किसानों की कब्रगाह में बदलता पंजाब

हरित क्रांति के जनक से 16000 किसानों की कब्रगाह में कैसे तब्दील हुआ पंजाब?

मुख्तियार

उस आख़िरी शाम जब मेरा बेटा घर आया था, तब वो भी इस आसमान को ही देख रहा था "

मुख्तियार सिंह सर उठाकर पंजाब के आसमान को टकटकी बांधे देखते हैं. उनकी 75 साल पुरानी बूढ़ी आंखें यहां बरनाला ज़िले में पड़ने वाली गर्मियों की तेज़ धूप से टकराकर अचानक चुंधिया सी जाती हैं.

लेकिन वो फिर सर उठाकर आसमान को देखते हैं. इस बार आंखों में पानी लिए. तभी अचानक उनकी सांस तेज़ हो जाती है और हरी पगड़ी के नीचे जमा पसीने की बूंदे पूरे चेहरे को भिगोने लगती हैं.

वह हांफते हुए कहते हैं, "उस आख़िरी शाम जब मेरा बेटा घर आया था, तब वो भी इस आसमान को ही देख रहा था. उसकी माँ ने चाय-पानी पूछा तो बोला नहीं पीऊँगा. उसकी माँ को कुछ अजीब लगा तो उसने पैसे का पूछा. बेटे ने कहा मुझे क्या करना पैसों का?”

ऊपर आसमान में पंछी गोल गोल चक्कर लगा रहे हैं. मैं ये उड़ते पंछी ही देख रहा हूँ..."

उस शाम मुख्तियार का बेटा गुरलाल जैसे नींद में चलते हुए घर लौटा था. फ़रवरी की ठंड में भी उसे पसीने आ रहे थे और वो बस अपना सर उठाए आसमान को देखे जा रहा था.

उसकी माँ ने पूछा, आसमान में क्या देख रहा है. जवाब में बेटे ने कहा, ‘ऊपर आसमान में पंछी गोल गोल चक्कर लगा रहे हैं. मैं ये उड़ते पंछी ही देख रहा हूँ’. बस इतना कहकर वो गश खाकर ज़मीन पर गिर पड़ा. उसके मुँह से झाग निकलने लगा.

हमने तुरंत उसे उठाकर खटिया पर लिटा दिया. तब हमें मालूम नहीं था कि वो स्प्रे (कीटनाशक) पीकर आया था. इसलिए हमने सोचा उसे कोई दौरा पड़ा है. पर इससे पहले कि हम उसे इलाज के लिए ले जा पाते, वो चला गया.

"जिसका 25 साल का गबरू बेटा
उसके आँखों के सामने आत्महत्या कर ले,
वो मां - बाप तो जीते जी मर चुके समझो"

मुख्तियार बरनाला जिले के बदरा गांव में रहने वाले किसान हैं. उनके बेटे की ही तरह उनके गांव में अब तक 70 किसान बढ़ते कर्ज़ के चलते ख़ुदकुशी कर चुके हैं. बेटे की मौत के वक़्त मुख्तियार के परिवार पर भी 5 लाख रुपए का कर्ज़ था जो उन्होंने अपनी 2 बेटियों की शादी और खेती से जुड़े ख़र्चे पूरे करने के लिए लिया था.

लेनदार घर आकर पैसे मांगते और पैसे न दे पाने की वजह से गुरलाल परेशान रहते. पर घर में सबको हिम्मत बंधाने वाले इस बेटे ने किसी को अंदाज़ा नहीं होने दिया की वह अंदर ही अंदर टूट रहे थे.

मुझे देखते ही गुरलाल की बूढ़ी माँ रोने लगती हैं. बेटे से हुई आख़िरी बातचीत उनके ज़हन में अब भी ताज़ा है. पूछने पर सिर्फ़ गुरु गोविंद सिंह के छोटे साहेबजादों (गुरु गोविंद सिंह के बच्चों) के साथ लगी अपने बेटे की बचपन की तस्वीर दिखाती हैं.

उनके ख़ामोश आंसुओं की गूंज जैसे दोपहर के सन्नाटे को चीरते हुए उसी आसमान तक जाती थी, जिसको देखते हुए उनका बेटा चला गया था.

भारतीय सिनेमा में सालों से परोसी जा रही सरसों के खेतों, दूध की नदियों और नाचते गाते पंजाब के ख़ुशहाल किसानों वाली छवि के पीछे छिपी असली ज़मीनी कहानी मेरे लिए अभी शुरू ही हुई थी.

