तारों भरा आसमान, फिर भी रात काली क्यों होती है?

  • 22 अप्रैल 2018

ये सवाल बचकाना लगता है. हमें पता है कि हमारी पृथ्वी पर प्रकाश सूर्य की रोशनी के कारण होता है, लेकिन जब पृथवी अपनी धुरी पर घूमती है तो जहां एक तरफ सूर्य की रोशनी पड़ती है दूसरी तरफ अंधेरा होता है.

वैज्ञानिकों को सदियों से ये सवाल परेशान करता रहा है कि अगर ब्रह्मांड में असंख्य तारें हैं जो रात के आसमान में चमकते हैं तो पृथ्वी पर रात आख़िर काली और अंधेरी क्यों होती है.

19वीं सदी में जानकार मानते थे कि ब्रह्मांड शाश्वत है, इसका कोई छोर नहीं है और वक्त के साथ ये कभी नहीं बदलता.

उस वक्त आसमान को एक बड़े चित्रपट के तौर पर देखा जाता था जहां असंख्य तारे हमेशा चमकते रहते हैं.

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"यूरेका" नाम के एक निबंध में लेखक एडगर एलन पो ने कहा कि ब्रह्मांड के बारे में कुछ दलीलें सही नहीं थी.

वो कहते हैं, "अगर तारों की चादर का कोई अंत ही नहीं है और वो स्थिर हैं तो आकार हर रात समान ही नज़र आएगा और कोई पूरे ब्रह्मांड ऐसी कोई जगह नहीं होगी जहां से कुछ तारे ना दिखें."

आकाश के बारे में और जानने की चाह और विज्ञान के प्रति अपनी रुचि के कारण उन्होंने आकाश के बारे में एक दलील को चुनौती दे दी थी- वो धारणा थी कि ब्रह्मांड शाश्वत है.

लेकिन हर दलील के बावजूद रात काली क्यों होती है इस पर सवाल उठाए गए हैं. इसके साथ तारों के असंख्य होने, ब्रह्मांड के सीमाहीन होने और ब्रह्मांड में हर चीज़ के स्थिर होने पर भी सवाल उठाए गए हैं.

हालांकि अंधेरी रात या फिर कहें ब्रह्मांड में अंधेरा के सवाल से इसके बारे में कई बातें सामने आने में मदद मिली है.

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इस पर विरोधाभास रहा

लंबे वक्त से, शायद जब से धरती बनी तब से ही रात काली ही थी लेकिन इसके अस्तित्व से जुड़े सवाल सोलहवीं सदी में पूछे जाने लगे. इन सवालों के संतोषजनक उत्तर मिलने में हालांकि काफ़ी वक्त लगा.

जर्मन खगोलविद हेनरिच विल्हेम ओल्बर्स के मन में सवाल पैदा हुआ कि रात में आसमान में लाखों चमकते हुए आग के गोले हैं लेकिन फिर भी रात में अंधेरा क्यों होता है.

उन्होंने इस तर्कहीन प्रक्रिया को विरोधाभासी कहा. इसके बाद इस विषय पर लोगों की रुचि बढ़ी और लोगों के बीच इस पर विवाद शुरू हुआ.

उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में ओल्बर्स की बताई इस विरोधाभासी प्रक्रिया को ओल्बर्स पैराडॉक्स कहा गया.

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अगर एडगर एलन पो के निबंध "यूरेका" की बात करें को इसमें उनका कहना है कि, "खगोल के बारे में कोई भी भ्रांति इतनी अधिक देर तक नहीं रही और आसमान के तारों के बारे में जितनी बातें कि गईं शायद ही किसी और के बारे में की गई होंगी."

उन्होंने कहा कि आसमान में तारों की संख्या गिनी नहीं जा सकती और ऐसे में रात का होना (अंधेरा होना) ही संभव नहीं है. उन्होंने कहा, "जब हम टेलिस्कोप से अंतरिक्ष की तरफ देखते हैं तो हर जगह हमें खालीपन दिखता है. इसका कारण ये हो सकता है कि सीमाहीन अंतरिक्ष शायद इतना बड़ा है कि वहां से कभी प्रकाश की कोई किरण कभी हम तक पहुंच ही नहीं पाती है."

