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श्री श्री रविशंकर से 'एक मुलाक़ात'
 

 
 
आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर
श्री श्री रविशंकर के शिष्य पूरी दुनिया में फैले हुए हैं
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

बीबीसी एक मुलाक़ात में हमारे साथ हैं आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर.

आपका जन्म एक तमिल अय्यर परिवार में हुआ. तब से लेकर आज तक आपकी ज़िंदगी में जो भी बदलाव आए उसके बावजूद आप अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं या आप ‘होलसम इंडियन’ हो चुके हैं?

'होलसम इंडियन' होने के लिए अपनी परंपराओं को छोड़ने की ज़रूरत नहीं है. यहाँ प्रत्येक परंपरा की अपनी खूबी और सुंदरता है. बस ये देखना पड़ेगा कि परंपरा में कट्टरपंथ के तत्व न आने पाएं. या कहें कि परंपरा का ये दावा न हो कि हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं. हमें इससे बचना है. भारत की विरासत को सहेज कर भी रखना है और विशाल दृष्टिकोण भी रखना है.

आपको क्या लगता है कि भारत के लोग अधिक संकुचित मानसिकता के होते हैं. उत्तर भारतीय अपने को श्रेष्ठ मानते हैं और दक्षिण भारतीय अपने आपको?

अपने को बेहतर बताने की आदत आज भी दिखाई देती है. लेकिन मीडिया के प्रभाव से इसमें कमी आई है. आज लोग आपस में मिल रहे हैं. बात कर रहे हैं. अंतरजातीय विवाह हो रहे हैं. अध्यात्म की एक लहर उठती दिखाई दे रही है जिसकी वजह से भी ये दूरियाँ कम हो रही हैं.

आपका कहना है कि हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं.

बिल्कुल.

लोग आपके बचपन के बारे में बहुत कम जानते हैं. अपने बचपन के बारे में कुछ बताइए?

बचपन ख़त्म नहीं हुआ. वो अभी चल रहा है. हाँ, बचकानी हरकतें नहीं करता. मैं जैसा पहले था वैसा ही आज भी हूँ. बस अंतर इतना है कि तब शरीर भी बच्चों जैसा था और आज सिर्फ़ मन बचपन जैसा है.

क्या बचपन में आप शरारती थे?

 'होलसम इंडियन' होने के लिए अपनी परंपराओं को छोड़ने की ज़रूरत नहीं है. यहाँ प्रत्येक परंपरा की अपनी खूबी और सुंदरता है. बस ये देखना पड़ेगा कि परंपरा में कट्टरपंथ के तत्व न आने पाएं. या कहें कि परंपरा का ये दावा न हो कि हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं. हमें इससे बचना है. भारत की विरासत को सहेज कर भी रखना है और विशाल दृष्टिकोण भी रखना है
 

हाँ नटखट था और आज भी हूँ. मैं चाहता हूँ कि हर बच्चा शरारती हो और बड़ों को जितना सता सके उतना सताए. लेकिन आज बच्चे जब तनाव में होते हैं तो दूसरों को तंग करते हैं. खेलकूद में हम दूसरों को तंग करते थे लेकिन उससे कभी किसी को नुक़सान नहीं हुआ. कन्नड़ में एक लोकोक्ति है कि बिल्ली का खेल, चूहे का प्राण-संकट. ऐसा नहीं होना चाहिए. जीवन आनंद की अभिव्यक्ति है. अगर हम ये समझ सकें तो सारे तनावों से मुक्ति पा सकेंगे.

बचपन में किस तरह के खेल खेला करते थे?

खेल मुझे बचकाने लगते थे. बचपन में भी मैं गंभीर चिंतन करता था. मैं सोचता था कि ये जीवन क्या है. भगवान कौन है. सत्य क्या है. समाज कैसे एक होगा. ऐसी बातें मैं सोचा करता था. जब लोगों को क्रिकेट खेलते देखता था तो ये सोचता कि इससे क्या मिलने वाला है. मेरी संगीत, नृत्य और नाटक में बहुत रुचि थी. खेल में रुचि नहीं थी.