दिल्ली से शुरू हुई यात्रा जैसे ही दक्षिण पंजाब में दाख़िल होती है, आंकड़ो में खींची गई उदासीन तस्वीर आसपास ज़िंदा होने लगी. धूल की एक मोटी जर्द परत में डूबे बरनाला, संगररूर और मनसा ज़िलों के गांव किसी गहरी उदासी में डूबे थे.

साठ के दशक में हरित क्रांति के महनायकों के तौर पर उभरा पंजाब आज किसानों की क़ब्रगाह में क्यों तब्दील हो चुका है? ख़ुशहाली और समृद्धि के प्रतीक के तौर पर पहचाने जाने वाले इस राज्य में आज मौत का सन्नाटा क्यों पसरा पड़ा है? इन सब सवालों के जवाब ढूँढते हुए हम बरनाला ज़िले के भूटना गांव में रहने वाली 47 वर्षीय हरपाल कौर के घर पहुंचे.

हरपाल

मेरे पति ने सारी ज़िंदगी जी तोड़ मेहनत की. दिसंबर की ठंड में भी जानवरों की रखवाली के लिए उन्हें खेतों पर जाना पड़ता था. पर हमारी क़िस्मत जैसे पहले ही तय हो चुकी थी.”

हरपाल के घर की दीवारों की तरह ही उनकी ज़िंदगी में भी कोई नहीं रंग था. बीती तीन पुश्तों में उनके घर के चार लोग आत्महत्या कर चुके हैं. इस फ़ेहरिस्त में सबसे नया नाम हरपाल के पति 50 वर्षीय भगवान सिंह का है जिन्होंने इसी जनवरी में ख़ुदकुशी कर ली. इससे पहले भगवान के पिता, उनके दादा और चाचा ने भी बढ़ते क़र्ज़ और घटती आमदनी के चलते आत्महत्या कर ली थी.

साल दर साल परिवार पर बीती त्रासदियों की छाप घर के माहौल में साफ़ महसूस की जा सकती थी. स्लेटी रंग के सलवार क़मीज़ पर काले रंग का दुपट्टा ओढ़े खड़ी हरपाल के व्यक्तित्व में दुख इस तरह घुल मिल गया था जैसे उनके शरीर का कोई हिस्सा हो. देर तक ख़ामोश रहने के बाद हरपाल ने बातचीत शुरू की.

“हमारे पास एक एकड़ से भी कम ज़मीन है. इस ज़मीन पर सिर्फ़ जानवरों के लिए चारा उग पाता है. खेती के लिए हमें ज़मीन किराए पर लेनी पड़ती है. पिछले साल भी हमने 15 एकड़ ज़मीन ठेके पर लेकर खेती की थी. सारी फ़सल तैयार खड़ी थी कि साल के आख़िर में ओले पड़ गए. हमारी खड़ी फ़सल बर्बाद हो गयी.

मेरे पति को वैसे भी ब्लड प्रेशर था. वो फ़सल ख़राब होने की टेंशन ले गए. परेशान रहने लगे. अक्सर रोते रहते और मुझसे कहते कि अब वो अकेले हो गए हैं. पहले से ही हमारे सर पर 8 लाख का क़र्ज़ था, उसपर भी फ़सल ख़राब हो गई तो हालात क़ाबू के बाहर हो गए”.

हरपाल बताती हैं कि उनके और उनके पति के लिए इस मुश्किल जीवन की पृष्ठभूमि उनकी शादी से पहले ही तैयार हो चुकी थी. उनके शादीशुदा जीवन की सबसे पुरानी यादें भी क़र्ज़ से आज़ाद नहीं हैं. वह जोड़ती हैं, “मेरे पति ने सारी ज़िंदगी जी तोड़ मेहनत की. ख़ुद फ़सल की रोपाई करते, फिर सिंचाई और देखभाल भी. दिसंबर की ठंड में भी जानवरों की रखवाली के लिए उन्हें खेतों पर जाना पड़ता था. पर हमारी क़िस्मत जैसे पहले ही तय हो चुकी थी.”

हरपाल का परिवार क़र्ज़ के एक ऐसे दुश्चक्र में फँस गया था जो पीढ़ी दर पीढ़ी घर के सदस्यों को निगलता जा रहा था.

