ऑफिस में उत्पीड़न की शिकायत सुनेगा 'चैटबॉट'!

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किसी भी ऑफ़िस में कर्मचारियों के साथ भेदभाव और उत्पीड़न सामान्य बात है.

शायद ही कोई दफ़्तर होगा, जहाँ लोगों को ये शिकायत न हो. कर्मचारियों के प्रति बॉस की पसंद-नापसंद इन दो बुराइयों को जन्म देती है और इसे भुगतना मातहत को ही पड़ता है.

महिला कर्मचारी इसका सबसे ज़्यादा शिकार होती हैं.

हालांकि किसी भी कर्मचारी की शिकायत सुनने के लिए हर ऑफ़िस में एचआर यानी ह्यूमन रिसोर्सस डिपार्टमेंट होता है. लेकिन वहां से पीड़ित को इंसाफ़ मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती.

हो सकता है अगर आप शिकायत लेकर जाएं भी तो लंबी सुनवाई के बाद समझौते का सुझाव दिया जाए. या आपको ही मुजरिम ठहरा दिया जाए.

फ़ेहरिस्त में मर्द भी

ज़रूरी नहीं है कि आपके साथ पीड़ित जैसा बर्ताव हो. शायद इसीलिए बहुत सी महिला कर्मचारी उत्पीड़न सहती रहती हैं. पीड़ितों की इस फ़ेहरिस्त में मर्द भी शामिल हैं.

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लेकिन अब उत्पीड़न और भेदभाव के शिकार कामकाजी लोगों की मुश्किल आसान करने के लिए एक तकनीक की मदद ली जा रही है.

अमरीका में फ़रवरी महीने में ही एक कंप्यूटर प्रोग्राम लॉन्च किया गया है, जहां पीड़ित अपनी आपबीती सुना सकते हैं. इसे 'चैटबॉट' कहते हैं. 'चैट' यानी बातचीत और 'बॉट' शब्द रोबोट से लिया गया है.

यानी ये ऐसा प्रोग्राम है जहां पीड़ित से बातचीत के बाद परेशानी का हल निकाला जा सकता है. रिसर्चरों ने चैटबॉट को 'स्पॉट' नाम दिया है.

चैटबॉट की मदद

मिसाल के लिए अगर कोई अपने ऑफिस में शारीरिक शोषण का शिकार है, तो वो चैटबॉट की मदद ले सकता है. चैटबॉट उससे कुछ सटीक सवाल पूछेगा, जैसे दिन, तारीख़. महीना, समय वग़ैरह.

मिलान के बाद वो इस बात की तस्दीक़ करेगा कि शिकायत वाजिब है या झूठी.

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शिकायत सही पाए जाने पर, वो मशीन कार्रवाई की सिफ़ारिश कर देगी.

चैटबॉट से सलाह लेने के लिए ज़रूरी नहीं कि आप ऑफिस के कंप्यूटर पर ही लॉग इन करें. निजी कंप्यूटर के ज़रिए भी इन मशीनी एच आर कर्मचारियों की मदद ली जा सकती है.

शिकायत करने वाले के पास अपने पक्ष में अगर कोई सबूत है, तो वो भी पेश किया जा सकता है. मिसाल के लिए अगर कोई आपत्तिजनक मैसेज, ई-मेल या तस्वीर है, तो चैटबॉट पर उसे अपलोड किया जा सकता है.

क़ानूनी लड़ाई का तरीक़ा

अगर पीड़ित किसी गवाह का ज़िक्र करता है, तो चैटबॉट गवाह से भी डिटेल रिपोर्ट अपलोड करने को कहेगा.

चैटबॉट आवाज़ के ज़रिए कुछ सवाल करेगा और उनके जवाब अपनी मेमोरी में प्रॉसेस करके पीडीएफ़ फ़ाइल की शक्ल में एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करेगा.

इस रिपोर्ट में चैटबॉट कुछ सुझाव देगा. साथ ही क़ानूनी लड़ाई का तरीक़ा भी सुझाएगा.

दफ़्तरों में और कामकाजी जगहों पर अक्सर कर्मचारियों का उत्पीड़न होता है. चूंकि सभी पीड़ित अपनी शिकायत दर्ज नहीं कराते. इसीलिए सही आंकड़े मौजूद नहीं हैं.

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लेकिन बीबीसी ने क़रीब दो हज़ार महिला कर्मचारियों पर एक रिसर्च की है. इससे पता चलता है कि महिलाएं सबसे ज़्यादा भेदभाव और उत्पीड़न का शिकार होती हैं.

पीड़ितों का मंच

हालांकि इस समस्या से निपटने के लिए क़ानून हैं. लेकिन कानूनी लड़ाई लंबी खिंचती है. वक़्त और पैसा दोनों की दरकार होती है.