बॉलीवुड के कई लोग आपके भक्त हैं. क्या आपका बॉलीवुड से कोई नाता या फ़िल्मों में रुचि है?

बहुत से लोग बॉलीवुड में जाते हैं और अभिनेता-अभिनेत्री बनना चाहते हैं. सिनेमा क्षेत्र का समाज पर बड़ा प्रभाव है. हम पश्चिम की फ़िल्मों की नकल करते हैं. फ़िल्मों का सकारात्मक प्रभाव होना चाहिए. अपनी रचनात्मकता को उभरने का मौका नहीं देते. जब बॉलीवुड पश्चिम की नकल करके हमारे सामने पेश करता है तो युवा पीढ़ी भी उसी का अनुसरण करने लगती है. इससे मैं संतुष्ट नहीं हूँ. मैं चाहता हूँ कि लोग अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल करके कुछ नया बनाएँ.

गांव के लोग टीवी पर समाचार देखते हैं. समाचार पढ़ने वाले टाई-सूट पहनकर समाचार पढ़ते हैं. उन्हें कभी-कभी साफा बाँधना चाहिए. कभी धोती-कुर्ता पहनना चाहिए. अगर समाचार वाचक ऐसा करेंगे तो गांव के लोग उन्हें खुद से जोड़ कर देख पाएंगे. हमारे समाचार भी बीबीसी और सीएनएन की नकल लगते हैं. फ़िल्मों में दिखाई जा रही हिंसा का भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है. पश्चिम के लोग फ़िल्मों में बढ़ती हिंसा से परेशान हैं. हिंसा को गौरव के साथ दिखाने की प्रवृत्ति बंद होनी चाहिए.

ऐसा माना जाता है कि बॉलीवुड किसी भी आध्यात्मिक प्रयास के उल्टे ही काम करता है. तो ऐसे में आपने कैसे कई फ़िल्मी सितारों को अपना अनुयायी बना लिया?

मैं उनको हस्ती या सितारे की तरह नहीं देखता. सभी को मनुष्य के रूप में देखता हूँ. सभी मनुष्यों के भीतर आध्यात्म के लिए एक चाह है. सभी को शांति, प्रसन्नता और खुशी की तलाश है. शांति की खोज करना उनका भी अधिकार है. इसलिए वो आते हैं. वो भी मनुष्य हैं. उनको भी ज़रूरत है. और उन्हें तो ज़्यादा ज़रूरत है क्योंकि वो अधिक तनावपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं.

आप किस तरह की फ़िल्में पसंद करते हैं?

मैं तो सारे जीवन को ही एक फ़िल्म मानता हूँ. जो भी मनुष्य मेरे सामने आता है वो भी मुझे एक फ़िल्म ही लगता है. हर आदमी हीरो और हीरोइन है. सभी की अपनी एक कहानी है. उसे ही सुलझाने में लगा रहता हूँ. एक हस्ती बिना किसी ज़िम्मेदारी के यश भोगता है. लेकिन एक गुरू के पास लोगों और समुदाय की ज़िम्मेदारी होती है. आध्यात्मिक रस हर तरह के सवालों का जवाब देता है.

श्रीश्री रविशंकर
आध्यात्मिक गुरू रविशंकर सुदर्शन क्रिया सिखाते हैं

श्री श्री आपने अभी भी मेरे सवालों का जवाब नहीं दिया कि आपको किस तरह की फ़िल्में पसंद हैं?

अगर मुझे देखने का समय मिले तो मैं हर तरह की फ़िल्में पसंद करता हूँ. अभी तो कोई फ़िल्म याद नहीं आ रही है लेकिन बचपन में पौराणिक फ़िल्में देखा करता था. आज भी हमारे सत्संग में लोग फ़िल्मी गाने गाते हैं. फ़िल्मों में भले ही वो व्यावसायिक तौर पर रखे गए हों लेकिन हमारे यहाँ लोग पूरे मन से गाते हैं. ज़िंदगी धूप तुम घना साया...इस तरह के गाने भक्त लोग सत्संग में गाते हैं. उनकी आँखों से गीत फूट पड़ता है.