"उन्होंने भैसों के गले में बांधी जाने वाली
रस्सी से ख़ुद को फाँसी लगाई थी."

मैं उठकर पशुओं का दूध निकालने की तैयारी करने लगी. तभी मेरी बेटी उठी और उसने सबसे पहले अपने पिता को फाँसी पर लटका हुआ देखा

“पहले दादा ने ख़ुदकुशी की फिर उनका क़र्ज़ न उतार पाने की वजह से मेरे ससुर ने आत्महत्या कर ली. उन्होंने भैसों के गले में बांधी जाने वाली रस्सी से ख़ुद को फाँसी लगाई थी. इसी तरह बढ़ते क़र्ज़ के चलते मेरे ससुर के भाई ने भी स्प्रे पीकर ख़ुदकुशी कर ली. अब इन सबके जाने के बाद घर में जो लड़कियाँ बचीं थीं, उनकी शादी की ज़िम्मेदारी मेरे पति पर ही आ गई.

उन्होंने चाचा की बेटियों और अपनी बहनों तक सबकी शादियाँ करवाईं, लेकिन जब अपने बच्चों की बारी आई तो उनके पास कुछ नहीं बचा था. वो रोते और मुझसे कहते थे कि सब उनके सर कर्ज़ा डाल कर उन्हें अकेला छोड़ कर चले गए.”

घर में हुई तीन आत्महत्याओं के बाद हरपाल को शक तो था कि उनके पति ऐसा कुछ कर सकते हैं. इसलिए वो पति को अकेला नहीं छोड़ती थीं.

लेकिन 15 जनवरी 2018 की रात भगवान सिंह रोज़ की तरह जानवरों से खेत की रखवाली करने के लिए घर से निकले. पत्नी ने उन्हें रात का खाना साथ में बाँध कर दे दिया था. पर सबके सो जाने के बाद बीच रात भगवान वापस घर लौटे. घर के एक कमरे में उनकी पत्नी और बच्चे सो रहे थे. ठीक उसके बाज़ू वाले कमरे में उन्होंने ख़ुद को फाँसी लगा ली. अगले दिन सारी दुनिया के लिए सुबह हुई पर हरपाल के जीवन में ये रात इतनी जल्दी ख़त्म होने वाली नहीं थी.

घर के एक कमरे में उनकी पत्नी और बच्चे सो रहे थे.
ठीक उसके बाज़ू वाले कमरे में उन्होंने खुद को फांसी लगा ली.

फिर मेरे बेटे ने देखा और वो भी चीख़ने लगा. रोना पीटना मच गया. हमने इनकी बॉडी को नीचे उतारा और रिश्तेदारों को बुलाया. मेरे बेटा पिता को अस्पताल ले जाना चाहता था पर सबने कहा अब उनमें कुछ नहीं बचा है”.

सबको लगता है इस घर में मौतों का डेरा है. अब तो मुझे भी लगने लगा है कि हमारे घर में ही कुछ ग़लत होगा.

हरपाल को सरकार से किसी भी तरह का मुआवज़ा नहीं मिला है. पति की मौत के बाद अब हरपाल के लिए ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो गई है. क़र्ज़, बेटे की पढ़ाई और बेटी की शादी– तीन पहाड़ जैसी मुश्किलें हर रोज़ उनका पीछा करती हैं.

वह कहती हैं, “पशुओं का दूध बेचकर किसी तरह रोटी का इंतज़ाम करती हूं पर बाक़ी सब ठप पड़ा है. पिता की मौत के बाद मेरा बेटा पहली बार परीक्षाओं में फ़ेल हुआ. बेटी की शादी के लिए रिश्ते नहीं मिल रहे हैं. कोई हमारे यहाँ शादी ही नहीं करना चाहता. सबको लगता है इस घर में मौतों का डेरा है. अब तो मुझे भी लगने लगा है कि हमारे घर में ही कुछ ग़लत होगा. अपने रिश्तेदार भी घर आने से कतराते हैं. उनके बिना कहीं आने जाने के लिए भी पड़ोसियों की मोहताज हो गई हूँ. आगे क्या होगा कुछ समझ नहीं आता”.

त्रासदी की गवाही देते आंकड़े

जिस पंजाब को ज़्यादातर उत्तर भारतीय जनमानस हरित क्रांति, समृद्धि, भांगड़ा और ख़ुशहाल किसानों से जोड़ता हैं, वहां की ज़मीनी सच्चाई आज मुख्तियार जैसे किसानों की कहानियों से भरी पड़ी है.

