ब्रिटेन: 50 पाउंड के नोट पर भारतीय वैज्ञानिक जेसी बोस की तस्वीर छापने का प्रस्ताव क्यों किया गया

  • 28 नवंबर 2018
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Image caption जे.सी. बोस

जिस भारतीय वैज्ञानिक ने दुनिया को यह बताया था कि पेड़-पौधों में भी जान होती है, उनकी तस्वीर अब ब्रितानी मुद्रा पर छप सकती है.

बैंक ऑफ इंग्लैंड ने इस बात की घोषणा की है कि उनसे 50 पाउंड के नोट पर जगदीश चंद्र बोस की तस्वीर छापने की सिफ़ारिश की गई है.

नया नोट आने वाले सालों में जारी किया जाएगा, जिस पर किसकी तस्वीर हो, इसके लिए बैंक ने लोगों से सलाह मांगी थी.

पहले सप्ताह में बैंक को एक लाख 14 हज़ार सिफ़ारिशें मिली हैं, जिसमें भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस का नाम भी शामिल है. सुझावों में स्टीफ़न हॉकिंग, अलेक्ज़ेंडर ग्राहम बेल, पैट्रिक मूरे का भी नाम सुझाया गया है.

बैंक ने लोगों से उस वैज्ञानिक का नाम सुझाने को कहा है जिसने विज्ञान के क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया हो. सुझाव बैंक ऑफ इंग्लैंड की वेबसाइट पर 14 दिसंबर, 2018 तक दिए जा सकते हैं.

शर्त यह रखी गई है कि वो वैज्ञानिक ज़िंदा न हो और उन्होंने ब्रिटेन को वैज्ञानिक क्षेत्र में आगे रखने में मदद की हो.

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नए नोट जारी करने का फ़ैसला क्यों

बैंक का कहना है कि 50 पाउंड के क़रीब 3.3 करोड़ नोट चलन में हैं. एक साल पहले यह बात सामने आई थी कि इन नोटों का अधिकतर इस्तेमाल अपराधी प्रवृति को लोग कर रहे हैं.

अक्तूबर में सरकार ने नए नोट छापने का ऐलान किया, जो प्लास्टिक के होंगे.

फ़िलहाल 50 पाउंट के नोट पर भाप की ताक़त पहचान कर उसका इंजन बनाने वाले जेम्स वॉट और मैथ्यू बॉल्टन की तस्वीर है.

अपने समय से 60 साल आगे थे बोस

30 नवंबर, 1858 को अविभाजित भारत के बंगाल (अब बांग्लादेश) में जन्मे जगदीश चंद्र बोस पहले ऐसे भारतीय वैज्ञानिक थे, जिन्होंने अमरीकी पेटेंट पाया था.

उन्होंने न सिर्फ़ बनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण खोज की बल्कि भौतिकी के क्षेत्र में भी उनका लोहा दुनिया मानती है.

सामान्य तौर पर नोबेल पुरस्कार विजेता इंजीनियर और खोजकर्ता गुलइलमो मार्कोनी को रेडियो प्रसारण का जनक माना जाता है.

हालांकि, भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने इससे पहले मिलीमीटर रेंज रेडियो तरंग माइक्रोवेव्स का इस्तेमाल बारूद को सुलगाने और घंटी बजाने में किया था.

इसके चार साल बाद लोहा-पारा-लोहा कोहिरर टेलिफ़ोन डिटेक्टर के तौर पर आया और यह वायरलेस रेडियो प्रसारण के आविष्कार का अग्रदूत बना.

1978 में भौतिकी के नोबेल विजेता सर नेविल मोट ने कहा था कि बोस अपने समय से 60 साल आगे थे.

बोस ने बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में क्रेस्कोग्राफ़ की खोज की थी, जो पेड़-पौधों की वृद्धि को मापता है.

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भेदभाव का सामना करना पड़ा

बोस ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बंगाल में ली, इसके बाद वो कलकत्ता आ गए. यहां उन्होंने सेंट ज़ेवियर्स से स्नातक की पढ़ाई की.

यहां उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा. अंग्रेज़ बोस को प्रयोगशाला जाने से रोकते थे. उस वक़्त शैक्षणिक संस्थानों पर अंग्रेज़ों का नियंत्रण हुआ करता था.

वो इस रोक-टोक से झुके नहीं. बोस अपने घर पर ही वैज्ञानिक प्रयोग करने लगे.

22 साल की उम्र में वो चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए, मगर स्वास्थ्य ठीक नहीं होने की वजह से उन्हें लौटना पड़ा.

भारत लौटने के बाद वो कॉलेज के छात्रों को पढ़ाने लगे.

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Image caption सर जगदीश चंद्र बोस मेमोरियल, गिरीडीह

ब्रिटेन से जुड़ाव

नवंबर 1984 में उन्होंने पहली बार कोलकाता टाउन हॉव में माइक्रोवेव्स का प्रदर्शन किया. उन्होंने रेडियो तरंग माइक्रोवेव्स का इस्तेमाल बारूद को सुलगाने और घंटी बजाने में किया था.

उन्होंने वायरलेस सिग्नल भेजने के लिए पहली बार सेमीकंडक्टर का इस्तेमाल किया था. बोस ने इसे पेटेंट कराने से मना कर दिया था क्योंकि वो चाहते थे कि विज्ञान का इस्तेमाल लोगों की भलाई के लिए हो.

वो यह मानते थे कि वैज्ञानिक खोजों का इस्तेमाल पैसे बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए. हालांकि, अपने दोस्तों के दबाव में उन्होंने अमरीका में इसके पेटेंट के लिए आवेदन किया और 29 मार्च, 1904 को वो ऐसे पहले भारतीय बने, जिन्हें अमरीकी पेटेंट प्राप्त हुआ.

उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि बिना तार के केवल हवा के माध्यम से संदेश भेजे जा सकते हैं. इसी बीच वो अपने आविष्कार बिना पूरा किए यूरोप चले गए और बेतार के आविष्कार का श्रेय मारकोनी को मिल गया.

विज्ञान के क्षेत्र में दिए गए बोस के योगदानों के लिए उन्हें कई सम्मान और उपाधियां मिलीं. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'नाइट' की उपाधि दी.

यही वजह है कि ब्रिटेन के लोगों ने उन्हें 50 पाउंड के नए नोट के लिए उनके नाम को प्रस्तावित किया है.

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