साइंस कांग्रेसः आख़िर में विज्ञान ही बाज़ी मारेगा- नज़रिया

  • 9 जनवरी 2019
ड्रोन के साथ छात्राएँ इमेज कॉपीरइट Getty Images

जैसा हिंदुस्तान की बाक़ी हर बात में है, विज्ञान भी ख़ेमों में बँटा है.

बेंगलुरु, दिल्ली और इलाहाबाद की तीन अकादमी हैं, और सबसे पुराना मंच भारतीय विज्ञान कांग्रेस संघ का है, जिसकी शुरुआत कोलकाता से हुई और अब देश भर में इसकी कई शाखाएँ हैं.

औपनिवेशिक शासन के साथ आधुनिक विज्ञान भारत में आया; इसकी दिशा ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने तय की.

भारतीय वैज्ञानिकों ने जल्दी ही बागडोर सँभाल ली, जिनमें से कई राष्ट्रवादी रुझान के थे. व्यापक समाज के जाति, वर्ग, लिंग के समीकरणों में लिपटा विज्ञान तरक़्क़ी कर चला.

आज़ादी मिलने तक बहुत कम ही स्त्रियों को विज्ञान में शोध करने की नौकरी मिली. आज भी उनकी संख्या कम ही है.

देश बदल रहा है, साथ ही भारतीय विज्ञान भी बदल रहा है, हालाँकि ख़ास तौर पर ऊपरी तबक़ों में, इसे काफ़ी विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

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प्राचीन भारत और आधुनिक विज्ञान

भारतीय विज्ञान कांग्रेस की वार्षिक महासभाओं में कहीं ज़्यादा लोग शामिल हो रहे हैं, और साथ ही शोध से मिली खोजों में विविधता भी बढ़ रही है.

दशकों पहले से, ख़ास तौर पर भारतीय विज्ञान के ऊँचे तबक़ों की नज़र में इसकी गरिमा नहीं रही है और कई तो इसे एक वार्षिक मेला मानते हैं.

अकादमी-सभाओं में संभ्रांत तरीक़ों से तंत्र-मंत्र विमर्श में आ जाता है, पर साइंस कांग्रेस की सभाओं में यह ज्यादा सीधे तरीक़े से और बड़ी तादाद में दिखता है.

अब तो दिल्ली में शासक दल भी अंट-शंट विचारों का चैंपियन है.

और चूँकि पारंपरिक रूप से प्रधान मंत्री वार्षिक सभा में बोलते हैं, अब ख़बरों में प्राचीन भारत और आधुनिक विज्ञान के रिश्ते के और दावे दिखने लगे हैं.

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गंभीर वैज्ञानिक

पर ये हमेशा ही होते थे, अगर हम यह सोचें कि अचानक ये आने लगे हैं तो यह ग़लत होगा.

पहले ज्यादातर गंभीर वैज्ञानिक इन दावों को घटिया मान कर नज़रअंदाज़ कर देते थे कि आख़िर ऐसी बड़ी सभाओं में कुछ तो ऐसे परचे होंगे ही.

अब यह संघ परिवार के पुनरुत्थानवादी हो-हल्ले के साथ जुड़ गया है, इसलिए उनके दीगर हंगामों के साथ ये भी ख़बर बन गए हैं.

एक हिन्दी कवि ने इस साल की महासभा को हास्य कांग्रेस कहा है.

सही है, हम इन झूठे दावों पर हँस लेते हैं, पर यह हास्य कहाँ से आया, इस पर गंभीरता से सवाल खड़े करने पड़ेंगे.

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प्राथमिकता का मुद्दा

अकादमी के फ़ेलो और दूसरे एलीट वैज्ञानिकों को, जो ख़ुद अपनी ज़िंदगी में पोंगापंथी मान्यताओं को जीते हैं या जिनको लगता है कि ऐसी चीज़ें चलती रहती हैं और इस पर सोच कर क्या करना, उनको सोचना पड़ेगा.