एक तरह से उनकी बात थोड़ी-बहुत सही थी. लेकिन इस अंतहीन ब्रह्मांड के बारे में कई बातें थी जो हमें पता नहीं थी.

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अंतहीन नहीं ब्रह्मांड

बीसवीं सदी तक खगोलशास्त्री ये मानते थे कि ब्रहमांड में सभी तारों को गिन पाना असंभव है. वो ये भी मानते थे कि अंतरिक्ष भी सीमाहीन है.

पैराडॉक्स की बात को साबित करने के उन्नीसवीं सदी के कुछ वैज्ञानिकों ने कहा कि तारों के बीच धूल के बादल हैं जो धरती की तरफ आने वाली रोशनी को सोख लेते हैं ताकि को धरती तक पहुंच न पाए. हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि ये धूल इतनी एनर्जी सोख लेंगे कि ये खुद ही चमकने लगेंगे.

इसके बाद इस संबंध में एक नई जानकारी सामने आई और धारे-धीरे ये धारणा बनने लगी कि ब्रह्मांड अंतहीन नहीं है.

ब्रह्मांड एक सीमित जगह है जहां अरबों तारे हैं लेकिन वो इतने काफी नहीं हैं कि वो पूरे ब्रहमांड में रोशनी करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

लेकिन ब्रह्मांड में अंधेरा रहने की कई और वजहें भी हैं.

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हमारा ब्रह्मांड अभी युवा है

अब हम ये नहीं मानते कि ब्रह्मांड अंतहीन है. हम मानते हैं कि ये लगातार बढ़ रहा है और इसमें चीज़ें बदलती रहती हैं. ये ना केवल सीमित आकार का है बल्कि इसकी एक उम्र भी है.

आज से 15 अरब साल पहले बिंग बैंग नाम के एक धमाके से हमारे ब्रह्मांड का जन्म हुआ था. केंद्र में एक बिंदु पर इसका जन्म हुआ जिसके बाद से ये लगातार बढ़ रहा है. ये अब भी लगतार बड़ी होती जा रही है और इस कारण तारे और गैलेक्सियां एक दूसरे से दूर होती जा रही हैं.

हालांकि ये बेहद तेज़ी से नहीं चल रहे लेकिन फिर भी प्रकाश को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने में वक्त लग जाता है. जब खगोलशास्त्री 10 लाख लाइट-ईयर दूर मौजूद किसी गैलेक्सी को देखते हैं तो असल में वो उस गैलेक्सी का वो रूप देखते हैं जो 10 लाख साल पहले था. क्योंकि आज इस गैलेक्सी से जो प्रकाश निकला होगा उसे हमारी आंखों तक पहुंचने में काफी वक्त लगेगा.

इसका ये मतलब है कि दूरी से आने वाला प्रकाश रास्ते में नष्ट भी होता रहता है और कई बार प्रकाश उस स्पेक्ट्रम में नहीं रह जाता जिसे नंगी आंखों से देखा जा सकता है.

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खगोलशास्त्री और विज्ञान विषयों के लेखक रूडॉल्फ़ किप्पेनहान कहते हैं कि रात के वक्त जह सूरज पृथ्वी की दूसरी तरफ होता है उस वक्त हमें अंधेरा ही दिखता है क्योंकि इस ब्रह्मांड के बरे में हमारी जानकरी अभी भी अधूरी है.

वो कहते हैं, "काली रात हमें बताती है कि कभी तारे थे ही नहीं और ब्रह्मांड हमेशा से बढ़ रहा था."

ये आश्चर्य की बात है कि ब्रह्मांड करे बारे में इस अहम जानकारी को बताने के लिए बड़े टेलिस्कोप और स्पेस स्टेशनों की कोई ज़रूरत नहीं. इसके लिए रात को खिड़की से बीहर झांकना ही काफ़ी है.

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