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शुक्रवार, 11 जनवरी, 2008 को 16:59 GMT तक के समाचार
 
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ज़रूरत बस जज़्बे की होती है..
 

 
 
राकेश जैन
डॉ जैन ने कमलेश्वर के बहुचर्चित उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' को सबसे पहले 'ऑडियो बुक्स' में बदला था.
सच ही कहा गया है कि इंसान के अंदर अगर जज़्बा हो और तकनीक का साथ हो तो वह कुछ भी कर सकता है. ऐसा ही कुछ कर दिखाया है डॉक्टर राकेश जैन ने.

राकेश नेत्रहीन हैं और लखनऊ के एक डिग्री कॉलेज में प्राध्यापक हैं. उन्हें कंप्यूटर ज्ञान में महारथ हासिल है, उनके बनाये हुए सॉफ्टवेयर से ही कॉलेज में एडमिशन, वेतन बाँटने और एकाउंट का सारा काम होता है.

पर दिलचस्प बात ये है कि उन्होंने कंप्यूटर की कोई औपचारिक शिक्षा कभी नहीं ली है. अब आप सोच रहे होंगे की इसमें ख़ास बात क्या है ?

छह महीने की उम्र में ही राकेश की आंखों की रौशनी जाती रही लेकिन हौसले ने साथ न छोडा. ब्रेल भाषा से अपनी पढ़ाई की और अंगरेजी विषय में परास्नातक होने के बाद डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की.

फिर बग़ैर किसी आरक्षण के नौकरी पाई और आज वे रिहैबिलिटेशन सोसायटी ऑफ़ विजुअली इम्पैरेड (R.S.V.I) नामक संस्था के बैनर तले नेत्रहीनों के जीवन में उजाला भर रहे हैं.जिसकी स्थापना उन्होंने नवम्बर 2006 में की थी.

नेत्रहीनों के लिए वरदान

डॉक्टर जैन नेत्रहीनों के लिए ध्वनि पुस्तकों (ऑडियो बुक्स) का निर्माण करते हैं. पढ़ाई के दिनों में होने वाली दिक़्कतों को याद करते हुए वे कहते हैं कि ब्रेल भाषा में बहुत कम पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध थी. साहित्य और अन्य विषयों की बात बहुत दूर की थी.

कम्प्यूटर लैब
डॉ जैन के छोटे से स्टूडियो में दिन भर रिकार्डिंग होती रहती है.

इसी समस्या ने उन्हें प्रेरित किया. नेत्रहीनों को भी सामान्य लोगों की तरह पुस्तकों का फ़ायदा देने के लिए उन्होंने कंप्यूटर के माध्यम से सामान्य किताबों को ध्वनि पुस्तकों में बदलना शुरू किया.

सबसे पहले रिकॉर्ड होने वाली किताब थी प्रसिद्ध उपन्यासकार कमलेश्वर की “कितने पाकिस्तान”. अपनी संस्था आरएसवीआई के तहत अब तक वे 750 ध्वनि पुस्तकों की रिकार्डिंग कर चुकें हैं जिसमें लगभग 600 पाठ्य पुस्तकें हैं जो नवीं कक्षा से लेकर परास्नातक स्तर की हैं.

इसमें उत्तरप्रदेश बोर्ड के साथ राज्य के लगभग सारे विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम शामिल है. इन ध्वनि पुस्तकों की सीडी कोई भी नेत्रहीन व्यक्ति प्राप्त कर सकता है.लगभग 300 नेत्रहीन विद्यार्थी इन ध्वनि पुस्तकों से अपनी जिन्दगी में नयी रोशनी भर रहे हैं.

इन पाठ्य पुस्तकों की रिकार्डिंग के लिए उन्हें कोई सरकारी अनुदान नहीं मिला है. ये उनके ही प्रयत्नों का परिणाम है. हिन्दी साहित्य की पुस्तकों को रिकॉर्ड करने के लिए इंग्लैंड की संस्था रॉयल नेशनल इन्स्टीटयूट फॉर ब्लाइन्ड ने कुछ आर्थिक अनुदान दिया है.

पाकिस्तान से हाल ही में उनके पास उर्दू की कुछ ध्वनि पुस्तकों का अनुरोध आया है जिसे वे जल्दी हे भेजने वाले हैं.

इसमें पुस्तकों की रिकार्डिंग डेसी (डिजिटल एक्सेस इन्फोर्मेशन सिस्टम) माध्यम के सॉफ्टवेयर से होती है इस पद्धति की खास बात ये है कि कोई भी नेत्रहीन व्यक्ति किसी भी ध्वनि पुस्तक पेज नम्बर शीर्षक उपशीर्षक पैराग्राफ के माध्यम से चुनकर पढ़ सकता है.

'स्पर्श' फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह और शबाना आज़मी के साथ एक छोटी सी भूमिका करने वाले इस शख्स को ज़िन्दग़ी से कोई भी शिकायत नहीं है. वे कहते हैं कि एक रास्ता बंद होता है तो दस नए दरवाज़े खुल जाते हैं.

 
 
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