अब धरती की रक्षा भगवान के भरोसे

  • 2 नवंबर 2009
Image caption उम्मीद है कि अरबों लोग इस आंदोलन के साथ जुड़ेंगे.

जलवायु समझौते पर राजनेताओं को नाउम्मीद होता देख अब दुनिया के धर्मगुरू एकत्रित हो रहे हैं पृथ्वी को बचाने के लिए कुछ नायाब तरीकों के साथ.

एक ओर सोमवार से बार्सिलोना में संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन पर एक अहम बैठक की शुरूआत हो रही है जिसमें कोशिश है कि दिसंबर में होनेवाले कोपेनहेगेन बैठक के लिए किसी साझा मसौदे पर सभी देशों के बीच कोई सहमति बन जाए.

वहीं दूसरी ओर नाउम्मीदी के इस माहौल में ब्रितानी राजघराने के आधिकारिक निवास विंडसर कासल में दुनिया के अलग अलग धर्मों के दो सौ धर्मगुरू जमा हुए हैं.

ये अगले तीन दिनों तक एक साझा रणनीति तय करेंगे जिसके तहत वो अपने अनुयायियों को प्रेरित करेंगे धरती के बढ़ते तापमान को रोकने के लिए कदम उठाने को.

इसके आयोजकों का कहना है कि इस सम्मेलन को संयुक्त राष्ट्र का समर्थन प्राप्त है आमलोगों का आज तक का ये सबसे बड़ा जलवायु आंदोलन है.

पृथ्वी प्रतिज्ञा

ये धर्मगुरू अरबों लोगों का प्रतिनिधत्व कर रहे हैं और उनकी तरफ़ से वो प्रतिज्ञा करेंगे जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए उठाने वाले कदमों की.

विंडसर से बीबीसी संवाददाता क्रिस्टोफ़र लैंड्यू का कहना है कि शुरूआत से पहले ही कुछ प्रतिज्ञा सामने आ चुके हैं.

चीन के ताओ मंदिर सौर उर्जा से चलेंगे, इसरायल में यहूदी मांस खाना कम कर देंगे, तनज़ानिया में ईसाई 80 लाख पेड़ लगाएंगे, धार्मिक ग्रंथों को पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचानेवाले कागज़ों पर छापा जाएगा.

ये धर्मगुरू अपने अनुयायियों के बीच पर्यावरण के प्रति और चेतना पैदा करने की प्रतिज्ञा भी कर चुके हैं.

आयोजकों को उम्मीद है कि इस सम्मेलन से राजनेताओं को भी कोपेनेहेगेन की बैठक से पहले एक स्पष्ट संदेश जाएगा कि पर्यावरण को बचाने के लिए वो एक समझौते पर पहुंचें.

मुख्य तौर पर मतभेद इस बात से है कि विकसित देश पृथ्वी का तापमान बढ़ानेवाले ग्रीनहाउस गैसों में किस स्तर की कटौती करें.

सहमति इस पर भी नहीं बन पाई है कि विकसित देश विकासशील देशों को ग्रीनहाउस गैसों में कटौती के लिए कितनी आर्थिक मदद दें.

इसके अलावा विकासशील देश किस हद तक कटौती करेंगे उसका भी मापदंड नहीं तय हो पाया है.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून के उस बयान से और नाउम्मीदी पैदा हुई है जिसमें उन्होंने कहा है कि कोपेनहेगेन में कानूनी रूप से बाध्य कोई समझौता हो पाए इसके आसार नहीं हैं.

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