धनराशि का कोई अता-पता नहीं

बीबीसी की जाँच से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करने के लिए विकासशील देशों को जिस धनराशि का वादा किया गया था, उस धनराशि का कोई लेखा-जोखा नहीं है.

अमीर देशों ने 2001 के घोषणापत्र में सालाना 41 करोड़ पाउँड की मदद देने का वादा किया था लेकिन अब ये स्पष्ट नहीं है कि ये पैसा वाकई दिया गया या नहीं.

कहाँ गया पैसा

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने आरोप लगाया है कि औद्योगिक देशों ने अपना वादा नहीं निभाया है.

वहीं यूरोपीय संघ का कहना है कि द्विपक्षीय समझौतों के तहत पैसा दिया गया था हालांकि वो स्वीकार करता है कि इसे साबित करने के लिए डाटा उपलब्ध नहीं है.

2001 के बॉन घोषणापत्र में 20 औद्योगिक देशों ने आर्थिक मदद देने की बात कही थी. इन देशों का कहना था कि 2008 तक वे हर साल 41 करोड़ पाउँड देंगे.

लेकिन बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की जाँच से पता चला है कि इस मकसद के लिए बने संयुक्त राष्ट्र के धनकोश में सिर्फ़ 27 करोड़ पाउंड दिए गए हैं.

दिसंबर में होने वाले कोपनहेगन सम्मेलन में विकासशील देशों को आर्थिक मदद देने का मुद्दा काफ़ी अहम है. ग़रीब देशों का कहना है कि वे नए समझौते पर शायद हस्ताक्षर न करें क्योंकि उन्हें अमीर देशों पर भरोसा नहीं है कि वे अपना वादा निभाएँगे.

वहीं औद्योगिक देशों के मुताबिक उनका इरादा ये कभी नहीं था कि वे सारा पैसा केवल संयुक्त राष्ट्र के कोष में डालेंगे.

2001 का बॉन घोषणापत्र तैयार करने वाले डॉक्टर मार्क पैलेमाएर्ट्स मानते हैं कि ऐसा हो सकता है कि कुछ विकासशील देशों को ये बताया गया हो कि धनराशि संयुक्त राष्ट्र के कोष में जाएगी. उन्होंने कहा, "कुछ देशों को गुमराह किया गया है जबकि कुछ देश जानते थे कि ये भ्रम जानबूझकर रखा गया है."

बान की मून का कहना है कि कोपनहेगन में अगर कोई नया वित्तीय समझौता होता है तो इसमें स्पष्टता होनी चाहिए.

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