निमोनिया के ख़िलाफ़ नई जंग

Image caption निमोनिया से मरनेवाले 98 प्रतिशत बच्चे विकासशील देशों से हैं.

दुनिया में हर साल लगभग बीस लाख बच्चे निमोनिया का शिकार बनते हैं. इसे रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संघठन एक नए अभियान की शुरूआत कर रहे हैं.

स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि कुछ छोटे-छोटे कदमों से साल 2015 तक पचास लाख बच्चों को निमोनिया से होनेवाली मौत से बचाया जा सकेगा.

पैसे कम हैं

लेकिन एड्स या मलेरिया के मुक़ाबले इस बीमारी से लड़ने के लिए जो आर्थिक कोष है वो बहुत कम है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र ने इससे लड़ने के लिए 39 अरब डॉलर की मांग की है.

उनका कहना है कि निमोनिया से मरनेवाले बच्चों की संख्या मलेरिया, मीज़ल्स और एड्स सबको मिलाकर होनेवाली मौतों की संख्या से भी ज़्यादा है.

इस बीमारी की चपेट में सबसे ज़्यादा पांच साल से कम उम्र वाले बच्चे आते हैं.

बच्चों से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र संस्था यूनिसेफ़ के लिए काम करनेवाली डॉक्टर ऐन गोलाज़ का कहना है कि इसे रोकने की दिशा में सबसे पहला कदम होगा उनकी माताओं को शिक्षित करना जिससे वो इसके लक्षणों को फ़ौरन समझ सकें.

स्वास्थ्य शिक्षा और प्रशिक्षण के अलावा इस अभियान में मीज़ल्स जैसी बीमारियों के ख़िलाफ़ टीकाकरण पर भी ज़ोर होगा क्योंकि इससे निमोनिया का ख़तरा रहता है.

साल 2000 में बच्चों को निमोनिया से बचाने वाला एक टीका उपलब्ध है लेकिन ये केवल विकसित देशों में है.

निमोनिया से होनेवाली 98 प्रतिशत मौतें विकासशील देशों के बच्चों की होती हैं.

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