यूटेरस ट्रांसप्लांट कराना कितना मुश्किल है

  • 9 अगस्त 2018
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"मैं केवल 28 साल की हूं. इस उम्र में मेरे तीन अबॉर्शन हो चुके हैं. एक बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ. डॉक्टर कहते हैं कि अब मेरा खुद का बच्चा नहीं हो सकता. लेकिन मुझे मेरा अपना बच्चा चाहिए. मैं सरोगेसी से बच्चा नहीं चाहती हूं. और न ही बच्चा गोद लेना चाहती हूं. आप बताइए, क्या हो सकता है?"

गुजरात के भरूच की रहने वाली मीनाक्षी वलाण्ड जब पहली बार डॉ. शैलेश पुटंबेकर से मिली तो वो बेहद निराश थी.

वह साल 2017 में अप्रैल का महीना था. उमस भरी गर्मी में मीनाक्षी अपनी मां और घर वालों के साथ डॉ. शैलेश के अस्पताल पहुंची थी.

डॉ. शैलेश पुटंबेकर देश भर में यूटेरस (गर्भाशय) ट्रांसप्लांट के लिए जाने जाते हैं और पुणे के गैलेक्सी अस्पताल में कार्यरत हैं.

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Image caption मीनाक्षी वलाण्ड की आज की तस्वीर

'अशर्मान सिंड्रोम' क्या है ?

मीनाक्षी के गर्भ में बच्चा ठहर नहीं पा रहा था, क्योंकि उनको 'अशर्मान सिंड्रोम' नाम की बीमारी थी. इस बीमारी में महिलाओं को मासिक धर्म न आने की समस्या होती है और यूटेरस (गर्भाशय) सालों तक काम नहीं करता है. अक़सर एक के बाद एक कई मिसकैरेज होने की वजह से यह बीमारी होती है, इसके अलावा पहली डिलिवरी के बाद, यूटेरस में 'स्कार' या खरोंच होने की वजह से भी यह बीमारी होती है.

अंतरराष्ट्रीय जरनल ऑफ अप्लाइड रिसर्च में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया में 15 फ़ीसदी महिलाएं अलग- अलग वजहों से मां नहीं बन सकती हैं. जिनमें से 3 से 5 फ़ीसदी महिलाओं में यूटेरस की दिक्कत इसके पीछे की वज़ह होती है.

मीनाक्षी आखिरी बार दो साल पहले गर्भवती हुई थी. "एक वो दिन था और एक आज का दिन है. मेरा सपना सच होने जा रहा है. मुझे बेसब्री से नवंबर के पहले सप्ताह का इंतज़ार है." मीनाक्षी जिस अस्पताल में भर्ती हैं वहां हर नर्स और जूनियर डॉक्टर से हर दिन एक बार वो इस बात का ज़िक्र ज़रूर करती हैं.

फिलहाल पिछले पांच महीने से मीनाक्षी अस्पताल में भर्ती है. वो 21 हफ्ते की गर्भवती है. मई 2017 में उनका यूटेरस ट्रांसप्लांट हुआ था. उनकी मां ने उन्हें अपना गर्भाशय दिया है.

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यूटेरस ट्रांस्प्लांट - आंकड़े क्या कहते हैं

दुनिया में यूटेरस ट्रांसप्लांट न के बराबर होते हैं. डॉ. शैलेश के मुताबिक़ पूरी दुनिया में अब तक केवल 26 महिलाओं का ही यूटेरस ट्रांसप्लांट किया गया है, जिनमें से केवल 14 ही सफल हुए हैं.

जबकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पूरी दुनिया में 42 यूटेरस ट्रांसप्लांट के मामले सामने आए हैं. हालांकि केवल 8 मामलों में महिला ने ट्रांसप्लांट के बाद गर्भ धारण किया है.

आठ मामलों में से सात स्वीडन के हैं और एक अमरीका का है. मीनाक्षी का मामला एशिया का पहला है जहां यूटेरस ट्रांसप्लांट के बाद बच्चा पैदा होने कि प्रक्रिया में है.

मीनाक्षी को यूटेरस उनकी अपनी मां ने दिया है. उनकी मां 49 साल की हैं. आम तौर पर इस तरह के ट्रांसप्लांट में डोनर की उम्र 40 से 60 साल के बीच की होनी चाहिए.

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Image caption डॉ. शैलेश और उनकी टीम

डॉ. शैलेश के मुताबिक यूटेरस ट्रांसप्लांट की पहली शर्त ही होती है कि डोनर महिला मां, बहन या मौसी हो.

देश में इस पर फ़िलहाल कोई क़ानून नहीं बना है क्योंकि सांइस की इस विधा में अभी ज़्यादा सफलता नहीं मिली है.

