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सोमवार, 01 सितंबर, 2008 को 13:59 GMT तक के समाचार

रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

धर्मांतरण के सवाल पर जारी है रस्साकशी

विश्व हिंदू परिषद के स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की 23 अगस्त की शाम कंधमाल के जलास्पोता आश्रम में हत्या कर दी गई. उनकी हत्या के बाद शुरू हुआ हिंसा और तनाव का माहौल अभी तक सामान्य स्थिति में नहीं लौटा है.

पर उड़ीसा में ये हिंसा पहली बार नही हुई है. दिसंबर 2007 में भी सांप्रदायिक हिंसा राज्य के लोगों ने देखी थी और वर्ष 1999 में ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो पुत्रों की हत्या को अभी तक कौन भूल पाया है.

स्वामीजी पर सात बार हमला हो चुका था, इस बार हमलावर कामयाब हो गए. इसके साथ आरोप प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो गया.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राम माधव कहते हैं, "स्वामीजी वहाँ पर बड़े पैमाने पर सामाजिक सेवा का कार्य चलाते थे. आदिवासी लड़कियों के लिए वे हॉस्टल चलाते थे. स्कूल चलाते थे. उनके इस काम को मिशनरी लोग अपने धर्मांतरण के काम में बाधा के रुप में देखते थे. उन पर कई बार हत्या के प्रयास किए गए थे. हम मानते हैं कि इस हत्या के पीछे ईसाई संगठन से जुड़े लोगों का हाथ है."

इस आरोप को ईसाई संगठन सिरे से खारिज करते है. उड़ीसा अल्पसंख्यक फ्रंट के स्वरुप पात्रो स्वयं ईसाई हैं और ऐसे आरोपों से क्षुब्ध भी.

वे कहते हैं, "मैं इन आरोपों का खंडन करता हूँ. सच तो यह है कि 23 तारीख़ के बाद से हम सोए नहीं है."

उड़ीसा के आर्चबिशप रफ़ाएल चीनथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हाल ही में मिले. प्रधानमंत्री के सामने जो उन्होंने अपनी माँगे रखी उसे उन्होने यूँ गिनाया- "हम चाहते हैं की ईसाइयों पर हो रहे हमले तुंरत रोके जाए. जो हज़ारों ईसाई अपनी घरों को छोड़ जंगलों में शरणार्थी बनने पर मजबूर हुए है उन्हें वापस लाया जाए. ईसाइयों पर लग रहे आरोपों पर विराम लगाने के लिए सीबीआई जाँच की घोषणा की जाए."

जो बाते उन्होंने रखी वह राज्य सरकार के प्रति अविश्वास और वहां व्याप्त भय के माहौल को इंगित करती हैं.

'हिंसा में हाथ नहीं'

संघ परिवार का तर्क है की ईसाई धर्मांतरण करवा रहे हैं जिसका विरोध हो रहा है और संघ परिवार के किसी भी संगठन का हिंसा में हाथ नहीं है.

राम माधव कहते हैं, "इसमें हमारे संगठनों का कोई हाथ नहीं है. स्वामीजी इतने प्रतिष्ठित थे कि स्वाभाविक रूप से उनकी हत्या के बाद लोगों में कुछ नाराजगी प्रकट हुई. इसे शांत करने के लिए सरकार तुरंत दोषियों को पकड़े और उसे दंडित करे."

पर क्षेत्र में कर्फ्यू लगा है. हिंसा, तनाव की ख़बरें आ रही है. पोप ने चिंतित हो हिंसा की निंदा की तो दुःख भी व्यक्त किया.

पोप का कहना है, "मैं जहाँ हर हमले की निंदा करता हूँ वहाँ मैं ईसाई भाइयों के साथ इस संकट की घड़ी में शामिल हूँ जिन पर इस हिंसा का भारी प्रभाव पड़ा है."

इटली की सरकार ने भारत के राजदूत को बुला कर विरोध व्यक्त करने का मन बनाया तो कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी चिंता व्यक्त की है. विरोध स्वरुप ईसाई संगठनों ने अपने स्कूलों को बंद करवाया है.

