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सोमवार, 02 जुलाई, 2007 को 09:54 GMT तक के समाचार
 
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राजस्थान में रेलवे का एक 'जनता स्टेशन'
 

 
 
रेलवे स्टेशन
इस स्टेशन को बनाने के लिए लोगों ने तकरीबन आठ लाख़ रुपए ख़र्च किए
भारत में कोई साढ़े सात हज़ार रेलवे स्टेशन हैं लेकिन राजस्थान के शेखावटी अंचल में बने बलवंतपुरा-चेलासी रेलवे स्टेशन की बात ही कुछ और है.

इस स्टेशन को जनता ने अपने बलबूते बनाया और रेलवे को सौंप दिया.

जनता के इस स्टेशन ने अपनी सेवा के ढ़ाई साल पूरे कर लिए हैं.

कभी उन रेल पटरियों पर वीराना पसरा रहता था. लेकिन अब वो जगह गाड़ियों की रेलमपेल और यात्रियों की आवाजाही से गुलज़ार रहती है.

दिन रात हज़ारों हाथों ने काम किया. किसी की ईंट, किसी का गारा और सामूहिकता का जज़्बा.

इस तरह एक रेलवे स्टेशन किसी रहनुमा के रहमो करम के बिना बनकर खड़ा हो गया.

अब जब भी वहाँ रेल आती है और रेलवे का सिग्नल झुकता है तो ऐसा लगता है जैसे भारतीय रेलवे ही इस गाँव को सलाम कर रहा हो.

एकता की ताकत

इस अभियान की धुरी गाँव के ही एक बुज़ुर्ग बजरंग लाल जांगिड़ थे.

 जब स्टेशन शुरू हुआ तो पहले दिन 581 रुपए के टिकट बिके. अब हर माह इस छोटे से स्टेशन से 40 हज़ार रुपए के टिकटों की बिक्री हो रही है
 
बजरंग लाल जांगिड़, स्थानीय निवासी

उन्होने बताया,"सबने मिलकर प्रयास किया. हम नेताओं के भरोसे नहीं रहे और काम पूरा किया. देखते-देखते एक मुकम्मल स्टेशन यहाँ वजूद में आ गया."

रेलवे विभाग का आकलन है कि गाँव वालों ने इस स्टेशन के निर्माण में सात लाख 82 हज़ार रुपए ख़र्च किए.

इसमें उनकी मेहनत का मोल शामिल नहीं है. अब चार रेल गाड़ियाँ वहाँ ठहरती हैं और सैकड़ों यात्री इस सेवा का लाभ उठा रहे हैं.

बजरंग लाल जांगिड़ रोज़ स्टेशन आते हैं, व्यवस्था देखते हैं और हिसाब रखते हैं कि कितने टिकट बिके.

जांगिड़ कहते हैं,"जब स्टेशन शुरू हुआ तो पहले दिन 581 रुपए के टिकट बिके. अब हर माह इस छोटे से स्टेशन से 40 हज़ार रुपए के टिकटों की बिक्री हो रही है."

स्थानीय निवासी हाजी गफ़ूर कहते हैं,"हमने नेताओं का मुँह नहीं ताका. एकता में शक्ति है. इस शक्ति का गाँव ने सकारात्मक इस्तेमाल किया."

बलवंतपुरा में रहने वाली सुमित्रा अध्यापिका हैं. वो कहती हैं, "ये स्टेशन भारत में एक मिसाल है. गांववालों ने दिखा दिया कि समाज जब उठ खड़ा होता है तो मुश्किलें आसान हो जाती हैं."

 हमने नेताओं का मुँह नहीं ताका. एकता में शक्ति है. इस शक्ति का गाँव ने सकारात्मक इस्तेमाल किया
 
हाजी ग़फ़ूर, एक निवासी

गाँव के लोग अपने दम पर वहाँ परिंदों के लिए दाने-पानी की व्यवस्था करते हैं और साथ ही पेड़ों को भी पानी मुहैया कराते हैं.

हर गाड़ी में गार्ड ही टिकट विक्रेता की भूमिका निभाता है. उन्हीं में से एक बलबीर सिंह कहते हैं, "रेलवे इन ग्रामीणों का आभारी है. हमें इन गाँववालों को पुरस्कृत करना चाहिए."

भारत के कुछ भागों में रेलवे संपत्ति के नुक़सान की घटनाएँ सामने आती रही हैं.

लेकिन मरुस्थल के इस गांव ने भारतीय रेलवे के शिलालेख पर अपने सेवाभाव और संकल्प की ऐसी कहानी लिखी है जिसे कोई नहीं मिटा सकता.

 
 
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