क्या 'सूखने' लगा है चेरापूंजी?

चेरापूंजी
Image caption बादल कहाँ गए ! (तस्वीर- शुभमय भट्टाचार्य)

कभी दुनिया में सर्वाधिक वर्षा वाली जगह के रूप में चर्चित चेरापूंजी में साल-दर-साल कम बारिश हो रही है. एक अनुमान के अनुसार यहाँ हर वर्ष पहले के मुक़ाबले 15 से 20 प्रतिशत कम बारिश हो रही है.

चेरापूंजी के लोग इस बदलाव के लिए ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को ज़िम्मेवार मानते हैं.

मेघालय के वेस्ट खासी हिल्स में स्थित चेरापूंजी स्थानीय खासी भाषा में सोहरा नाम से जाना जाता है.

सोहरा साइंस सोसायटी के वरिष्ठ सदस्य मिलरग्रेस सिमलिआ कहते हैं, "चेरापूंजी में कभी भी बड़े-बड़े जंगल नहीं रहे हैं. जो भी जंगह यहाँ हैं वे हमारे लिए पवित्र हैं, और हम वहाँ एक भी पेड़ नहीं काटते. इसलिए आप ये नहीं कह सकते कि यहाँ के मौसम में बदलाव हमारे कार्यों से हुआ है. सच्चाई ये है कि हम पर दुनिया भर में हो रहे परिवर्तनों का असर पड़ रहा है."

सिमलिआ कहते हैं, "ये गर्म मौसम और कम बरसात जंगलों की कटाई या औद्योगिकरण का परिणाम नहीं है. यहाँ आसपास में उद्योग के नाम पर मात्र एक सीमेंट फ़ैक्ट्री है."

कहाँ गई बरसात

चेरापूंजी में मौसम विभाग के अधिकारी अमित चौधरी का कहना है कि पिछले पाँच वर्षों के दौरान यहाँ वर्षा में 20 से 25 प्रतिशत की कमी हुई है. हालाँकि बारिश में की मात्रा में अनियमितता एक दशक पहले शुरू हुई थी.

अमित कहते हैं, “वर्ष 2005 से यहाँ सालाना 800 से 900 सेंटीमीटर बारिश होती है, जबकि यहाँ का सामान्यत: औसत 1100 सेंटीमीटर बारिश हुआ करती थी.”

Image caption स्थानीय खासी भाषा में चेरापूंजी को सोहरा नाम से जाना जाता है (तस्वीर- शुभमय भट्टाचार्य)

बरसात में कमी का ये असर हुआ है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा बारिश वाले शहर के रूप में हाल तक प्रसिद्ध रहे चेरापूंजी को ख़ास कर सर्दियों में पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है.

नवंबर के मध्य में असामान्य रूप गर्म सुबह में चेरापूंजी में मैदानी इलाक़ों से ड्रमों में पानी भर कर लाते ट्रकों की कतार देखी जा सकती है.

एक ओर जहाँ चेरापूंजी में पानी की कमी हो रही है, वहीं यहाँ की जनसंख्या में बेहिसाब बढ़ोत्तरी हुई है.

वर्ष 1961 में यहाँ मात्र 7000 लोग रहते थे. तब से आबादी में 15 गुना बढ़ोत्तरी हो चुकी है.

स्थानीय शिक्षक इला मनोरा नोंगबरी कहती हैं, "सर्दियों में हमें पानी ख़रीदनी पड़ती है. जल संरक्षण के बारे में हमने कभी कुछ नहीं सीखा, लेकिन अब हमारे पास कोई विकल्प नहीं है."

इला की बहन मिमि बारिश की अनियमितता के बारे में बताती हैं, "जब हम उम्मीद नहीं करते बारिश हो जाती है, लेकिन जब होनी चाहिए बारिश होती नहीं. अब तो पूरे चेरापूंजी में भी बारिश नहीं होती. एक हिस्से में बरसात हुई तो दूसरे में नहीं."

बिदके सैलानी

उल्लेखनीय है कि चेरापूंजी में 1861 में मात्र एक महीने में रिकॉर्ड 2298 सेंटीमीटर बारिश हुई थी.

जब 1972 में खासी हिल्स को अलग राज्य का दर्जा मिला था तो इसे मेघालय नाम दिया गया- यानि बादलों का घर. मेघालय में सर्वाधिक बारिश वाले दुनिया के दो स्थान हैं- चेरापूंजी और मॉसिनराम. अब दोनों ही जगह बारिश लगातार कम होती जा रही है, और चेरापूंजी में ये कमी कुछ ज़्यादा ही तेज़ी से हो रही है.

इसके कारण चेरापूंजी आने वाले पर्यटकों की संख्या भी घट रही है. चेरापूंजी स्थित मेघालय पर्यटन विभाग के अधिकारी बैन्ज़र कूपर लिंगदोह कहते हैं कि विदेशी पर्यटक अब चेरापूंजी की तरफ़ कम ही रुख़ करते हैं.

लिंगदोह सवाल करते हैं, "सैलानी यहाँ बारिश और बादल देखने आते हैं, यदि धूप और गर्मी यहाँ की विशेषता बन जाए तो भला कौन यहाँ घूमने आएगा?"

पर्यावरणवादियों को डर है कि यदि बारिश की मात्रा इसी तरह कम होती गई तो चेरापूंजी के आसपास के जल-प्रपात भी सूख जाएँगे. उल्लेखनीय है चेरापूंजी आने वाले पर्यटकों के लिए ये जल-प्रपात भी आकर्षण के केंद्र हैं.

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