सूचना क्रांति के लिए नोबेल सम्मान

Image caption सीसीडी ने डिजिटल तकनीक को घर-घर तक पहुँचा दिया

चार्ल्स काओ, विलार्ड बोएल और जॉर्ज स्मिथ को इस वर्ष का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया जाएगा.

काओ को फ़ाइबर ऑप्टिक (काँच के बारीक धागे) तकनीक के विकास में अहम योगदान के लिए यह सम्मान दिया जा रहा है, फ़ाइबर ऑप्टिक के बिना सूचना क्रांति शायद संभव नहीं हो पाती.

अमरीका में रहने वाले बोएल और स्मिथ को चार्ज्ड कपल्ड डिवाइस (सीसीडी) के आविष्कार के लिए नोबेल पुरस्कार देने का फ़ैसला किया गया है.

सीसीडी में रोशनी का पता लगाने वाला एक डिटेक्टर होता है जो आजकल लगभग हर डिजिटल कैमरे का मुख्य हिस्सा होता है.

नोबेल पुरस्कार देने वाली संस्था, रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ का कहना है कि काओ को इनामी राशि का पचास प्रतिशत हिस्सा दिया जाएगा, जबकि आधी राशि बोएल और स्मिथ के बीच बाँटी जाएगी.

काओ का जन्म शंघाई में हुआ था और वे ब्रितानी-अमरीकी नागरिक हैं.

स्वीडिश एकेडमी का कहना है कि "1960 के दशक में काओ ने फा़इबर ऑप्टिक के बारे में जो नई बातें सामने रखी थीं उसी की वजह से दुनिया भर के वैज्ञानिकों को इसका इस्तेमाल सूचना क्रांति के लिए करने की प्रेरणा मिली, फ़ाइबर ऑप्टिक के ज़रिए रोशनी को बहुत लंबी दूरी तक भेजा सकता है जो पहले संभव नहीं था".

बुनियादी सुधार

काओ के नेतृत्व में काम करने वाली टीम ने फ़ाइबर बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ग्लास में बुनियादी बदलाव किए जिससे उसकी क्षमता कई गुना बढ़ गई.

सिर के बालों जितने पतले केबलों के ज़रिए दुनिया भर में आंकड़ों और सूचनाओं का द्रुत गति से आदान-प्रदान होता है, इसके बिना अंतरराष्ट्रीय टेलीफ़ोन सेवाओं और हाइ स्पीड ब्रॉडबैंड की कल्पना करना मुश्किल है.

Image caption फ़ाइबर ऑप्टिक ने इंटरनेट को बहुत तेज़ बना दिया

अमरीका में न्यूजर्सी की बेल लेबोरेट्रीज़ में काम करने वाले बोएल और स्मिथ ने पहला डिजिटल लाइट सेंसर यानी सीसीडी 1969 में बनाया था.

सीसीडी अल्बर्ट आइंस्टीन के फोटोइलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट के सिद्धांत पर आधारित है, किसी वस्तु पर पड़ने वाली रोशनी की किरण उसके इलेक्ट्रॉन्स को छेड़ती है, सीसीडी इलेक्ट्रॉन्स में हुए बदलाव को दर्ज करता है और उसे एक इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल में बदल देता है.

असली चुनौती एक इमेज सेंसर बनाने की थी जिसके ज़रिए इन इलेक्ट्रॉनिक सिग्नलों को तस्वीरों में तब्दील किया जा सके, इसके लिए पिक्सेल पद्धति बनाई गई जो बहुत कम समय में बहुत सारे अति-सूक्ष्म बिंदुओं की मदद से तस्वीर बनाती है.

नोबेल सम्मान देने वाली समिति का कहना है कि "बोएल और स्मिथ ने इस चुनौती से निबटने के क्रम में एक क्रांतिकारी काम कर दिखाया, उन्होंने रोशनी को फ़िल्म पर पकड़ने के बदले इलेक्ट्रॉनिक तरीक़े से पकड़ने का रास्ता खोल दिया."

इस टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल करोड़ों लोग न सिर्फ़ फोटो खींचने के लिए कर रहे हैं बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधानों में इसकी बहुत अहम भूमिका है, अंतरिक्ष असुंधान से लेकर मेडिकल टेक्नॉलॉजी तक में.

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