पर्यावरण सम्मेलन से पहले शंकाएँ

प्रदर्शन
Image caption पर्यावरण कार्यकर्ता विकसित देशों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं

संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी का कहना है कि अगले महीने जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन में होने वाले सम्मेलन में ऐसी कोई संधि नहीं होने जा रही है जो क़ानूनी रुप से बाध्यकारी हो.

हालांकि उनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन पर एक राजनीतिक सहमति बन सकती है जो अगले कुछ महीनों में क़ानूनी संधि के लिए रास्ता बनाए.

विकासशील देश और पर्यावरण कार्यकर्ता इस देरी से नाराज़ हैं और कह रहे हैं कि इससे धनी देशों की छवि पर नाकारात्मक असर पड़ रहा है.

संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन पर वार्ताओं का नेतृत्व कर रहे यो दे बोर ने बीबीसी को बताया कि कार्बन के उत्सर्जन में कटौती करने और ग़रीब देशों को धन मुहैया करवाने के मुद्दे पर सहमति बनाने के लिए वार्ताकारों को ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी है.

इस बीच यह ख़बर भी आई है कि कोपेनहेगन के लिए समय सीमा ख़त्म होने से पहले यह संभव नहीं दिखता कि अमरीका एक प्रभावकारी पर्यावरण क़ानून को पारित करवा सकेगा.

उनका कहना है कि कठिन लक्ष्यों पर और आर्थिक सहायता के मुद्दे पर राजनीतिक समझौता हो जाएगा और इसके कुछ महीनों बाद क़ानूनी रुप से बाध्यकारी संधि हो सकती है.

लेकिन इस चर्चा में हिस्सा ले रहे दूसरे अधिकारियों का कहना है कि क़ानूनी रुप से बाध्यकारी संधि के लिए एक साल का समय भी लग सकता है.

संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख वार्ताकार बोर का कहना है कि संधि में हो रही देरी राजनीतिक वास्तविकता का परिचायक है लेकिन इससे प्रक्रिया पटरी से नहीं उतरेगी.

उन्होंने कहा, "यदि कोपेनहेगन में धनी देशों के लिए उत्सर्जन की सीमा और आर्थिक सहायता पर बात साफ़ हो जाए और यदि विकासशील देशों को इसमें शामिल किया जा सके तो इसे आवश्यक राजनीतिक शब्दावली में ढालने में थोड़ा सा वक़्त और लगेगा. "

लेकिन इस देरी से विकासशील देश और पर्यावरण कार्यकर्ता ख़ुश नहीं हैं. उनका कहना है कि इससे औद्योगिक देशों में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी दिखती है.

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