इंटरनेट कनेक्टेड उपकरण हो सकते हैं ख़तरनाक

डिवाइस, सुरक्षा

क्या आपके घर के टीवी, गेमिंग कॉन्सोल, फ्रिज और दूसरे इंटरनेट से कनेक्ट होने वाले डिवाइस सुरक्षा के लिहाज से ख़तरनाक हो सकते हैं?

यूरोप में कनेक्टेड दुनिया से जुड़े मामलों पर काम करने वाली संस्था एनीसा ने हाल ही में एन्क्रिप्शन के बारे में एक रिपोर्ट निकाली है.

इसमें ये कहा गया है कि कई देश की सरकारें चोरी छुपे घर में इस्तेमाल होने वाले सामानों में ऐसे डिवाइस लगा रही हैं जिससे लोगों पर नज़र रखने में उन्हें आसानी हो.

ऐसे उपकरणों को 'बैकडोर डिवाइस' कहा जाता है. कंपनियों के लिए 'डिजिटल सिंगल मार्किट' यानी एक ही बाज़ार में काम करने के लिए ऐसा करना शायद ज़रूरी है.

लेकिन इस लिंक पर मौजूद रिपोर्ट की अगर मानें तो एक बार ऐसा कर दिया गया तो ये ग़लत हाथों में भी पड़ सकता है जिससे लोगों के लिए नया ख़तरा पैदा हो जाएगा.

एनीसा के अनुसार ऐसा करने से जो फ़ायदे हैं उससे कहीं ज़्यादा लोगों को नुक़सान हो सकता है.

बैकडोर डिवाइस की वजह से मासूम लोग साइबर क्राइम का शिकार हो सकते हैं. इसके अलावा अगर आप विदेशी उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं तो हो सकता है कि आपकी निजी जानकारी विदेश की कंपनियों या सरकारों के हाथ पड़ जाए.

दुश्मन देश इन जानकारियों का ग़लत इस्तेमाल कर सकता है. ऐसे उपकरण न सिर्फ आम इंसानों के लिए बल्कि पूरे देश के लिए ख़तरा पैदा कर सकते हैं.

एनीसा ने ये भी आशंका जाहिर की है कि साइबर क्राइम का शिकार होने पर आम लोगों को सज़ा हो सकती है क्योंकि उनके डिवाइस किसी ग़लत कामों के लिए इस्तेमाल होते हैं. अपराधी आपकी निजी तस्वीरें और वीडियो लीक कर सकता है.

यही नहीं, आपके धन दौलत की जानकारी भी किसी अनजान शख़्स को लग सकती है.

सरकार भले ही ऐसे डिवाइस का इस्तेमाल देश की सुरक्षा के लिए करती हो लेकिन इससे निजता का हनन भी होता है.

इस बात पर साल 2015 में भी बहस छिड़ी थी, जब अमरीका में एफबीआई ने एप्पल से गुजारिश की थी कि वो आई फोन को अनलॉक करे.

एप्पल ने ऐसी गुजारिश को लेकर सरकार को आगाह किया था, कि जिस बैकडोर के जरिए सरकार अपराध का पता लगाती है उसी तरीके का ग़लत इस्तेमाल अपराधी भी कर सकते हैं.

कोई भी कंपनी प्राइवेसी पॉलिसी के तहत अपने ग्राहकों से वादा करती है कि वो उनकी निजी जानकारी को सार्वजनिक नहीं करेगी.

अगर वो सरकार के कहने पर किसी डिवाइस के जरिए ऐसी जानकारी लीक करेगी तो ये प्राइवेसी पॉलिसी के ख़िलाफ़ होगा. यही वजह है कि एप्पल ने एफबीआई की मदद करने से साफ इनकार कर दिया था.

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