कुछ समलैंगिक एड्स की परवाह किए बिना कैसे बेखौफ़ यौन संबंध बनाते हैं?

  • 1 दिसंबर 2017
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"जब मैं अपनी पहली सेक्स पार्टी के लिए गया, मैंने अपने लिए कंडोम मांगा" ये कहना है सेलिम का, जो तकरीबन 35 बरस के हैं और लंदन में रहते हैं.

मूल रूप से तुर्की के रहने वाले सेलिम एक दशक पहले ब्रिटेन आए थे और बदले हुए नाम के साथ बीबीसी के साथ बातचीत के लिए तैयार हुए.

"मैं डेटिंग ऐप के माध्यम से लोगों से मिलता हूं, और एक दिन उनमें से एक मुझे एक पार्टी में ले गया जहाँ पहले से ही 10 लोग मौजूद थे. पार्टी में ड्रग्स थी और सेक्स भी. मुझे ये पसंद आया."

सेलिम हमेशा सतर्क रहते थे कि उन्हें यौन रोग न हों और इसके लिए वो पर्याप्त सावधानियां बरतते थे. लेकिन दूसरी बार जब उन्हें पार्टी की दावत दी गई तो वो नशे में डूबे हुए थे. इसी हाल में उन्होंने तीन अलग-अलग आदमियों से जिस्मानी रिश्ते बनाए और वो बिना कंडोम का इस्तेमाल किए.

सेलिम कहते हैं, "कोई भी कंडोम का इस्तेमाल नहीं कर रहा था. मैं भी दूसरे लोगों की तरह इन पलों को मज़ा ले रहा था, लेकिन दिमाग़ में कहीं न कहीं ये डर भी थी कि कहीं कुछ हो न जाए."

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डर इस बात का कि कहीं असुरक्षित यौन संबंध बना देने से एचआईवी संक्रमण न हो जाए. माना जाता है कि अगर कोई एड्स पीड़ित है तो उसके साथ असुरक्षित यौन संबंध बनाने से वायरस दूसरे व्यक्ति के शरीर में भी प्रवेश कर सकता है.

शायद यही डर था कि सेलिम अगले दिन समलैंगिकों के क्लीनिक गए और उन्हें बताया कि पिछली रात क्या हुआ था. उन्होंने बताया कि उन्होंने एक व्यक्ति के साथ गुदा मैथुन किया था, पर उन्हें नहीं पता कि उस शख्स को एचआईवी था कि नहीं.

क्लीनिक ने उन्हें 'प्रि-एक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस' की दवाएं दी. इसमें दो गोलियां दी गई और इन्हें रोज़ाना 28 दिन तक खाना था.

स्वास्थ्य अधिकारियों ने दवाएं देने के साथ ही ये भी जोड़ा कि ये दवाएं 100 फ़ीसदी असरदार नहीं हैं और अंतिम विकल्प के रूप में ये उन्हें ये दी गई हैं.

नई उम्मीद

सबसे ज़रूरी था कि असुरक्षित यौन संबंध बनाने के बाद जितना जल्दी हो सके उपचार शुरू किया जाए और इसमें 72 घंटों से अधिक की देरी नहीं हो तो बेहतर है. ब्रिटेन में ये दवाएं आपात स्थिति में लोगों को मुफ्त में दी जाती हैं.

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Image caption ब्यूनस आयर्स का एक अस्पताल, जहाँ एड्स पीड़ितों का इलाज हुआ

सेलिम का कहना है कि शुरू में कुछ दिनों तक दवा लेने पर उन्हें मितली आने की शिकायत ज़रूर हुई, लेकिन और कोई गंभीर साइड इफेक्ट्स नहीं थे. बाद में, जब उनकी जांच की गई तो नतीजा एचआईवी निगेटिव निकला.

कोई भी दावे के साथ ये नहीं कह सकता कि ये दवाओं (प्रेप) का असर था जिसने होने वाले संभावित संक्रमण को रोका, लेकिन सुकून वाली बात ये रही कि ये पता चल गया कि भूल होने पर कुछ ऐहतियाती उपाय ज़रूर हैं.