पंजाब सरकार की ओर से राज्य के तीन विश्वविद्यालयों की मदद से कराए गए पहले आधिकारी ‘डोर-टू-डोर’ सर्वे के मुताबिक़ पंजाब में वर्ष 2000 और 2015 के बीच 16,606 किसानों ने आत्महत्या कर ली.

इन 16,606 किसानों में कुल 87 प्रतिशत मामलों में किसानों ने खेती से जुड़े ख़र्चों के लिए कर्ज़ लिया था और फिर उसे चुका न पाने की वजह से उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली.

सरकारी आंकड़ो से बनी पंजाब की यह भयावय तस्वीर अभी पूरी नहीं होती. आगे यह भी जानिए कि अपनी जान ख़ुद लेने वाले इन किसानों में 76 प्रतिशत छोटे किसान हैं जिनके पास 5 एकड़ से भी कम ज़मीनें हैं.

बलदेव कौर

मनसा ज़िले के भीमकालं गांव में हमारी मुलाक़ात एक ऐसे ही खेतिहर मज़दूर परिवार से होती है. इस परिवार की मुखिया हैं 50 वर्षीय बलदेव कौर.

बलदेव यूं तो पढ़ी लिखी नहीं हैं लेकिन पहले पति और फिर जवान बेटे की आत्महत्याओं ने उन्हें कवि बना दिया. उन्होंने अपना दुख पड़ोसियों को गाकर सुनाना शुरू किया और धीरे धीरे अपनों की मौत पर गीत बना लिए. आज उनके गीत ज़िले में किसानों के हक़ के लिए होने वाले विरोध प्रदर्शनों के ‘ऐन्थम सांग’ में बदल गए हैं.

अपनी भारी आवाज़ में सुर लगाकर ‘ख़ुदकुशियों दे राहें जित्ते प्यो दे पुत चले’ (ख़ुदकुशी की राह पर जिसके पति और बच्चे चले) गाती हुई बलदेव उदासी के साथ साथ संघर्ष की भी ज़िंदा तस्वीर लगती हैं.

“हम खेतिहर मज़दूर हैं. हमारे पास अपनी कोई ज़मीन नहीं. इसलिए मेरे पति सिर्फ़ 8000 रुपए साल पर ज़मीनदारों के खेत में मज़दूरी किया करते थे. हम पर कर्ज़ा था और क़र्ज़ न उतार पाने की सूरत में मेरे पति ने घर बेच देने का भी क़रार किया हुआ था. हम कर्ज़ चुका नहीं पाए और मेरे पति ने स्प्रे पीकर आत्महत्या कर ली.

मरने से पहले वो बहुत छटपटाए थे. फिर मैंने मज़दूरी करके अपने बच्चों को बड़ा किया. हमारे पास घर भी नहीं था. बारिश में मेरी झोपड़ी से पानी टपकने लगता और मैं बच्चों को एक कोने में लिए पड़ी रहती.

मैंने कर्ज़ा उतारने के लिए लोगों के खेतों और घरों में सब जगह काम किया. रोना आता पर गोबर तक साफ़ किया मैंने. लेकिन फिर भी कर्ज़ा न उतरा”.

कर्ज़ उतारने के लिए बलदेव का बेटा कुलविंदर 15 साल की उम्र से ही लेनदार ज़मीनदारों के यहां काम करने लगा.

मज़दूरी करते-करते ही 21 साल की उम्र में उनकी शादी करवा दी गई. उनका पहला बेटा सिर्फ़ 4 महीने का था जब कुलविंदर ने कीटनाशक पी कर ख़ुदकुशी कर ली. बलदेव के परिवार को दो आत्महत्याओं के बाद भी कोई मुआवज़ा नहीं मिला.

गाते गाते बलदेव का गला रुंध जाता है. दुपट्टे से आंसू पोछते हुए वो कहती हैं, “मुझे डर था इसलिए मैंने बेटे को नहीं बताया था कि हम पर कितना कर्ज़ है. पर वो बार-बार पूछता.

कहता माँ सच बता हम पर कितना कर्ज़ा है. फिर एक दिन उसे पता चल गया और उसने कहा कि हम कभी इतना कर्ज़ नहीं चुका पाएँगे. मैं चाहे कितनी भी हिम्मत बँधाती, पर वो अंदर से टूट चुका था.”

