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शनिवार, 24 मई, 2008 को 22:52 GMT तक के समाचार
 
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नज़रें लगी हुई हैं कर्नाटक के नतीजों पर
 

 
 
कर्नाटक विधानसभा
पिछली बार त्रिशंकु विधानसभा होने के कारण राजनीतिक अस्थिरता बनी रही
कर्नाटक में तीन चरणों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम रविवार को आने वाले हैं.

कई राज्यों में होने वाले चुनावों के पहले और लोकसभा के चुनावी साल में आने वाले इस परिणाम का इंतज़ार सभी को है.

चुनाव मतगणना सुबह आठ बजे शुरू होगी और उम्मीद है कि कुछ ही घंटों में नतीजे घोषित कर दिए जाएँगे.

224 विधानसभा क्षेत्रों के लिए दो हज़ार से ज़्यादा उम्मीदवारों ने अपना भाग्य आज़माया है.

जहां कांग्रेस ने 222 जगहों से पर्चे भरे थे, भाजपा उम्मीदवारों ने सभी 224 सीटों के लिए और जेडीएस ने 219 जगहों से अपने पर्चे दाखिल किए थे.

कहना ना होगा कि कर्नाटक की राजनीति के तीनों महत्वपूर्ण ध्रुव, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर), तीनों ही के लिए यह परिणाम बेहद महत्वपूर्ण हैं.

समीकरण

भाजपा के लिए कर्नाटक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहीं से उसे दक्षिण भारत में अपना परचम लहराता हुआ दिख रहा है.

कांग्रेस प्रदेश में वापसी की कोशिश में है. लेकिन सभी की निगाहें जनता दल (सेक्युलर) पर हैं.

कुमारस्वामी और येदुरप्पा
भाजपा ने ख़ूब प्रचार किया कि जेडीएस ने धोखा दिया

कयास लगाए जा रहे हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा के पास अगर तीस के आसपास सीटें आ जाएँ तो वो फिर किंगमेकर की भूमिका निभा सकते हैं.

याद रहे कि 2004 विधानसभा के चुनाव में जहां भाजपा 79 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, सत्ता की चाभी जेडीएस के हाथ थी जिसे 58 सीटें मिली थीं.

जेडीएस ने पहले कांग्रेस से हाथ मिलाया और बाद में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई. दोनों ही पार्टियों के बीच हुए समझौते के मुताबिक़ जेडीएस नेता और देवगौड़ा के पुत्र कुमारस्वामी को एक निश्चित समय के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी भाजपा के येदुरप्पा के लिए खाली करनी थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और सत्ता की इस लड़ाई में किसी का भी भला नहीं हो सका.

जेडीएस प्रवक्ता दानिश अली ने बीबीसी से कहा कि जनता उन्हें इस बार और ज़्यादा सीटों से साथ विधानसभा वापस भेजेगी. उन्होंने इशारे दिए कि उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ हाथ मिला सकती है.

तो क्या कांग्रेस और जेडीएस के बीच किसी कथित समझौते की बात सही है, इस सवाल का जवाब भी कुछ दिनों के बाद मिल जाएगा.

जेडीएस नेता देवगौड़ा भी कहते रहे हैं कि प्रदेश में कोई भी सरकार बिना उनके सहयोग के नहीं बन सकती.

यह चुनाव किस तरफ़ जा सकते हैं, इस पर कयास लगाए जा रहे हैं.

विभिन्न एक्ज़िट पोल का हवाला लें तो भी साफ़ तस्वीर उभरकर नहीं आती.

ज़्यादातर ने त्रिशंकु विधानसभा की बात कही है. प्रेक्षक इसके लिए अलग-अलग कारणों को ज़िम्मेदार मानते हैं.

अपने-अपने हथियार

भाजपा ने येदुरप्पा के साथ हुए जेडीएस की कथित धोखेबाज़ी को अपना हथियार बनाया लेकिन कांग्रेस की इस बात पर आलोचना होती रही कि विभिन्न गुटों में बँटी पार्टी कभी भी भाजपा और जेडीएस के बीच चले सत्ता संघर्ष जैसे मज़बूत मुद्दे को जनता के समक्ष नहीं ले जा पाई.

एसएम कृष्णा
राजभवन छोड़कर सक्रिय राजनीति में लौटे कृष्णा को बहुत उम्मीदें हैं

उधर जेडीएस के लिए स्थिति बहुत ख़ुशनुमा नहीं है. जहां भाजपा और उसके बीच चले सत्ता संघर्ष ने उसे नुक़सान पहुँचाया, माना जा रहा है कि भाजपा के साथ उसके गठबंधन ने मुसलमानों को जेडीएस से दूर कर दिया है और पार्टी को इसका खा़मियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.

हाल ही में जेडीएस के कई बड़े नेताओं ने कांग्रेस की ओर रुख किया है.

इनमें एमपी प्रकाश और सीतारमैया जैसे नाम शामिल हैं. इन नेताओं के आने से कांग्रेस को कितना फ़ायदा होगा, क्या ये नेता अपने समर्थकों का वोट कांग्रेस को दिलवा पाने में सफ़ल हो पाए, ये तो कुछ घंटो में ही साफ़ हो जाएगा.

इस बात पर भी बहस जारी है कि क्या कांग्रेस के किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने से उसे फ़ायदा पहुँचा होता.

अगर बात करें मुख्य उम्मीदवारों पर जिनपर सबकी निगाहें रहेंगी वह हैं भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बीएस येदुरप्पा जो समाजवादी पार्टी के बंगारप्पा से भिड़ रहे हैं.

कुमारास्वामी, मल्लिकार्जुन खाड़गे, धरम सिंह जैसे उम्मीदवारों पर भी सबकी नज़र रहेगी.

 
 
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