ज़िंदगी धूप तुम घना साया...तो यही गाना हम सुनवा देते हैं. जो लोग आध्यात्म के बारे में कम जानते हैं उनके लिए आप क्या कहेंगे. क्या हिमालय की गोद में जाकर बैठ जाना ही आध्यात्म है या आप रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी इसे हासिल कर सकते हैं.

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ही तो इसकी अधिक आवश्यकता है. हिमालय की कंदराओं में बैठने वालों को आध्यात्म की कोई ज़रूरत नहीं है. जो बाज़ार में जाएगा उसे ही तो पैसे की ज़रूरत पड़ेगी. मरुभूमि में पैसे ले जाने की ज़रूरत है?

रोज़मर्रा की जिंदगी में तरह-तरह के लोगों से मिलना पड़ता है. ज़िम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं. ऐसे में आध्यात्म का बल बहुत ज़रूरी है. इसके बिना व्यक्ति टूट जाता है. आध्यात्म एक व्यक्ति को संसार की परिस्थितियों से जीत दिलाता है और जीवन के अंतिम लक्ष्य तक पहुँचा देता है.

आप कह रहे हैं कि दैनिक जीवन जीते हुए अध्यात्म को हासिल किया जा सकता है. उसके लिए क्या अभ्यास करना पड़ता है?

उसके लिए थोड़ा सीखना पड़ता है. योग, ध्यान और प्रायाणाम करना पड़ता है. सत्संग और भजन करें. योग वशिष्ठ, अष्टावक्र गीता, भगवद् गीता और महात्मा बुद्ध की वाणी पढ़ें, इससे काफ़ी ज्ञान मिलता है.

 मैं चाहता हूँ कि लोग अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल करके कुछ नया बनाएँ. गांव के लोग टीवी पर समाचार देखते हैं. समाचार पढ़ने वाले टाई-सूट पहनकर समाचार पढ़ते हैं. उन्हें कभी-कभी साफा बाँधना चाहिए. कभी धोती-कुर्ता पहनना चाहिए. अगर समाचार वाचक ऐसा करेंगे तो गांव के लोग उन्हें खुद से जोड़ कर देख पाएंगे
 

आपको 1982 में ज्ञान प्राप्त हुआ. उस समय क्या हुआ था. अपने अनुभव हमसे बाँटेगे?

मैं जैसा था वैसा ही रह गया. एक तड़प थी जो ख़त्म हो गई. जब मैंने सुदर्शन क्रिया सिखाना शुरू की तो बस मन शांत हो गया.

हमारे पाठकों को सुदर्शन क्रिया के बारे में कुछ बताएं?

हमारे सांस, मन, शरीर और आत्मा सब में एक लय है. इन लय को एक साथ लाने को ही सुदर्शन क्रिया कहते हैं. इसे प्रायाणाम सीखने के बाद कर सकते हैं. आधा-पौना घंटा करने के बाद दर्शन होने लगता है कि मैं कौन हूँ. ध्यान-समाधि लगने लगती है. दो-चार दिन सीख लें उसके बाद खुद से भी कर सकते हैं. दो दिन प्राणायाम और फिर सुदर्शन क्रिया सिखाते हैं. पूरी दुनिया में इसे सिखाने वाले लोग हैं और जो भी इस काम से जुड़ना चाहते हैं, उनका स्वागत है.

आध्यात्मिक गुरू की छवि एक गंभीर, प्रवचन देने वाले व्यक्ति की होती है. वैसे तो आप बिल्कुल नहीं लगते. आप हँसी-मजाक भी करते हैं और फ़िल्मों की बातें भी करते हैं. इन दोनों में कैसे तालमेल बैठाते हैं?

