कोरोना वायरस: कितना ख़तरनाक है 'कोरोना का कचरा' और कैसे हो रहा इसका निपटारा

  • गुरप्रीत सैनी
  • बीबीसी संवाददाता
कोरोना कचरा

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

लॉकडाउन 2 में सरकार ने घर से बाहर मास्क पहनकर निकलना अनिवार्य कर दिया है.

कल घर से बाहर निकली तो पत्तों के बीच कुछ इसी तरह से मास्क ज़मीन पर पड़े देखा.

फिर अचानक दिमाग रिवाइंड होकर फ्लैशबैक में चला गया.

ऐसी कई तस्वीरें पीटीआई के फ़ोटो जर्नलिस्ट रवि चौधरी ने ली है.

तस्वीरों को देखते ही कोरोना वॉरियर्स के जो चेहरे अब तक आपके ज़ेहन में थे, उनमें तुंरत ही एक नया चेहरा जुड़ जाता है.

वो चेहरा है, अस्पतालों से कोरोना का कचरा उठाने वाले सफ़ाई कर्मचारियों का.

इन्हें भले ही आप अब तक कोरोना की लड़ाई का महान खिलाड़ी ना मान रहे हों. पर उम्मीद है ये रिपोर्ट आपको दोबारा सोचने पर मजबूर कर दे.

कोरोना वायरस अपने साथ बहुत सारी चुनौतियां लेकर आया है. उनमें से एक है कोरोना की वजह से निकलने वाला कचरा.

कोविड-19 के ट्रीटमेंट, डायग्नोसिस और क्वारंटीन के दौरान तमाम तरह की चीज़ों का इस्तेमाल होता है.

वेस्ट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, प्रतिदिन हर राज्य से औसतन एक से 1.5 टन कोविड वेस्ट निकल रहा है.

इस कचरे के निपटारे के लिए सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने गाइडलाइन्स जारी की है.

कोविड वेस्ट की हैंडलिंग, ट्रीटमेंट और डिस्पोज़िंग का काम सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 और बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स के तहत करने के लिए कहा गया है.

अस्पतालों से निकलने वाला सभी तरह का कचरा - चाहे वो सर्जरी से निकले, या दवाइयों से, या इलाज के दौरान निकलने वाली चीज़ें हों - ये सब बायोमेडिकल वेस्ट होता है.

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सरकारी दिशा-निर्देश

सरकारी दिशा-निर्देश के मुताबिक आइसोलेशन वार्ड्स, कलेक्शन सेंटर्स, टेस्टिंग लैब में कोविड वेस्ट के लिए अलग नियम हैं और क्वारंटीन सेंटर्स और होम क्वारंटीन के लिए अलग नियम हैं.

आइसोलेशन वार्ड्स, कलेक्शन सेंटर्स, टेस्टिंग लैब: कोविड-19 वेस्ट के लिए अलग-अलग रंग के और डबल-लेयर्ड बैग या डिब्बे रखे जाने चाहिए. उन पर साफ़ तौर पर लेबल लगा होना चाहिए. जिन ट्रॉली से कोविड वेस्ट ले जाया जा रहा, उन्हें किसी दूसरे कचरे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. जो सैनिटेशन स्टाफ कोविड-19 के कचरे को हैंडल कर रहा है, उन्हें किसी और ड्यूटी पर या दूसरे कचरे को हैंडल करने के लिए नहीं लगाया जाना चाहिए.

क्वारंटीन सेंटर्स: बायोमेडिकल वेस्ट पीले बैग में इकट्ठा करना होगा. फिर उसे बायोमेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसेलिटी में भेज देना होगा. रोज़ाना के कचरे को सोलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 को ध्यान में रखकर मैनेज कर सकते हैं.

होम क्वारंटीन: जो घर पर हैं, उन्हें बायोमेडिकल वेस्ट अलग करके पीले बैग में रखना होगा. फिर ये कचरा, स्थानीय प्रशासन द्वारा नियुक्त किए गए वेस्ट कलेक्शन स्टाफ को दे देना होगा.

गाइडलाइन्स तो बन गई हैं. लेकिन इनका पालन करने में कई तरह की चुनौतियां आ रही हैं.

