नज़रिया: 'असफलता की जांच कर इसरो आगे बढ़ जाएगा'

  • 1 सितंबर 2017
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गुरूवार को इसरो के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से किया गया जीएसएलवी रॉकेट का प्रक्षेपण असफ़ल रहा है.

इसरो प्रमुख किरण कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नवीनतम नैविगेशन उपग्रह के असफल होने की जानकारी दी.

गुरूवार को पोलर सैटलाइट लॉन्च वेहिकल (पीएसएलवी) लॉन्च किया गया था जो असफल रहा. ये रॉकेट की असफलता है सैटलाइट की नहीं.

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क्या हुई गड़बड़ी?

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पीएसएलवी की उड़ान उन्नीस मिनट की थी. उड़ान के तीसरे मिनट में एक गड़बड़ी शुरू हुई जिसमें रॉकट की हीट शील्ड रॉकेट से अलग नहीं हुई.

जब रॉकेट वायुमंडल से जा रहा होता है तो उसके अंदर जो यात्री है, उसे वायुमंडल की गर्मी और घर्षण से बचाने के लिए सैटलाइट में ऊपर की तरफ एक धातु की मोटी प्लेट लगी होती है.

तीन से चार मिनट में जब रॉकेट वायुमंडल को पार कर वैक्यूम में पहुंच जाता है तब ये हीट शील्ड फट जानी चाहिए.

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गुरूवार को हुए रॉकेट प्रक्षेपण के उन्नीस मिनट बाद भी जब सैटलाइट अपनी कक्षा में पहुंच गया तब भी हीट शील्ड उसके ऊपर लगी रही.

अब ये सैटलाइट हीट शील्ड के साथ स्पेस डेब्री यानी अंतरिक्ष का कूड़ा बन जाएगा और स्पेस में घूमता रहेगा.

अंतरिक्ष में उपग्रह छोड़ना रिस्की बिज़नेस है. नासा को कई बार असफलता हाथ लगी है, कई बार रूस भी असफल रहा है, हाल में इलोन मस्क का फ़ैलकॉन 9 भी असफल रहा.

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इसरो के पीएसएलवी की ये 41वीं उड़ान थी.

इसकी पहली उड़ान असफल रही थी जिसके बाद से इसके 39 फ्लाइट लगातार सफल रहे हैं. और 41वीं फ्लाइट के असफल होने को बुरी नज़र से देखने की ज़रूरत नहीं है.

इसरो इसकी जांच करेगा, सुधार करेगा और इसरो आगे बढ़ जाएगा.

जब भी कोई काम असफल रहा है इसरो सुधार के साथ आगे ज़रूर बढ़ा है.

'इस रॉकेट से अंतरिक्ष में यात्री भेजेगा भारत'

इस असफलता से धक्का ज़रूर लगा है क्योंकि पीएसएलवी को भारत का वर्कहॉर्स रॉकेट बोलते हैं जो कि एक के बाद एक बड़े विश्व रिकॉर्ड भी बना रहा था और प्रक्षेपण में लगा हुआ था.

इसरो को पीएसएलवी को वापिस मार्केट में उतारने में थोड़ा वक़्त तो लगेगा लेकिन वो आगे ज़रूर बढ़ जाएगा.

देखने को मिली इसरो की पुरानी परंपरा

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Image caption इसरो के चेयरमैन डॉ किरणकुमार रेड्डी

इसरो में परंपरा रही है कि जब भी कोई सफल प्रक्षेपण होता है इसरो के प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रोजेक्ट डायरेक्टर, लीडर और जूनियर आगे आगे आते है.

गुरूवार को प्रक्षेपण में असफलता के बाद तुरंत ही इसरो के चेयरमैन डॉ किरणकुमार रेड्डी ने इसकी घोषणा कर दी. किसी तरह से मामले को ढकने की कोई कोशिश नहीं हुई.

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पहले सतीश धवन के समय में और अब्दुल कलाम के समय में भी ऐसा हो चुका है सफलता की घोषणा जूनियर करते हैं और असफलता की घोषणा करने के लिए वरिष्ठ अधिकारी आगे आते हैं.

वहीं परंपरा आज भी देखने को मिली. जो भी हुआ को सही हुआ या नहीं उसकी ज़िम्मेदारी वरिष्ठ अधिकारी की होती है.

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भारत को इस असफलता से 400 से 500 करोड़ का नुकसान हुआ है, लेकिन परेशान होने की ज़रूरत नहीं है.

हाल में देखें तो नोटबंदी के कारण हमारी अर्थव्यवस्था को जितना नुकसान हुआ, जितना पैसा वापस नहीं आया उसकी तुलना में ये रकम छोटी है.

इसरो की सेवाओं से भारत और उसके पड़ोसी देशों को हज़ारों करोड़ों रुपये का फ़ायदा हुआ है.

(पल्लव बागला से बात की बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद ने.)

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