पर इस तरह ख़ुद पर सोचना आसानी से नहीं होता.

जैसे-जैसे लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ मज़बूत हो रही हैं और समाज के बड़े तबक़ों की माँगें सामने आ रही हैं, भारतीय विज्ञान अपनी मीमांसात्मक मज़बूती की ओर बढ़ेगा.

संकीर्ण एलीट में अब यह चिंता गहराने लगी है कि सियासी हुक्काम पैसे काटने लगे हैं.

संघ परिवार के लिए आधुनिक तालीम वैसे ही कम प्राथमिकता का मुद्दा है, इसलिए विज्ञान में कटौती कोई अपवाद नहीं है.

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'गो' विज्ञान

सबसे उम्दा शोध-प्रयोगशालाओं में अनुदानों मं कटौती हो रही है. कुछ ख़ास क्षेत्रों को महत्व देते हुए वहाँ संसाधन बढ़ाए जा रहे हैं.

या तो चीन के साथ स्पर्धा से यह तय हो रहा है, या फिर 'गो' विज्ञान को तवज्जो दी जा रही है.

पूरी उच्च-शिक्षा को विश्व-व्यापार संगठन के गैट्स समझौते में खुले बाज़ार में लेन-देन की सामग्री की तरह लुटा देने का ख़तरा मँडरा रहा है.

सभी राज्यों में सरकारी स्कूलों को बंद कर निजी खित्ते को खुली लूट करने देने का गंभीर ख़तरा बढ़ रहा है. निजी स्कूलों में तालीम का माध्यम अंग्रेज़ी ही होता है.

शिक्षाविद् बतलाते हैं कि बच्चे को मातृभाषा में न पढ़ाने से सीखने के स्तर में गिरावट का संकट पैदा हो जाता है, वहीं देशी भाषाओं में वैज्ञानिक शब्दावली अक्सर जबड़ा तोड़ती संस्कृत का प्रपंच बन गई है.

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इंजीनियरिंग और डॉक्टरी

देश में लाखों स्वैच्छिक कार्यकर्ता विज्ञान सीखने को रोचक बनाने की कोशिश में जुटे हैं, फिर भी आज भी विज्ञान-शिक्षा परिभाषाओं और सूचना में ही जकड़ी हुई है.

किशोरों के लिए विज्ञान-शिक्षा इंजीनियरिंग और डॉक्टरी की नौकरी तक पहुँचने का साधन बन गई है. सूचना ज़रूरी है, पर विज्ञान महज़ इतना नहीं है.

क़ुदरत को अनुभव करना, देखना और इस आधार पर सिद्धांत गढ़ने का एक तरीक़ा विज्ञान है. सूचना मान कर चलें तो साथ यह सोचते हैं कि इसका मालिक कौन है.

पद्धति की तरह देखें, तो यह ऐसी मानवीय प्रवृत्ति बन कर सामने आता है, जिसकी परवरिश की गई है.

अगर हम यह जान लें कि विज्ञान महज़ सूचना या शब्द-भंडार नहीं है तो हर बात का स्रोत पुराण या शास्त्र को मानना ख़त्म हो जाएगा.

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अंट-शंट नहीं चलता...

हर इंसान में यह है, हर कोई इसे करता है और इसका मज़ा लेता है. कुछ जानवरों में भी कुछ हद तक वैज्ञानिक सोच पाई जाती है.

क्या कीजे कि अपनी सारी ख़ामियों के बावजूद, इसकी नींव तर्कशीलता में है. अंट-शंट नहीं चलता.

हुक्काम दल के मंत्री या और जो भी अपने भाँड़ों की फ़ौज के साथ हास्य चलाते रहें, विज्ञान की अंतत: जीत होगी.

आंबेडकर और भगत सिंह जैसे तर्कशील विचारकों से प्रेरित नए आंदोलनों की बढ़ती मज़बूती के साथ यही लगता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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