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कर्मचारियों की सुरक्षा

बीबीसी ने अस्पतालों में कोरोना का कचरा प्रबंधन कैसे किया जा रहा है, इस पर कई निजी अस्पतालों और सरकारी अस्पतालों से बात की. एम्स और मैक्स जैसे अस्पतालों ने बताया कि वो कलर कोडिंग वाले बैग्स में कचरा अलग रख रहे है. इसके लिए डेडिकेटेड स्टाफ भी लगाया गया है. वेस्ट मैनेजमेंट एक्सपर्ट असद वारसी भी इस बात को स्वीकार करते हैं.

गाइडलाइन्स ये भी कहती हैं कि जो कर्मचारी वेस्ट की हैंडलिंग और कलेक्शन के काम में लगे हैं. उन्हें पीपीई दी जानी चाहिए, जिसे वो हर वक्त पहनकर रखें. इसमें थ्री-लेयर मास्क, गाउन, हेवी-ड्यूटी गल्व, गम बूट्स, सेफ्टी गोगल मिलनी चाहिए. लेकिन दिक़्क़त यहीं आ रही है.

एम्स में दिल्ली अस्पताल ठेका कर्मचारी यूनियन के जनरल सेक्रेटरी मृगांक के मुताबिक, अस्पताल में अधिकतर सेनिटेशन स्टाफ कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं. दिल्ली एम्स की बात करें तो यहां करीब 600 सैनिटेशन कर्मचारी हैं.

वो कहते हैं, "अस्पताल इन्हें अपना कर्मचारी नहीं मानते. वेस्ट मैनेजमेंट के काम में लगे सेनिटेशन कर्मचारियों को मास्क और सैनेटाइज़ेशन के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है. अस्पताल में कहा गया था कि ये चीज़ें कम हैं, इसलिए पहले हम अपने स्थाई कर्मचारियों को देंगे. वेस्ट डिस्पोज़ल करने वाले सैनिटेशन स्टाफ़ को भी प्रोटेक्टिव गियर चाहिए होते हैं, ताकि वो उस वेस्ट के संपर्क में ना आ जाएं. लेकिन ये शुरू में मिल नहीं रहे थे. हमने अस्पताल प्रशासन को चिट्ठियां लिखीं. अब कुछ जगह मिलना शुरू हुए हैं. लेकिन अभी भी परेशानी बनी हुई है."

असद वारसी भी कहते हैं कि इस कचरे को इकट्ठा करके बायोमेडिकल वेस्ट फैसिलिटी तक लाने वाली वर्कफ़ोर्स और फैसिलिटी की वर्कफ़ोर्स को भी प्रोपर ट्रेनिंग और सुरक्षा किट नहीं मिल रही है.

उनका मानना है कि बड़े शहरों में तो फिर भी ये चीज़ें मिलने लगी हैं, लेकिन छोटे शहरों में इसकी कमी है.

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कॉमन बायोमेडिकल वेस्ट फैसेलिटी की कमी

कोविड वेस्ट इकट्ठा करके डेडिकेटेड गाड़ियों से कॉमन बायोमेडिकल वेस्ट फैसेलिटी ले जाया जाता है, जहां उच्च तापमान पर इस कचरे को जला दिया जाता है. लेकिन ये फैसेलिटी भी देश में हर जगह नहीं है.

असद वारसी, ऑल इंडिया कॉमन बायोमेडिकल वेस्ट फैसिलिटी एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी भी हैं.

वो बताते हैं कि देश में 200 से 250 फैसिलिटी हैं, जहां 600 से 700 शहरों के कचरे को कवर कर लेती है.

लेकिन कई छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में ये सुविधा नहीं है.

टेरी के पर्यावरण और कचरा प्रबंधन डिविजन में फ़ेलो सौरभ मनुजा कहते हैं कि भारत पहले ही अपने बायोमेडिकल वेस्ट को पूरी तरह ट्रीट नहीं कर पाता है.

2017 की एक रिपोर्ट में सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने बताया था कि हर दिन 559 टन बायोमेडिकल वेस्ट जनरेट कर रहे थे और उसमें करीब 92% के आस-पास ही हम ट्रीट कर रहे थे. प्लांट्स की कैपेसिटी कम होने की वजह से हम तब ही बाकी कचरे को ट्रीट नहीं कर पा रहे थे. अब ये चुनौती और बढ़ गई है.

हालांकि गाइडलाइन्स में कहा गया है कि कॉमन बायोमेडिकल वेस्ट फैसिलिटी को एक्स्ट्रा घंटे काम करने की अनुमति भी दी जाएगी और जहां ये फैसिलिटी नहीं है वहां गहरा गड्ढा करके कचरे को दफ़न कर दिया जाना चाहिए.