अदालत की गुहार

2015 में पंजाब सरकार ने किसान आत्महत्याओं के लिए एक नई ‘मुआवज़ा और राहत नीति’ को लागू किया. 2001 से पाँचवी बार बदली गयी इस नीति के तहत अब किसान आत्महत्याओं के सभी मामलों में पीड़ित परिवार को 3 लाख रुपए दिए जाने का प्रवधान है.

साथ ही किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के मद्देनज़र पंजाब सरकार ने दो कमेटियों का गठन किया है. सुखबिंदर सिंह सरकारिया की अध्यक्षता में ग्रामीण आत्महत्याओं के लिए बनी ‘विधान सभा कमेटी’ और टी हक़ की अध्यक्षता में बनी ‘ऋण छूट समिति’. इन कमेटियों ने ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ बढ़ाने से लेकर ‘ऋण छूट’ तक पर किसानों के पक्ष में अपनी सिफ़ारिशें तो दे दीं हैं लेकिन उन पर ज़मीनी कार्रवाई अब तक शुरू नहीं हुई है.

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर सुखपाल सिंह लंबे समय से पंजाब में बढ़ते कृषि संकट पर काम कर रहे हैं. वे राज्य सरकार की ओर से कराए गए ‘डोर टू डोर’ सर्वे के समन्वयक भी रहे हैं. बीबीसी से एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि किसानी में चल रही ‘व्यापार की शर्तें’ किसानों के पक्ष में नहीं जा रहीं.

“बीजों से लेकर खाद, पानी और कीटनाशकों तक पर होने वाले ख़र्च बढ़ते जा रहे हैं और किसान की आमदनी उस हिसाब से बढ़ नहीं रही. यह बढ़ते क़र्ज़ और आत्महत्याओं के पीछे एक बड़ी वजह है. हालात ये है कि पहले जहां पंजाब की कुल कामगार जनसंख्या में से 63 प्रतिशत लोग किसानी थे, वहीं आज राज्य के सिर्फ़ 35 प्रतिशत लोग ही खेती कर रहे हैं.इस 35 प्रतिशत में भी सिर्फ़ 20 प्रतिशत किसान हैं, बाक़ी खेतिहर मज़दूर”.

गुरतेज दास

आगे बरनाला ज़िले के ही बदरा गांव में हमारी मुलाक़ात गुरतेज दास से होती है. 45 वर्षीय गुरतेज के घर में कोई महिला नहीं हैं.

गांव की मुख्य सड़क पर बने एक बदरंग धूल भरे घर में रहने वाले इस हिंदू किसान परिवार के पास सिर्फ़ एक एकड़ ज़मीन है. एक दशक पहले यह परिवार ज़मीन किराए पर लेकर खेती करता था. लेकिन जिस दिन गुरतेज के बड़े भाई निर्मल दास ने क़र्ज़ के कारण आत्महत्या की, उसी दिन यह परिवार बिखर गया.

गुरतेज ने अपना जीवन बड़े भाई के बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करने में लगा दिया. निर्मल के जाने के बाद गांव वालों ने बच्चों की माँ और बड़े भाई की पत्नी सरबजीत कौर से उनका विवाह भी करवा दिया था.

पर सरबजीत उनको और अपने बच्चों को छोड़ कर चली गईं. बिन माँ के बच्चों को बड़ा करना गुरतेज के लिए एक ऐसी चुनौती थी जिसका सामना करने के लिए न तो वह मानसिक तौर पर तैयार थे और न ही आर्थिक.

अपनी धूल भरी रसोई में चाय बानते हुए वह कहते हैं, “जब बच्चों की माँ गई तब छोटा वाला सिर्फ़ 6 साल का था. रातों को उठकर रोता था. अक्सर बीमार पड़ जाता. मुझसे जैसे बनता मैं वैसे खाना बनाकर बच्चों को खिलाता और उनकी देखभाल करता. उनको नहलाता, कपड़े पहनाता और सारे काम करता. फिर मज़दूरी करने जाता और वापस आकर उन्हें खाना बनाकर खिलाता.”

गुरतेज के दोनो बेटे अब बड़े हो रहे हैं. पर वो न तो ख़ुद खेती में लौटना चाहते हैं और न ही बच्चों को किसान बनाना चाहते हैं. वह कहते हैं, “जितनी खेती मैंने की है उससे मुझे यही लगा की किसानी में न ही पड़ें तो अच्छा.

