खुशियाँ बाँटने की एक कोशिश

  • 31 अगस्त 2009
sanjna goyal, muscular dystrophy
Image caption मरीज़ों और उनके परिजनों को जागरूक करना ही है ध्येय.

"जब मुझे अपनी बीमारी के बारे में पता लगा उस वक़्त मैं सिर्फ़ 13 साल की थी लेकिन कुछ समय बाद ही मैंने इस सच को स्वीकार कर लिया और हार मानने की बजाय इससे लड़ने और मरीज़ों के जीवन में रंग भरने की ठान ली."

यह कहना है धीरे-धीरे माँसपेशियों को बेकार कर देने वाली बीमारी मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी की मरीज़ और मरीज़ों की मदद करने के लिए बने संगठन इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी (आईएएमडी) की अध्यक्ष संजना गोयल का.

आईएएमडी का गठन आंध्र प्रदेश के जनार्दन राव ने किया था जो इसी बीमारी से पीड़ित अपने बेटे की मौत के बाद ज़िंदग़ी से बेज़ार हो चुके थे. संजना से मिलने के बाद उन्होंने 1992 में इस संगठन की कमान उन्हें सौंप दी और संजना इस संगठन के माध्यम से जनसेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बनाकर मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी से जूझ रहे लोगों की सेवा में लग गईं.

संगठन के माध्यम से संजना ने सबसे पहले हिमाचल प्रदेश में इसके मरीज़ों की तलाश की फिर बाद में पूरे उत्तर भारत की कमान थामी. और अब उनका संगठन पूरे भारत में फैले मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी के मरीज़ों के लिए काम कर रहा है.

संजना कहती हैं, "मैं चाहती हूँ कि इस बीमारी से पीड़ित लोग किसी पर बोझ या दया के पात्र न बनें. हर व्यक्ति अपना काम खुद करे और किसी न किसी तरह स्वाबलंबी बने."

भारत के हर कोने के लोग एसोसिएशन के सदस्य हैं. एसोसिएशन ज़िंदग़ी से बेज़ार हो चुके रोगियों को मुस्कुराहट बाँटने में लगा है और संगठन में ऐसे लोगों को भी शामिल किया जा रहा है जो इस बीमारी से जूझ रहे लोगों की उनकी ज़रूरत के अनुसार अलग अलग समय पर मदद कर सकें.

संजना कहती हैं, "देश के हर नागरिक को खुलकर जीने और खुशियाँ बटोरने का अधिकार है तो फिर इस मर्ज़ से पीड़ित लोग ही इससे अछूते क्यों रहें."

इसी सोच के चलते संगठन की ओर से हर साल देश के अलग अलग हिस्सों में समर कैंप का आयोजन किया जाता है जिसका उद्देश्य लोगों में इस बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाना और मरीज़ों में खुशी, उत्साह और स्फ़ूर्ति का संचार करना है.

Image caption मस्कुलर डिस्ट्रॉफञी के मरीज़ चले मस्ती करने.

ऐसे कैंपों में मरीज़ों के लिए अनेक तरह के फ़न गेम्स और वाटर गेम्स आयोजित किए जाते हैं ताकि साल में कम से कम एक बार सारे मरीज़ एकत्रित होकर अपनी बीमारी के बारे में भूल कर मस्ती कर सकें.

शिविर में आए नए मरीज़ों को संगठन में रजिस्टर किया जाता है और उन्हें उनकी बीमारी से जूझने के लिए विस्तृत जानकारी, डॉक्टर की सलाह, मनोरंजन के साधन, नई तकनीक की यानी पावर्ड व्हीलचेयर और पढ़ने लिखने या अपना काम करने के लिएआर्थिक मदद समेत हर संभव मदद दी जाती है.

इसके अलावा संगठन की ओर से इस बीमारी के लिए अब तक मौजूद एकमात्र उपाय यानी फ़िज़ियोथेरेपी भी मरीज़ों के घर घर जाकर करवाई जाती है. इस कार्यक्रम को पुनरुत्थान का नाम दिया गया है.

अहमदाबाद आईआईएम के प्रकाशन विभाग में काम करने वाली निष्ठा ठक्कर भी मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी की मरीज़ हैं. वे कहती हैं, "संजना और उनकी एसोसिएशन की वजह से ही मेरे अंदर इतना आत्मविश्वास आया है कि मैं भी कुछ कर सकती हूँ."