लेकिन वेस्ट एक्सपर्स के मुताबिक, कोविड-19 की वजह से जिनती बड़ी तादाद में कचरा बन रहा है, उसका प्रबंधन फिर भी चुनौती बना ही हुआ है.

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क्वारंटीन होम

प्रशासन और हेल्थ डिपार्टमेंट का कहना है कि यहां से प्रोटोकॉल के तहत वेस्ट कलेक्शन हो रहा है.

लेकिन यहां दो तरह की दिक़्क़तें सामने आ रही हैं.

इसका कोई डेटा नहीं है कि कौन-से घर क्वारंटाइन में हैं. तो वो घर के बाहर लगाए गए क्वारंटाइन स्टीकरों के देखकर काम कर रहे हैं. अगर स्टीकर नहीं हैं या स्टीकर हटा दिए गए हैं तो यहां समस्या हो सकती है.

साथ ही उन घरों में जाकर चेक नहीं किया जाता कि वो लोग कोविड-वेस्ट को अलग करके रख रहे हैं या नहीं.

सामान्य लोगों और घरों की समस्या

आम लोग, पुलिस, प्रशासन के लोग भी कोरोना वायरस से बचने के लिए मास्क, गल्व जैसी चीज़ों का लगातार इस्तेमाल कर रहे हैं.

घरों में कचरा एक साथ इकट्ठा किया जाता है. घरों का कचरा कलेक्ट करने का भी कोई प्रॉपर सिस्टम नहीं है. बड़े शहरों में तो फिर भी कुछ सिस्टम है, लेकिन छोटे और ग्रामीण इलाकों में ऐसा कोई प्रॉपर सिस्टम नहीं है.

ऐसी कई तस्वीरें भी देखने को मिली हैं कि सार्वजनिक जगहों पर या सड़कों पर इस्तेमाल कर फेंके गए मास्क या गल्व्स मिले हैं.

वहीं टेरी के पर्यावरण और कचरा प्रबंधन डिविजन में फ़ेलो सौरभ मनुजा कहते हैं कि घरों से जो जनरल कचरा निकल रहा है, "उसमें प्लास्टिक, कार्ड बोर्ड मेटल जैसी चीज़ें भी होती हैं, जिनके ऊपर कोरोना वायरस रह जाता है. इस वायरस की लाइफ 24 से 72 घंटे के बीच की है. इससे कचरा इकट्ठा करने वाले लोगों को इंफेक्शन हो सकता है. इससे कोरोना वायरस फैलने सी संभावना बहुत बढ़ सकती है."

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हरियाणा में कोरोना के नोडल ऑफिसर ध्रुव चौधरी कहते हैं कि ये एक बड़ी चुनौती है. क्योंकि भारत में गीला कचरा, सूखा कचरा अलग करके रखने तक का चलन नहीं है, तो बायोमेडिकल वेस्ट को अलग करके रखना तो एक और बड़ी चुनौती है.

वो कहते हैं, "लोगों का रहन सहन का तरीका ऐसा ही रहा है कि वो सारा कचरा एक साथ इकट्ठा करते हैं. उस तरीके को एकदम से नहीं बदला जा सकता. उसे बदलने में वक़्त लगेगा. लेकिन उम्मीद है वक़्त के साथ ये बदलाव आएगा. प्रशासन इसमें कोशिश कर रहा है."

हल क्या हो सकता है?

वेस्ट एक्सपर्ट्स कहते हैं कि लोगों को जागरुक किए जाने की ज़रूरत है.

उन्हें कचरा अलग-अलग करके रखने के लिए कहा जाए. उसे अलग करके ही कलेक्ट करने का सिस्टम बनाया जाए.

लोगों को बताया जाए कि इस वायरस की शेल्फ लाइफ 72 घंटे यानी लगभग तीन दिन तक की है. इसलिए वो कोविड वेस्ट को डस्टबिन में अच्छी तरह बैग या पॉलिथिन में एयरटाइट बंद करके 72 घंटे के लिए छोड़ दें, ताकि वो किसी के संपर्क में ना आए. फिर उस कचरे को वेस्ट कलेक्टर को दें, ताकि कोरोना के इस ज़रिए को रोका जा सके.

साथ ही दफ़्तरों और काम की जगहों पर भी अलग-अलग तरह के कचरे के लिए अलग-अलग थैले लगाए जाएं.

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