लिहाज़ा पीड़ितों को ऐसा मंच मुहैया कराने की ज़रूरत है, जहां वो बिना किसी ख़ौफ़ के अपनी आवाज़ उठा सकें.

इस काम में चैटबॉट यानी स्पॉट कारगर साबित हो सकता है.

'स्पॉट' को ज़्यादा एडवांस बनाने की कोशिश भी की जा रही है. इस कंप्यूटर प्रोग्राम पर काम करने वालों का कहना है कि इसमें शिकायतकर्ता की दिमाग़ी हालत समझने और याद रखने के लिए नया ऐप शामिल किया जा रहा है.

शिकायत के आधार पर चैटबॉट जो भी रिपोर्ट तैयार करेगा उसे पूरी तरह से गोपनीय रखा जाएगा.

लेखाजोखा चैटबॉट पर रिकॉर्ड

पीड़ित के साथ अगर कई बार भेदभाव या उत्पीड़न हुआ है तो वो हर बार का लेखाजोखा चैटबॉट पर रिकॉर्ड करा सकता है. ये ज़रूरी नहीं कि हर घटनाओं की तफ़्सील पीड़ित को याद रहे.

लेकिन चैटबॉट सारी डिटेल का रिकॉर्ड अपने पास रखेगा. इन घटनाओं की रौशनी में वो पीड़ित कर्मचारी को बेहतर मशविरा भी देगा.

मी टू और टाइम्स-अप जैसी मुहिम के दौर में बहुत से कारोबार में लगी कंपनियां ऐसे शोषण, उत्पीड़न और भेदभाव जैसी शिकायतों से पार पाने के तरीक़ों पर काम करने की सोच रहे हैं.

सबको बराबर का हक़ और इंसाफ़ की बात कही जारी है. इसके बावजूद बहुत सी अड़चनें हैं जिनके चलते पीड़ित शिकायत करने के लिए सामने आने से कतराते हैं.

दरअसल लोग जानते ही नहीं कि वो अपनी आवाज़ उठाएं कैसे. बहुत से कर्मचारियों को तो अपनी कंपनी एचआर पॉलिसी तक की पूरी जानकारी नहीं होती.

एचआर से बात नहीं

अगर सालाना एप्रेज़ल में किसी कर्मचारी के साथ भेदभाव होता है, तो भी वो ख़ामोश रहता है. वो एचआर डिपार्टमेंट में जाकर अपनी बात ही नहीं रखता. इसकी एक बड़ी वजह है अविश्वास.

पीड़ित के मन में ये डर बना रहता है कि अगर उसने आवाज़ उठाई तो इसका बदला किसी भी सूरत में उससे लिया जा सकता है.

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इसी तरह जिन लड़कियों का शारीरिक शोषण होता है, वो भी अपनी आवाज़ तब ही उठाती हैं जब पानी सिर से ऊपर चला जाता है.

उनके मन में भी डर होता है कि शिकायत होने पर कहीं उनके साथ और ज़्यादती ना शुरू हो जाए या उन्हें अलग-थलग ना कर दिया जाए. वो खामोशी से उत्पीड़न सहती रहती हैं. जिसका सेहत पर बुरा असर पड़ता है. काम में भी उसकी झलक मिलने लगती है.

एक रिसर्च में पाया गया है कि जिन महिलाओं की शिकायत का सही निपटारा किया गया वो ज़्यादा तनावमुक्त नज़र आईं. उनकी सेहत भी ठीक थी.

इंटरव्यू के नतीजे

चैटबॉट बनाने वाले इसके बहुत से फ़ायदे गिनाते हैं. कुछ हद तक ये फ़ायदेमंद है भी. लेकिन अच्छाई के साथ इसमें कुछ कमियां भी हैं. जानकार मानते हैं कि स्काइप या मैसेंजर के ज़रिए भले ही पीड़ित से सवाल जवाब किए जाते हैं.

लेकिन इस इंटरव्यू के नतीजे बिल्कुल सही होंगे कहना मुश्किल है. जब दो इंसानों के बीच बातचीत होती है तो बहुत सी वो बातें भी निकल कर सामने आती हैं जो मशीन के साथ सवाल-जवाब यानी चैटबॉट के इंटरव्यू में शायद सामने नहीं आ सकतीं.

बहरहाल चैटबॉट की ख़ूबियों को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता. इससे बहुत से पीड़ितों को आपबीती सुनाने का मौक़ा मिला है.

चैटबॉट को और असरदार बनाने की कोशिशें अभी जारी हैं. कुछ कंपनियां जो अपने यहां बेहतर वर्किंग माहौल बनाने की ख़्वाहिशमंद हैं, वो भी इस प्रोग्राम को अपग्रेड करने में अपना सहयोग कर रही है.

उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में ये कंप्यूटर प्रोग्राम बहुत से परेशान हाल कामगारों का हमदर्द साबित होगा.

(बीबीसी कैपिटल का ये मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें.)

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