'जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणाम होंगे'

ग्रीनपीस रिपोर्ट
Image caption ग्रीनपीस इंडिया के अधिकारियों ने 'ऊर्जा क्रांति ' के नाम से रिपोर्ट जारी की है.

पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस ने कहा है कि अगर भारत ऊर्जा के वैकल्पिक उपायों को नहीं अपनाता है तो इसके गंभीर परिणा होंगे.

ग्रीनपीस इंडिया के कार्याकरी अध्यक्ष अनंत पद्मनाभन और ऊर्जा अभियानकर्ता के श्रीनिवास ने 'ऊर्जा क्रांति ' के नाम से रिपोर्ट जारी की है.

इसमें कहा गया है कि कोयला आधारित ऊर्जा के बजाए दूसरे विकल्पों पर विचार करना ज़रूरी है जिसमें पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और जैव ऊर्जा शामिल है. बाद में भूगार्भिक गर्मी और समुद्री लहरों को बिजली में बदलने की कोशिश की जा सकती है.

के श्रीनिवास ने बताया कि आने वाले दिनों में भारत में बिजली की माँग लगातार बढ़ने की संभावना ऐसा है. ऐसे में अगर कोयला आधिरत बिजली संयंत्रों पर निर्भरता बढ़ाई गई तो कार्बन डायक्साइड का ऊत्सर्जन भी बढ़ेगा जो तापमान में वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) का मुख्य कारण है.

उन्होंने कहा, "जलवायु परिवर्तन के भारत पर ख़तरनाक असर होंगे. विभिन्न देशों के पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्ट के मुताबिक इस सदी के अंत तक तापमान में ढाई से तीन फ़ीसदी की वृद्धि हो सकती है जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और समुद्री किनारे जलमग्न हो सकते हैं. साथ ही पेयजल की कमी होगी. प्रणि और वनस्पति जगत पर गहरा प्रभाव पड़ेगा."

कैसे निपटें

ग्रीनपीस का कहना है कि वैकल्पिक ऊर्जा के संसाधन बढ़ाने के अलावा ऊर्जा क्षमता भी बढ़ाने की ज़रूरत है. श्रीनिवास कहते हैं, "कम बिजली ख़पत करने वाले लाइटिंग उपकरणों और कम ईंधन ख़पत करने वाली गाड़ियों का निर्माण होना चाहिए."

उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग में मुख्य भूमिका अदा करने वाले क्लोरो फ़्लोरो कार्बन (सीएफसी) गैसों का ऊत्सर्जन कम करने के लिए हाइड्रोजन को ऊर्जा स्रोत के रुप में बढ़ावा देने की ज़रूरत बताई.

श्रीनिवास ने कहा, "एयर कंडीशनर और रेफ्रीजरेटर सबसे अधिक सीएफ़सी गैस ऊत्सर्जित करते हैं. भारत में सिर्फ़ एक कंपनी ने सीएफ़सी के बजाए हाइड्रो फ़्लोरो फ़्लोरो कार्बन (एचएफ़एफ़सी) की तकनीक अपनाई है."

सरकार से माँग

ग्रीनपीस ने भारत सरकार से जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेते हुए वर्ष 2010 तक अक्षय ऊर्जा क़ानून लागू करने की माँग की है.

श्रीनिवास का कहना था कि मौजूदा ऊर्जा संसाधनों में कार्बनिक ऊर्जा की ख़पत सबसे ज़्यादा है. ऐसी नीति बनाई जानी चाहिए जिससे वर्ष 2050 तक कुल ऊर्जा उत्पादन में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी 64 फ़ीसदी हो जाए.

इसमें सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत, पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी 20 फ़ीसदी और जैव ऊर्जा की भागीदारी छह फ़ीसदी होगी.

ग्रीनपीस के कार्यकारी अध्यक्ष अनिल पद्मनाभन ने कहा कि विकसित देशों को चाहिए कि वो कम विकसित देशों को ऊर्जा तकनीक का हस्तांतरण करे और ख़ुद हानिकारक गैसों का ऊत्सर्जन कम करने में अग्रणी भूमिका निभाएँ.

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