डॉ. शैलेश के मुताबिक एक बार डोनर मिल जाए तो, फिर लैप्रस्कोपी से यूटेरस निकाला जाता है. यूटेरस ट्रांसप्लाट का मामला लिविंग ट्रांसप्लांट का मामला होता है. इसमें ज़िंदा महिला का ही यूटेरस लिया जा सकता है. पूरी प्रक्रिया में दस से बारह घंटे का वक्त लगता है.

दूसरे ऑर्गन डोनेशन की तरह किसी महिला के मरने के बाद यूटेरस डोनेट नहीं किया जा सकता.

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

हाई रिस्क प्रेग्नेंसी

डॉ. शैलेश के मुताबिक एक बार यूटेरस ट्रांसप्लाट हो जाए तो तकरीबन एक साल बाद ही महिला का गर्भ बच्चा रखने के लिए तैयार हो पाता है, लेकिन वो भी सामान्य प्रकिया से नहीं.

डॉक्टरों के मुताबिक, यूटेरस ट्रांसप्लांट के बाद अक़्सर 'रिजेक्शन' का ख़तरा रहता है. यानी ज्यादातर मामलों में शरीर बाहर के ऑर्गन को स्वीकार नहीं करता. इसलिए एक साल तक मॉनिटर करने की जरूरत पड़ती है.

यूटेरस ट्रांसप्लाट के बाद अगर महिला को बच्चा चाहिए तो एम्ब्रायो यानी भ्रूण को लैब में बनाया जाता है, और फिर महिला के बच्चेदानी में स्थापित किया जाता है.

भ्रूण बनाने के लिए मां के अंडाणु और पिता के शुक्राणु का इस्तेमाल किया जाता है. मीनाक्षी के मामले में भी ऐसा ही किया गया. इस साल अप्रैल के पहले सप्ताह में लैब में तैयार किए गए भ्रूण को डॉ. शैलेश और उनकी टीम ने उनकी बच्चेदानी में स्थापित किया.

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पिछले पांच महीने से मीनाक्षी पुणे के उसी अस्पताल में डॉक्टरों की निगरानी में ही है.

डॉ. शैलेश इस तरह की प्रेग्नेंसी को हाई रिस्क प्रेग्नेंसी क़रार देते हैं. उनके मुताबिक मीनाक्षी का परिवार किसी भी तरह का रिस्क लेना नहीं चाहते और न ही डॉक्टरों की टीम भी.

इस तरह के हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की जटिलता के बारे में चर्चा करते हुए डॉ. शैलेश कहते हैं, "मीनाक्षी कई तरह की इम्यून- सप्रेसेंट दवाइयों पर है. ऐसे में प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज़ का ख़तरा बढ़ जाता है. उसे मैनेज करना जरूरी होता है. साथ ही ब्लड प्रेशर भी ज़्यादा बढ़ने-घटने की गुंजाइश नहीं होती. इसलिए भी मीनाक्षी को निगरानी में रखना ज़रूरी था."

मई 2017 से आज तक डॉ. शैलेश की टीम ने भारत में छह यूटेरस ट्रांसप्लांट किए है और उनका दावा है कि सभी सफल रहे हैं.

यूटेरस ट्रांसप्लांट के बाद होने वाली प्रेग्नेंसी इसलिए भी हाई रिस्क होती है क्योंकि डोनर के यूटेरस को प्रेग्नेंसी झेलने की आदत नहीं होती. मीनाक्षी के मामले में उनकी मां 20 साल पहले प्रेग्नेंट हुई थी. 20 साल बाद कोई चीज़ बदलती है तो ज़ाहिर है कि दिक्कतें होंगी है.

डॉ. शैलेश के मुताबिक मीनाक्षी की डिलिवरी जब भी होगी तो पूरी तरह प्लान कर कर सीज़ेरियन ही होगी.

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लेकिन सीजेरियन ही क्यों?

डॉ. शैलेश विस्तार से इस पूरी प्रक्रिया को समझाते हैं. यूटेरस ट्रांसप्लाट के समय केवल यूटेरस ट्रांसप्लांट होता है, साथ के नसों को ट्रांसप्लांट नहीं किया जा सकता. इसलिए इस तरह की प्रेग्नेंसी में 'लेबर पेन' नहीं होता.

इस तरीके से पैदा हुए बच्चों को कितना ख़तरा रहता है?

इस पर डॉ. शैलेश कहते हैं, देश में ये अपनी तरह का पहला मामला है इसलिए हमारे पास पुराना अनुभव नहीं है. विश्व में भी ऐसे केवल 8 मामले ही आए हैं. उन मामलों में बच्चों में ज़्यादा दिक्कत नहीं आई है. लेकिन मां को डिलिवरी के बाद रिकवरी में 12 से 15 हफ्ते का वक़्त लगता है. हम मीनाक्षी के मामले में भी ऐसी ही उम्मीद करते हैं.

अंतरराष्ट्रीय जरनल ऑफ अप्लाइड रिसर्च के मुताबिक़ यूटेरस ट्रांसप्लांट में सात से दस लाख रुपये का ख़र्च आता है.

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