लेकिन सांप्रदायिक हिंसा बार-बार उडी़सा में क्यों फैल रही है. ये प्रश्न भी उठ रहा है.

संघ परिवार दुनिया भर में उठ रहे शोर को ईसाई धर्म प्रचारकों की रणनीति का हिस्सा मानते हैं.

राम माधव कहते हैं, "अपने पीड़ित होने का प्रचार करना ईसाईयों की हमेशा की आदत है. प्रचार तंत्र का दुरुपयोग ईसाई मिशनरी करते हैं. वास्तव में वे ही इस समय गाँवों में हो रही हिंसा में लिप्त हैं."

पर आख़िर क्यों उड़ीसा धर्म का अखाड़ा बन गया है. पर क्या वाकई ये धर्म की लडा़ई है या कुछ और..?

इतिहासकार और इस क्षेत्र के जानकार बिश्वमोयपति कहते हैं कि यह लडा़ई यहाँ के कंध लोगों की है जो कि आदिवासी हैं, और पाणा कि है जो अनुसूचित जाति के है. दोनों पीड़ित हैं. यह लड़ाई आरक्षण के फायदों के लिए है.

कानूनी तौर पर अनुसूचित जाति के लोग जो धर्म परिवर्तन कर लेते है उन्हें आरक्षण के फायदे नहीं मिलते. पर अब कंधमाल के पाणा की मांग है कि चूँकि वो भी कंध लोगों की तरह कुई भाषा बोलते है उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए.

जामिया मिलिया इस्लामिया के समाजशास्त्र और मीडिया के प्रोफ़ेसर विश्वजीत दास कहते हैं, "आदिवासियों में धर्म परिवर्तन बहुत पहले से चला आ रहा है यह कोई नई बात नहीं है. आदिवासियों को हिंदू धर्म में शामिल करने का मामला पुराना है. साथ ही कंध और पाणा के बीच पारंपरिक रुप से संघर्ष का रिश्ता रहा है."

धर्मांतरण पर प्रतिस्पर्धा

बिश्वमोयपति का मानना है की लडा़ई धर्म के प्रचार को ले कर है. धर्मांतरण पर प्रतिस्पर्धा का ये नतीजा है कि यहाँ हिंसा हो रही है.

वे कहते हैं, "वहाँ पर धर्मातंरण की प्रतियोगिता चल रही है. संघ परिवार और मिशनरी दोनों ही इसमें शामिल हैं."

अगर ऐसा है तो ये कब तक चलेगा. कब तक निर्दोष लोग मारे जाएँगे. उड़ीसा के आर्चबिशप को इसमे चुनावी राजनीति की छाप नज़र आती है.

रफायल चीनथ कहते हैं, "संघ परिवार का एजेंडा एक हिंदू राष्ट्र स्थापित करना है. जब भी चुनाव का समय आता है, हिंदुत्व की बात उठती है. उनके हिंदू राष्ट्र की स्थापना के सपने की राह में अल्पसंख्यक आते हैं इसलिए उन्हें रास्ते से हटाने की कोशिश होती है. उड़ीसा से उसी के तहत ईसाइयों को हटाने की कोशिश हो रही है."

समाजशास्त्री बिश्वजीत दास और इतिहासकार बिश्वमोयपति दोनों ही का कहना है संघ परिवार ने उड़ीसा को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बना दिया है और ये प्रयोग चलता रहेगा.

बिश्वजीत दास कहते हैं, "सबसे दुख और आश्चर्य की बात है कि इसमें राज्य सरकार की पूरी विफलता है. उड़ीसा दूसरा गुजरात बनते जा रहा है."

पर उड़ीसा का दुर्भाग्य ये है की यहाँ न राजनीति में ऐसी कोई ताक़त है जो मौजूदा समीकरण को चुनौती दे सके और न ही सभ्य समाज जो आवाज़ उठा सके.

ऐसे में जब तक धर्म और राजनीति का ख़तरनाक खेल समाज के ठेकेदार खेलते रहेंगे, जनता आतंक का सामना करती रहेगी.