उनका मानना है कि उनका दृष्टिकोण तो पहले भी सकारात्मक था लेकिन संजना से मिलने और उनकी एसोसिएशन के कैम्प में भाग लेने के बाद उन्हें भी दूसरे मरीज़ों की मदद करने की प्रेरणा मिली. उन्होंने कहा, "वर्ष 2008 में जब अहमदाबाद में पहले कैम्प का आयोजन हुआ तो उसके बाद तो मैंने गुजरात में एसोसिएशन की अलग शाखा ही बना ली." अब गुजरात राज्य का पूरा कार्यभार निष्ठा ही देखती हैं.

संजना सरकार से नाराज़गी जताते हुए कहती हैं, "सरकार ने पोलियो और दूसरी विकलांगताओं पर तो काफ़ी ध्यान दिया है और इन बीमारियों और विकलांगताओं के आँकड़े भी सरकार के पास हैं. इनसे बचने के भी सरकारी स्तर पर अनेक उपाय और प्रयास किए गए हैं लेकिन कुछ मामूली अपंगताओं के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा ख़तरनाक बीमारी मस्कुलर डिस्ट्राफ़ी के लिए सरकार की ओर से ऐसे कोई उपाय या प्रयास अब तक नहीं किए गए हैं."

वर्ष 1995 के अपंगता कानून में सुधार के साथ इस बीमारी को देश की अपंगताओं की श्रेणीमें दर्ज करवाने के लिए आईएएमडी की ओर से संजना अनेक बार सरकारी मंत्रालयों में जाकर मिलीं और हज़ारों पत्र लिखे गए लेकिन अनेक आश्वासन मिलने के बावजूद उन्हें इस बारे में अब तक कोई परिणाम हासिल नहीं हुआ.

Image caption देश में मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी के बारे में जागरूकता बहुत कम है.

संजना कहती हैं, "मुझे लिंब गर्डल मस्कुलर डिस्ट्राफ़ी है जिसमें कंधों और पैरों के जोड़ों को हिलाना बहुत कठिन होता है. इसमें मरीज़ जब तक बैठा रहता है, तब तक वह ठीकठाक लगता है और यदि उसे सहारा देकर उठा दिया जाए तो वह कुछ देर तक खड़ा रह पाता है. इसलिए दूसरे अनेक मरीज़ों को देखकर मुझे लगता है कि मैं तो बहुत बेहतर स्थिति में हूँ. यही वजह है कि मुझे जब भी देश में कहीं भी मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी के मरीज़ के बारे में पता लगता है तो मैं तुरंत ही मदद के लिए उसके पास पहुँच जाती हूँ."

इस क्षेत्र में संजना को उनके उल्लेखनीय काम के लिए रॉयन फ़ाउंडेशन की ओर से "वुमेन ऑफ़ द सब्स्टेंस अवार्ड" के अलावा राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला है.

दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के जेनेटिक मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ आईसी वर्मा कहते हैं, "वैसे तो इस बीमारी के सही सही आँकड़े उपलब्ध नहीं है लेकिन हमारे और दूसरे डॉक्टरों के पास आने वाले मरीज़ों की संख्या के आधार पर लगाए गए एक अंदाज़ के अनुसार भारत में मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी से पीड़ित क़रीब ढाई से तीन हज़ार बच्चे हर साल पैदा होते हैं."

उनके अनुसार, "मस्कुलर डिस्ट्राफ़ी किसी भी व्यक्ति के जीन के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचने वाली ऐसी बीमारियों का समूह है जो किसी भी पीढ़ी में माँसपेशियों की विकृति के रूप में सामने आ सकती है."

उन्होंने बताया, "आमतौर पर मस्कुलर डिस्ट्राफ़ी 12 प्रकार की होती है. इस बीमारी में व्यक्ति की माँसपेशियाँ धीरे धीरे कमज़ोर होते हुए अंततया बेकार हो जाती हैं जबकि उसका मस्तिष्क एक आम आदमी की तरह काम करता रहता है."

मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी के शुरूआती लक्षणों के बारे में डॉ वर्मा बताते हैं, "यूँ तो शुरूआत में बच्चे में इसके लक्षण जल्दी पता नहीं लगते लेकिन अगर कोई बच्चा समय से खड़ा नहीं हो पा रहा है और लगातार गिरता रहता है तो उसके खून का परीक्षण करवा लिया जाना चाहिए कि कहीं उसे यह बीमारी तो नहीं है."

दिल्ली के एक बैंक में मैनेजर और मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी के शिकार वीरेन्द्र कालरा कहते हैं, "एसोसिएशन के कैंप में जाने के बाद जो सबसे बड़ी बात हुई वह यह कि जीवन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास आया. एसोसिएशन के ‘विंग’ नाम के कार्यक्रम में मरीज़ों को पावर्ड व्हीलचेयर दी जाती है जो इस बीमारी के मरीज़ों के लिए बेहद ज़रूरी होती है. नई तकनीक की पावर्ड व्हीलचेयर मिलने के बाद मरीज़ की ज़िंदग़ी ही बदल जाती है. उसमें अपना काम खुद करने का विश्वास पैदा होता है. वह बाहर जाकर अपना काम खुद कर सकता है."

Image caption कोई बच्चा समय पर ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा है तो उसके खून का परीक्षण करवा लिया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "इसके अलावा एसोसिएशन ने जगह जगह पर सामान्य लोगों को जोड़कर मरीज़ों की मदद करने का जो काम किया है वह बेहद उल्लेखनीय है. इस बीमारी के मरीज़ अपना काम खुद नहीं कर पाते हैं. ऐसे में उनके रिश्तेदारों के लिए वे बोझ के समान बन जाते थे. एसोसिएशन के माध्यम से बहुत से लोग मरीज़ों की मदद करने के लिए आगे आए हैं. लोग अतिरिक्त समय निकाल कर मरीज़ों की पढ़ाई कराने, उन्हें उनके गंतव्य तक पहुँचाने इत्यादि के रूप में बहुत मदद कर रहे हैं जो मरीज़ों और उनके परिजनों को बहुत राहत देता है."

मस्कुलर डिस्ट्राफ़ी के बारे में नोएडा के डॉ मेजर जनरल ऋषि के गुप्ता का कहना है, "डेशने मस्कुलर डिस्ट्राफ़ी के लक्षण बचपन में ही नज़र आने लगते हैं. डिस्ट्राफ़ी का यह प्रकार आमतौर पर सिर्फ़ पुरुषों में ही पाया जाता है जबकि महिलाएँ इसकी कैरियर होती हैं यानी महिलाओं की आने वाली पीढ़ी में इसके लक्षण पहुँच सकते है."

उन्होंने कहा, "अनेक प्रकार की जाँचों के बाद इस रोग की पुष्टि होती है. अब तो इसकी जाँच गर्भ में भी कर ली जाती है जिससे पता लग सकता है कि गर्भ में पल रहे भ्रूण को मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी है या नहीं."

चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफ़ेसर विपिन कौशल भी मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी के मरीज़ हैं. वे कहते हैं, "एसोसिएशन के कैंपों में शामिल होने का सबसे बड़ा फ़ायदा जो मिलता है वह यह कि व्यक्ति अपने जैसे अनेक लोगों से मिलता है तो उसे लगता है कि वह अकेला नहीं है. कैंप में जाकर लोग खुद को अधिक ऊर्जावान महसूस करते हैं और जीने की इच्छा बलवती हो जाती है."

उन्होंने कहा, "आईएएमडी ने सबसे अच्छा काम यह किया है कि इस बीमारी के बारे में देश में बहुत जागरूकता पैदा की. इससे पहले लोगों तो क्या बहुत से डॉक्टरों तक को इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं थी. यह जागरूकता पैदा करना ही अपने आम में बहुत बड़ी बात है. इससे पहले तो लोग अपने बच्चे के ठीक से चल न पाने को उसकी कमज़ोरी मान लेते थे और बिना किसी इलाज के उसे मरने के लिए छोड़ देते थे लेकिन अब कैंपों में मरीज और उनके परिजनों को इस बीमारी के बारे में सारी जानकारी दी जाती है और उनकी शंकाओं का निवारण किया जाता है. यहाँ तक कि किसी को पैसों की ज़रूरत हो तो उसे भी किसी न किसी तरह से पूरा कराया जाता है."

संबंधित समाचार