हज़ार की सेना में से एक लाख सिपाही मुगल बादशाह को ही अपना नेता स्वीकारते हैं.

(बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित)

 
 
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