खेती से तो अच्छा है कि बच्चे कोई दुकान खोल लें या मज़दूरी कर लें या किसी फ़ैक्टरी में लग जाएं. खेती में आमदनी होती नहीं, किसान के ख़र्चे बढ़ते जा रहे हैं. इसलिए जब कोई रास्ता नहीं दिखता तो वह सुसाइड कर लेता है. खेती में कुछ नहीं मिलना, उल्टा जान ज़रूर जानी है.”

नमृत पाल

माँ ,मेरा मरने को जी करता है

बदरा गांव से विदा लेते हुए ही हमें पड़ोस के संगरूर जिले के खोखर खुर्द गांव में एक 23 साल के किसान की आत्महत्या की ख़बर मिली.

कर्ज़ और बैंक के नोटिसों ने परेशान नमृत पाल ने 14 जून 2018 की रात रेल की पटरी पर लेटकर आत्महत्या कर ली. पीछे दो छोटे बच्चे, पत्नी और बूढ़े माँ-बाप को छोड़ गए नमृत अक्सर उदास रहते और अपनी माँ से कहते, ‘माँ मेरा मरने को जी करता है’. अपनी शादी की तस्वीर में नमृत किसी नौजवान रंगरूट की तरह लगते हैं. अपने पिता के मातम में मासूमियत से चिप्स खाते उनके बच्चे, उनको ‘लाड़ी-लाड़ी’ कहकर पुकारती उनकी पत्नी और दहाड़ें मार मार कर रोती उनकी माँ गुरमीत कौर को देखकर पंजाब की एक स्याह तस्वीर मेरे सीने में धंस गई.

आगे पंजाब छोड़ते हुए हमारी मुलाक़ात ‘भारतीय किसान यूनियन एकता-उगराहन’ नामक स्थानीय किसान संगठन के बैनर तले एक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे किसानों से हुई. पीले झंडे लिए जत्थों में चलते हुए ये किसान सरकार की ओर से धान की रोपाई की तय तारीख़ के ख़िलाफ़ अपना विरोध जताने बरनाला शहर जा रहे थे.

'आत्महत्या नहीं, संघर्ष करो'

मैंने वहां खड़े किसानों से बातचीत में पूछा कि हरित क्रांति की इस धरती पर आज इतने किसान ख़ुदकुशी क्यों कर रहे हैं.

तभी अपने संगठन का झंडा हाथ में पकड़े एक बुज़ुर्ग किसान ने अपना नाम बारह सिंह बताते हुए कहा, “हरित क्रांति से सिर्फ़ बीज कंपनियों, पेस्टीसाइड कंपनियों और ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनियों का फ़ायदा हुआ है. हमें महंगे बीज, महंगी खाद बेच गए कंपनी वाले. बड़े ट्रैक्टरों बेच के मुनाफ़ा कमा गई कंपनियां. हमें क्या मिला? सिर्फ़ इन सामनों को ख़रीदने के लिए लिया गया कर्ज़ा.

कभी कीड़ों से तो कभी ओलों से फ़सल ख़राब हो जाती है. सरकार की तरफ़ से कोई मुआवज़ा या लोन माफ़ी नहीं मिलती. हर बार सरकार पंजाब के किसानों के संकट को सिर्फ़ कमेटियों की सिफ़ारिशों में दबा के रख देना चाहती है.

ज़मीन पर मिमिनम सपोर्ट प्राइस पर फ़सल बेचने के लिए भी हमें लड़ाइयां लड़नी पड़ती हैं. ऐसे में किसान आत्महत्या न करे तो और क्या करे”.

11 जुलाई को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चंडीगढ़ हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को उनकी मुआवज़ा और राहत नीति पर फटकार लगाते हुए कहा कि मुआवज़ा सिर्फ एक अंतरिम उपाय है.

सरकार को बढ़ती किसान आत्महत्यायों के कारणों पर एक हलफनमा दाख़िल करने का आदेश देते हुए अदालत यह भी पूछा की सरकार बढ़ती किसान आत्महत्यायों को रोकने के लिए क्या दीर्घकालिक उपाय कर रही है. फिलहाल सरकार अदालत में प्रस्तुत करने के लिए जवाब तैयार कर रही है पर इस जवाब का असली इंतज़ार तो पंजाब के किसानों को है.