कलर ब्लाइंडनेस का इलाज संभव

कलर ब्लाइंडनेस टेस्ट
Image caption बंदरों में जीन थेरेपी सफ़ल हुई है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि वे जीन थेरेपी का इस्तेमाल कर कलर ब्लाइंडनेस का इलाज करने के क़रीब पहुँच गए हैं.

इस तरह का प्रयोग बंदरों पर सफ़ल साबित हुआ है और उम्मीद की जा रही है कि अब जीन थेरेपी से मनुष्यों में भी इस बीमारी का इलाज हो सकेगा.

कलर ब्लाइंडनेस (रंगांधता) एक ऐसी बीमारी है जो जन्म से ही होती है. इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति लाल और हरे रंग में भेद नहीं कर पाता.

एक अमरीकी टीम ने जन्म से ही रंगांधता (कलर ब्लाइंडनेस) से पीड़ित बंदरों का इलाज जीन थेरेपी से शुरू किया और ये बंदर लाल और हरे रंग में भेद करने लगे.

वॉशिंगटन यूनीवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इलाज के दौरान जिस तकनीक का इस्तेमाल किया उसका विवरण 'नेचर' पत्रिका में प्रकाशित किया गया है.

अब तक ये माना जाता रहा है कि वयस्कों के मस्तिष्क में इस तरह का बदलाव करना संभव नहीं है जिससे रंगांधता से पीड़ित व्यक्ति हर रंग की पहचान करना शुरु कर दे.

बीमारी का पता चलने पर शिशुओं में विजुअल रिसेप्टर लगा कर इस बीमारी का इलाज होता आया है लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि इस बीमारी का पता ज़्यादातर मामलों में बड़ा होने पर ही चलता है.

नए प्रयोग में बंदरों की आँखों के पीछे स्थित प्रकाश संवेदी कोशिकाओं में जीन डाले गए. इन जीनों में वो ज़रूरी डीएनए कोड था जो लाल और हरे रंगों का अंतर समझने में सक्षम बनाता है.

दो वर्षों तक चले प्रयोग के बाद बंदरों में ये बीमारी ख़त्म हो गई.

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