कलाम-सैट: इसरो लॉन्च करेगा दुनिया का सबसे हल्का उपग्रह

  • 24 जनवरी 2019
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भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो ने दावा किया है कि वह 24 जनवरी को दुनिया के सबसे हल्के उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में प्रक्षेपित करने जा रहा है.

इस सैटेलाइट का नाम कलाम-सैट वीटू रखा गया है जिसका वज़न मात्र 1.2 किलोग्राम है.

इसरो ने इस सैटेलाइट के बारे में बताया है कि इस उपग्रह से शौकिया तौर पर रेडियो सेवा चलाने वालों को अपने कार्यक्रमों के लिए तरंगों के आदान-प्रदान में मदद मिलेगी.

इसरो ने कहा है कि इस सैटेलाइट का प्रक्षेपण स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को वैज्ञानिक और भविष्य के इंजीनियर बनने के लिए प्रेरित करेगा.

इस सैटेलाइट को श्रीहरिकोटा स्पेस सेंटर से प्रक्षेपित किया जाएगा.

इसरो प्रमुख के सिवन ने दावा किया है कि "कलाम सैट दुनिया का सबसे हल्का उपग्रह है जिसे पृथ्वी की कक्षा में प्रक्षेपित किया जा रहा है."

आख़िर क्यों ख़ास है ये सैटेलाइट?

अगर इस सैटेलाइट की खूबियों की बात करें तो इस सैटेलाइट को हैम रेडियो ट्रांसमिशन (शौकिया रेडियो ट्रांसमिशन) के कम्युनिकेशन सैटेलाइट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा.

हैम रेडियो ट्रांसमिशन से आशय वायरलैस कम्युनिकेशन के उस रूप से है जिसका इस्तेमाल गैर-पेशेवर गतिविधियों में किया जाता है.

हालांकि, बीते साल एक अन्य भारतीय छात्र ने ही इससे भी हल्के उपग्रह को बनाया था जिसका वज़न मात्र 64 ग्राम था.

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इस उपग्रह को नासा ने चार घंटे के मिशन पर सब-ऑर्बिटल फ़्लाइट पर भेजा था.

सब-ऑर्बिटल फ़्लाइट के दौरान उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचते हैं लेकिन पृथ्वी की कक्षा में नहीं जाते हैं.

कलाम-सैट को चैन्नई स्थित स्पेस एजुकेशन फर्म स्पेस किड्ज़ इंडिया नाम की स्टार्ट-अप कंपनी ने बनाया है.

अब तक ऐसे ही 9 उपग्रहों को स्पेस रॉकेट्स में जगह मिल चुकी है.

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क्यों ख़ास है ये मिशन?

इंडियन स्पेस एजेंसी इस मिशन में रॉकेट के एक भाग को दोबारा इस्तेमाल करने जा रही है जिसका प्रयोग सैटेलाइट प्रक्षेपित करने में किया जाएगा.

पारंपरिक तौर पर रॉकेट के बचे-खुचे सामान का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. धरती की ओर लौटते हुए इसके कई हिस्से बिखरकर गिर जाते हैं. ईधन वाले हिस्से को भी अलग कर दिया जाता है.

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इस तरह ये सभी हिस्से अंतरिक्ष के कबाड़ के रूप में काम आते हैं.

इस समय लाखों धातु से बने उपकरण समेत दूसरी कई चीज़ें पृथ्वी के चक्कर लगा रही हैं. इनमें बेकार हुई सैटेलाइट, पुराने रॉकेटों के हिस्से और अंतरिक्ष यात्रियों की ग़लती से छूटे हुए उपकरण शामिल हैं.

अक्सर ऐसी ही चीज़ों की वजह से अंतरिक्ष में टकराव हो जाता है जिससे और ज़्यादा कबाड़ पैदा होता है.

मिशन की ख़ास बात

इस उपग्रह को इसरो के सबसे भरोसेमंद पीएसएलवी से लॉन्च किया जा रहा है जो 260 टन वाला फोर स्टेज़ रॉकेट है.

सामान्यत: इसके पहले तीन हिस्से धरती में वापस आ जाते हैं. वहीं, चौथा और पांचवा (आखिरी) हिस्सा लिक्विड प्रोपेलेंट का इस्तेमाल करता है. इन हिस्सों को कई बार बंद करके शुरू किया जा सकता है ताकि अंतरिक्ष यान सही कक्षा में पहुंच सके.

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ऐसे में इस रॉकेट के चौथे हिस्से को गुरुवार को छोड़े जा रहे सैटेलाइट के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जो उसे 277 किलोमीटर की ऊंचाई पर ले जाएगा.

लेकिन इसरो इस रॉकेट के आख़िरी हिस्से को नई क्षमताएं दे रहा है ताकि ये अंतरिक्ष में अगले दस सालों तक सक्रिय रह सके.

इसरो चीफ़ सिवन कहते हैं, "आख़िर हमें इतने बहुमूल्य संसाधन को क्यों खोना चाहिए. हमने इसके चौथे हिस्से को एक प्रयोगात्मक कक्षीय प्लेटफॉर्म में बदलने का फ़ैसला किया है ताकि अंतरिक्ष में छोटे-छोटे प्रयोग किए जा सकें."

एक पीएसएलवी रॉकेट की क़ीमत लगभग 196 करोड़ रुपए होती है.

ये प्रयोगात्मक कक्षीय प्लेटफॉर्म शोधार्थियों को ज़ीरो-ग्रैविटी जैसे वातावरण में प्रयोग करने में मददगार साबित होगा.

क़दम

ऐसे में इस रॉकेट का आख़िरी हिस्सा पृथ्वी की कक्षा में ऊंचे स्थान पर पहुंच जाएगा जहां से कलाम-सैट अपने सिग्नलों को भेजेगा.

सिवन कहते हैं, "ये पहला मौक़ा है, जब इसरो एक ऐसा प्रयोग कर रहा है जिससे एक मृत रॉकेट के हिस्से को दोबारा हासिल करके उसे ज़िंदा रखा जाएगा."

इस नए दृष्‍टिकोण से शोधार्थी अपने पेलोड और उपकरणों को लेकर लेकर कक्षा में जा सकते हैं जिसके बाद उसे मृत रॉकेट में बनी एक ख़ास जगह में लगा सकते हैं.

हालांकि, इसरो पहली ऐसी एजेंसी नहीं है जिसने बेकार हुई चीज़ों का दोबारा इस्तेमाल किया हो.

फ्रेंच स्पेस एजेंसी के अध्यक्ष जीन वेस-लेगाल कहते हैं कि उनकी संस्था ने भी इस दिशा में काम किया लेकिन "अंतरिक्ष में प्रयोग करने के लिए किफ़ायती तरीक़ा नहीं मिला."

(पल्लव बागला 'रीचिंग फॉर द स्टार्स - इंडियाज़ जर्नी फॉर मार्स एंड बियोंड' के सह लेखक हैं. इस किताब को ब्लूम्सबरी प्रकाशन ने छापा है)

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