सेलिम कहते हैं, "मैं नहीं जानता कि मेरे देश तुर्की में किसी समलैंगिक का इस तरह से उपचार हुआ कि नहीं. सोचिए कि सेक्स के दौरान कंडोम फट जाए. आप महिला या पुरुष कुछ भी हो सकते हैं, ऐसे में क्या करेंगे?"

पिछले कई सालों से दुनियाभर में एचआईवी के उपचार पर ज़ोर दिया जा रहा है, लेकिन दवाएं और उपचार सभी जगह एक जैसा नहीं है. कहीं दवाएं पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं तो कहीं इनका घनघोर अभाव भी है.

दवाओं से बच सकता है जीवन

अब तो ऐसी दवाएं मौजूद हैं कि अगर कोई व्यक्ति एचआईवी से संक्रमित हो जाए तो चिकित्सकीय निगरानी में पूरी जिंदगी सुरक्षित और स्वस्थ जीवन जी सकता है.

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लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के मुताबिक एचआईवी संक्रमित 54 फ़ीसदी वयस्क और 43 फ़ीसदी बच्चों को ही जीवनपर्यन्त एंटीवायरल उपचार की सुविधा हासिल है. एचआईवी एड्स का गढ़ उप सहारा अफ्रीका में हालात सबसे ज़्यादा ख़राब हैं.

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दुनियाभर में जितने एड्स रोगी हैं, उनमें से दो-तिहाई इन अफ्रीकी देशों में हैं.

हालाँकि ये भी सच है कि दुनियाभर में एचआईवी संक्रमण में कमी आई है. साल 2006 से 2016 के बीच नए संक्रमण 39% घटे हैं, जबकि एचआईवी से होने वाली मौतों में भी एक तिहाई की कमी आई है.

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सेलिम को इन दवाओं से नया आत्मविश्वास मिला है. उनका कहना है कि दूसरी बार इस तरह के उपचार के दौरान उन्होंने क्लीनिक में एचआईवी विशेषज्ञों से बात की.

शायद यही वजह है कि उनके लिए अब सुरक्षित यौन संबंधों के मूल मंत्र पर टिके रहना मुश्किल होता है.

'डर से मुक्ति'

वो नियमित तौर पर प्रेप क्लीनिक जाते हैं और एचआईवी जाँच कराते हैं. उनका एचआईवी स्टेटस निगेटिव है.

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Image caption मैट कैन, मुख्य संपादक, एटीट्यूड मैगजीन

ब्रिटेन की समलैंगिक मैगज़ीन के मुख्य संपादक मैट कैन मानते हैं कि ऐसी दवाएं सर्वसुलभ होनी चाहिए. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "मैं 80 और 90 के दशक के उस दौर में बड़ा हुआ जब समलैंगिकों पर एचआईवी और एड्स का ख़तरा मंडराता था. हममें से कई के लिए समलैंगिक यौन संबंधों के नतीजे बेहद डरावने और शर्मनाक थे."

प्रेप से समलैंगिकों के सेक्स जीवन में सुधार आया है. कैन कहते हैं, "मैंने पहले ग़लतियां की थी. मुझे प्रेप लेना चाहिए था. मैं जानता हूँ कि इसके बाद का सेक्स अनुभव डर से मुक्त होता है."

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लेकिन ऐसा नहीं है कि प्रेप के बाद जोखिम पूरी तरह खत्म हो गया है. एक अध्ययन में पता चला है कि प्रेप 86 प्रतिशत तक असरदार है, यानी कई लोग फिर भी एचआईवी एड्स की चपेट में आ सकते हैं.

हालाँकि कैन इस अध्ययन से इत्तेफ़ाक नहीं रखते. वो कहते हैं, "इस अध्ययन में शामिल कुछ लोगों ने दवाएं ठीक तरह से नहीं ली थी और कुछ तो ये मानकर बैठे थे वो एचआईवी संक्रमित हैं. बड़े स्तर पर और भी अध्ययन चल रहे हैं और हमें इनके नतीजों का इंतज़ार करना चाहिए."

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