आंतरिक सुदृणता के लिए बद्धकोणासन

  • 2 जुलाई 2009
बद्ध कोणासन
Image caption गर्भवती महिलाएँ भी बद्ध कोणासन का अभ्यास कर प्रसव की पीड़ा को कम कर सकती हैं

बद्ध कोणासन चिकित्सा की दृष्टि से तो उपयोगी है ही इसके अतिरिक्त गर्भवती महिलाएँ भी बद्ध कोणासन का अभ्यास करके प्रसव की पीड़ा को कम कर सकती हैं.

बद्ध कोणासन की प्रारंभिक स्थिति तितली आसन जैसी ही है. गर्भवती महिलाएँ इन दोनो आसनों का अभ्यास डॉक्टर और योग शिक्षक की सलाह लेकर पहले 6 महीने तक कर सकती है.

गर्भवती महिलाएँ विशेष ध्यान रखें कि वे बद्ध कोणासन में आगे की तरफ़ ना मुड़ें. उन्हें केवल बैठने का अभ्यास ही करना है और रीढ़ को सीधा रखना है ठीक उसी तरह जिस तरह तितली आसन में बैठा जाता है.

इसके अतिरिक्त पद्मासन में बैठकर पर्वतासन का अभ्यास करना भी सरल है. वैसे सभी वर्ग के लोग पर्वतासन का अभ्यास कर सकते हैं.

विधि

दोहरा कंबल बिछाएँ, दोनो पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएँ. सबसे पहले दोनों घुटनों को मोड़ते हुए पैरों के पास लाएँ और दोनों पैरों के तलवें आपस में मिला लें.

दोनों हाथों की अँगुलियों को आपस में इंटरलॉक कर लें, पैरों की अँगुलियों को दोनों हाथों से पकड़ लें और रीढ़ को सीधा रखें जैसे तितली आसन में बैठा जाता है. बाज़ू की सीधा कर लें और पैरों को ज़्यादा से ज़्यादा अपने पास में लाने का प्रयास करें ताकि पूरा शरीर तन जाए. यह इस आसन की प्रारंभिक स्थिति है.

गहरी सांस भरें और साँस निकालते हुए धीरे-धीरे कमर से आगे इस प्रकार झुकें कि रीढ़ और पीठ की माँसपेशियों में खिंचाव बना रहे.

प्रयास करें की आपका माथा ज़मीन से स्पर्श हो जाए. अगर ये संभव ना हो तो अपनी ठुड्डी को पैरों के अँगूठे से साँस को सामान्य कर लें. अंत में साँस भरते हुए वापस प्रारंभिक स्थिति में आ जाएँ.

दो या तीन बार इस आसन का अभ्यास करें.

लाभ -

जो बद्ध कोणासन का अभ्यास करते हैं उन्हें किडनी, यूरीनरी ब्लैडर और प्रोस्टेट की समस्या नहीं होती.

बद्ध कोणासन श्याटिका के दर्द को दूर करने में सहायक है. जो इस आसन का नियमित अभ्यास करते हैं उन्हें भविष्य में हर्निया की समस्या भी नहीं होती.

गर्भवती महिलाएँ भी बद्ध कोणासन को नियमित रूप से एक या दो मिनट तक बैठने का अभ्यास कर सकती हैं. गर्भवती महिलाएँ सिर्फ़ बैठने का ही अभ्यास करेंगी, आगे की ओर बिल्कुल नहीं झुकेंगी.

अगर किसी प्रकार की शंका हो तो अपने डॉक्टर और योग शिक्षक की सलाह ले सकती हैं. इस आसन के अभ्यास से प्रसव के दौरान कम से कम पीड़ा होगी.

पर्वतासन

विधि

पालथी मारकर बैठ जाएँ. रीढ़ को सीधा रखें, दोनों हाथों की अँगुलियों को इंटरलॉक करें, हथेली को पलट कर सिर के ऊपर लाएँ. यह इस आसन की प्रारंभिक स्थिति है.

Image caption पर्वतासन के अभ्यास से कंधो की जकड़न और कंधों के जोड़ों को दर्द दूर होती है

पर्वतासन करने के लिए हाथों को ऊपर की ओर खींचे, बाजू सीधा कर लें. कंधे, बाज़ू और पीठ की माँसपेशियों में एक साथ खिंचाव को महसूस करें.

इस स्थिति में एक से दो मिनट तक रूकें, गहरी सांस लें और निकालें. अंत में हाथों को नीचे कर लें. पैरों की स्थिति बदिलए और एक बार फिर से पर्वतासन का अभ्यास करें. रीढ़ को हमेशा सीधा रखिए.

लाभ

पर्वतासन के अभ्यास से कंधो की जकड़न और कंधों के जोड़ों को दर्द दूर होता है. साथ ही साथ रीढ़ के सभी जोड़ों के बीच का तनाव कम होता है. फलस्वरूप तंत्रिकाओं में एक प्रकार की स्फ़ूर्ति बनी रहती है और मन प्रसन्न रहता है.

पर्वतासन करने से ना सिर्फ़ साँस लेने में अधिक सुविधा होती है, बल्कि फेंफड़ों की क्षमता बढ़ती है. दरअसल जब हाथों को ऊपर की ओर खींचा जाता है तब पेट की माँसपेशियों में हल्का सा खिंचाव बना रहता है और छाती चौड़ी हो जाती है, जिससे फेंफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ जाती है और सांस भरने और निकालने में सुविधा होती है.

गर्भवती महिलाएँ भी पहले 6 महीने तक इस आसन का अभ्यास कर सकती हैं. इस आसन के अभ्यास से तंत्रिकाओं में चुस्ती स्फ़ूर्ति बनी रहती है.

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