क्या क़ानून के डर से रुकेगी डेटा चोरी?

  • 1 मई 2018
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यह बहुत संभव है कि सोशल मीडिया कंपनी और वेबसाइट से आपको "कुछ महत्वपूर्ण अपडेट" से जुड़े ईमेल और पॉप-अप बॉक्स संदेश मिले होंगे.

यह अपडेट आपके निजी डेटा के उपयोग से जुड़े होते हैं. लेकिन क्या हम फिर से अपने निजी डेटा पर नियंत्रण हासिल करने वाले हैं?

आज की दुनिया में डेटा एक महत्वपूर्ण 'सामान' बन चुका है, जिसकी खरीद और बिक्री की जा रही है.

इस डेटा के ज़रिए उद्योग घराने ग्राहकों की बेहद ही निजी ज़रूरतों को समझकर अपना व्यापार आगे बढ़ा पा रहे हैं. कहा जा सकता है कि ये तरीका डेटा आधारित आर्थिक विकास को बढ़ावा दे रहा है या फिर आम इंसान की निजी ज़रूरतों को समझकर उनकी बेहतर मदद कर रहा है.

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लेकिन, क्या डेटा साइंस की अच्छी दिखने वाली यह तस्वीर अधूरी है?

हाल ही में सामने आए फ़ेसबुक-क्रैम्ब्रिज एनालिटिका प्रकरण के बाद इस बात को लेकर चिंता जताई जाने लगी कि सोशल मीडिया यूज़र्स का डेटा उनकी इजाज़त लिए बिना बेचा जा रहा है.

इस मामले के सामने आने की वजह से यूरोप में अगले महीने यानी मई में सख्त गोपनीय कानून पेश किया जाएगा, जिसके तहत ग्राहकों के निजी डेटा संबंधी नियंत्रण और नियमों को तोड़ने वाली कंपनियों पर बड़ा जुर्माना लगाया जाएगा.

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यह सोचने वाली बात है कि हम इस बिंदु तक कैसे पहुंचे?

इसे समझने के लिए हम लोगों को यह जानना ज़रूरी है कि डेटा को बेहद आसानी से कॉपी किया जा सकता है और उसे किसी के साथ उतनी ही आसानी से शेयर भी किया जा सकता है. इतना ही नहीं, इसे विभिन्न स्रोतों से इकट्ठा भी किया जा सकता है.

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आपकी निजता कितनी ज़रूरी?

गूगल क्रोम से लेकर फोन तक, डेबिट-क्रेडिट कार्ड से लेकर सीसीटीवी कैमरे तक, हम जितने भी डिजिटल उपकरणों का उपयोग करते हैं वो हमसे जुड़ी जानकारी इकट्ठा करते हैं. इस जानकारी का उपयोग विज्ञापनकर्ता, इंश्योरेंस कंपनी, पुलिस और दूसरे लोग हमें, हमारी पसंदीदा चीज़ें और हमारे व्यवहार को समझने के लिए करते हैं.

यह किसी सामान्य कॉमोडिटी से बिलकुल अलग है, जिसे खरीदा या बेचा जा सकता है.

मान लीजिए की आप घर बेच रहे हैं तो खरीदार आपके पास आता है और आपके घर का किचन और कारपेट देखकर यह पता लगा सकता है कि आप कैसा जीवन जीते हैं. लेकिन आपके अलमारी में रखे एलबम की निजी तस्वीरों को वो नहीं देख सकता. आप घर बेचने के बाद अपने एलबम को अपने साथ ले जा सकते हैं.

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लेकिन ऑनलाइन दुनिया में ऐसा नहीं है. जैसे ही आप किसी भी ऑनलाइन सेवा पर साइन-अप करते हैं, वो वेबसाइट या ऐप आपकी निजी जानकारी इकट्ठा करने लगता है.

साइन-अप करते वक्त जो नियम और शर्तें आपके सामने पेश की जाती हैं, उन्हें शायद ही आप कभी उसे पूरा पढ़ते होंगे. आप और हम उसे बिना पढ़े ही स्वीकार कर लेते हैं.

यह बिलकुल वैसा ही है जैसा आप अपने घर के खरीदार को अपनी निजी आदतों जैसे, आप किससे बात करते हैं, किसके साथ उठते-बैठते हैं- आदि के बारे में बता दें.

बहुत से यूज़र्स यह नहीं जानते होंगे कि उनका डेटा कहां-कहां शेयर किया जाता है और उसका इस्तेमाल कौन-कौन करता है.

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डेटा सुरक्षा के लिए कानून

यूरोप में 25 मई से 'द जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगूलेशन' (जीडीपीआर) नाम का नया क़ानून लागू हो जाएगा. इस कानून का मक़सद आम लोगों को यह जानकारी देना है कि आपका डेटा कौन ले रहा है और उसका इस्तेमाल कौन कर रहा है.

क़ानून के तहत लोगों का निजी डेटा केवल पहले से बताए गए उद्देश्यों के लिए किया जा सकेगा. कंपनियों को यह बताना होगा कि वो डेटा की जानकारी कैसे और क्यों ले रहे हैं.

यही कारण है कि हमें फ़ेसबुक और ट्विटर जैसी साइटों से "महत्वपूर्ण अपडेट" की सूचना मिल रही है. कंपनियों को यूज़र्स का डेटा सुरक्षित करने की ज़रूरत है और अगर उनका डेटा लीक होता है तो उन्हें बताना होगा कि यह उनके लिए कितना ख़तरनाक हो सकता है.

यूरोप के इस नए क़ानून का असर दुनियाभर के देशों में महसूस किया जा सकेगा. कंपनियों को इसे लागू करना होगा, अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो उनपर भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

लेकिन सिर्फ़ कानून के बन जाने से सबकुछ ठीक हो जाए, ऐसा संभव नहीं है. इसके लिए लोगों को भी इस संबंध में जागरूक होना होगा.

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