देखिए मैंने कभी भी ऐसा कुछ नहीं किया जो मेरे लिए सहज नहीं है. कोई बनावटीपन और दिखावे की बात नहीं होती तो कोई बोझ भी नहीं होता. मैं इसे ही आध्यात्म समझ सकता हूँ. सरल, सहज जीवन को ही आध्यात्म मानता हूँ और वैसे ही जीता हूँ.

आपकी पसंद का कोई गाना.

चाहूँगा मैं तुझे सांझ सवेरे....

भारत में कई आध्यात्मिक गुरू हुए हैं. उनके बारे में आपकी क्या सोच है. ओशो के बारे में क्या सोचना है आपका?

मैं किसी के बारे में राय नहीं रखता हूँ. सबकी अपनी-अपनी जगह है. एक ही सत्य और ब्रह्मसत्ता है. अलग-अलग समय में वो लोगों से तरह-तरह के काम कराता है. दुनिया की रीति ऐसे ही चलती है. मुझे संस्कृत का श्लोक याद आता है दुर्जनं प्रथमं वंदे....बुरा आदमी खुद गढ्ढे में गिरकर तुम्हें सिखा रहा है कि तुम गढ्ढे में न गिरो. इसलिए बुरे आदमी को भी प्रणाम करो. सज्जन को भी प्रणाम करो जो तुम्हें ये सिखा रहा है कि तुम्हें क्या करना चाहिए. इस तरह हर आदमी से हम कुछ न कुछ सीखते हैं. व्यवहार सबके लिए अलग-अलग हो सकता है लेकिन भाव सबके लिए एक सा होना चाहिए. समभाव सबके लिए हो सकता है. समव्यवहार नहीं हो सकता. अलग-अलग लोगों से अलग-अलग व्यवहार करें. बच्चों से अलग तरह का व्यवहार करें और बड़ों से अलग तरह का. सबमें एक ही नूर को देखना ही बुद्धिमानी है.

आपका कहना है कि सबकी अपनी-अपनी जगह है?

हाँ, सबका अपना-अपना योगदान रहा है और अपनी-अपनी कमज़ोरियाँ भी रही हैं.

ओशो की क्या कमज़ोरी थी?

उस पर तो हम कमेंट नहीं करेंगे. लोगों की अपनी श्रद्धा है जो उसे चाहिए वो ले और जो जमता नहीं है उसे छोड़ दे.

आजकल बाबा रामदेव छाए हुए हैं. उनसे कभी मुलाक़ात हुई है?

हाँ मुलाक़ात होती रहती है. उन्होंने बढ़िया काम किया है. योग को जन-जन तक पहुँचाया है. हमारे देश में समाज सुधारकों की बहुत ज़रूरत है. और अधिक हो जाए तो हम लोग थोड़ी अधिक सांस ले सकें.

कई लोगों का दिल टूटता है और वो अपने प्यार में सफल नहीं हो पाते. ऐसे लोगों के लिए आपकी क्या राय है?

गुरू का काम यही है कि वो टूटे दिलों को जोड़े. हमारे किसी भी ध्यान गुरू के पास बैठकर ध्यान करो, दिल आराम से जुड़ जाएगा.

दिल जुड़ भी जाता है?

बिल्कुल. पहले आपका दिल जुड़ेगा और फिर आप दूसरों से दिल जोड़ पाएंगे.

पुरुष गायकों में आपको कौन पसंद हैं?

कैलाश खेर बहुत अच्छा गाते हैं. शास्त्रीय संगीत मुझे बहुत पसंद है. पंडित जसराज जी, बाल मुरली कृष्ण, एमएस सुब्बालक्ष्मी को सुनता हूँ.

नई पीढ़ी के अभिनेता और अभिनेत्रियों में कौन पसंद हैं?

आजकल तो मेरे पास समय ही नहीं होता.

श्री श्री जाते-जाते आप हमारे पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?

मुस्कुराते रहो. हंसो और हंसाओ और न फंसो और न फंसाओ.

 
 
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