'कोपेनहेगन: केवल राजनीतिक समझौता न हो'

  • 2 दिसंबर 2009
जयवायु परिवर्तन
Image caption श्याम सरन को आशा है कि कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन में बातचीत आगे बढ़ेगी.

कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन के लिए भारत के विशेष दूत श्याम सरन ने कहा है कि ' कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन की कटौती के सिलसिले में आपसी सहमति के साथ क़ानूनी तौर पर बाध्यकारी फ़ैसला होना चाहिए.'

उनका कहना था कि अगर सिर्फ़ राजनीतिक फ़ैसला होता है तो इसका मतलब यह होगा कि बाली कार्य योजना पर अमल नहीं हो रहा है.

जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन सम्मेलन के विभिन्न आयामों और आशाओं पर विशेष दूत और पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन से हुई बातचीत के अंश.

कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है. क्या आपको लगता है कि कोपेनहेगन में कार्बन उत्सर्जन की कटौती पर विकसित और विकासशील देशों के बीच कोई सहमति हो सकेगी?

एक अवसर ज़रूर है. जब भारतीय दल कोपेनहेगन जाएगा तो उनके पास बातचीत के लिए एक हफ़्ते का समय होगा. उस अवसर से कैसे फ़ायदा उठाया जाता है ये देखना होगा. चीज़ें उसी वक़्त तय होंगी, लेकिन मैं यह कह सकता हूँ कि जितने भी विकासाशील देश हैं, जिसमें भारत भी शामिल है, उनकी यही कोशिश होगी कि जिन मुद्दों पर अब तक सहमति नहीं बन सकी है. उनपर सहमति बनाई जाए.

जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रमंडल देशों के सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह कहना है कि भारत एक राजनीतिक निष्कर्ष नहीं चाहता, बल्कि कोपेनहेगन में बातचीत आगे बढ़े. क्या आपको लगता है कि अभी भी कहीं कोई ऐसी गुंजाइश बची है कि विकसित देश, विकासशील देशों की चिंता पर कोई तवज्जो देंगे?

देखिए भारत के प्रधानमंत्री ने जो बात कही है कि वो केवल भारत का पक्ष नहीं है, बल्कि बाली कार्य योजना (बाली एक्शन प्लान) ने काम करने का जो रोडमैप दिया है उसके अनुसार कोपेनहेगन में सहमति के साथ क़ानूनी तौर पर बाध्यकारी फ़ैसला होना चाहिए. अगर सिर्फ़ राजनीतिक फ़ैसला होता है तो इसका मतलब यह होगा कि बाली कार्य योजना का जो मैनडेट है उसपर अमल नहीं हुआ.

यानी प्रधानमंत्री का यह कहना है कि जो बाली कार्य योजना है उसके अंतर्गत ही कोई फ़ैसला होना चाहिए. लेकिन इसके साथ उनका ये भी कहना था कि अगर कोपेनहेगन में कोई क़ानूनी रुप से बाध्यकारी फ़ैसला नहीं हो पाता है तो बातचीत को जारी रखना जाना चाहिए, लेकिन बाली कार्य योजना के अंतर्गत ही बातचीत होनी चाहिए.

क्या गोल पोस्ट (ज़िम्मेदारी) खिसकाने की कोशिश जारी है कि भारत सहित विकाशील देश इस बात पर अड़े हुए हैं कि बातचीत के लिए बाली कार्य योजना में परिवर्तन नहीं होनी चाहिए.

गोल पोस्ट तो खिसकाया ही जा रहा है. इसका उदाहरण बैंकॉक और बार्सिलोना में भी देखने को आया जब इस बात की कोशिश की जा रही थी कि क्योटो प्रोटोकॉल को किसी तरह से बाहर रखा जाए. इसमें तो हमें कोई संदेह नहीं है.

दूसरी बात यह है कि हमें यह जानना चाहिए कि कोपेनहेगन की बातचीत कोई नई संधि के लिए नहीं है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के लिए पहले ही से संधि है. जलवायु परिवर्तन पर वर्ष 1990 में संयुक्त राष्ट्र का फ़्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएन-एफ़सीसीसी) मौजूद है. इस समय ये कोशिश होनी चाहिए है कि कैसे उस यूएन-एफ़सीसीसी को प्रगति दी जाए, लेकिन इस समय फ़्रेमवर्क कन्वेंशन को प्रगति देने के बजाए पीछे धकेला जा रहा है.

यह बात सही है कि विकाशील देश यह समझते हैं कि जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ रही है, वैसे वैसे ज़िम्मेदारी को खिसकाने की कोशिश की जा रही है.

विकसित देशों के पास बड़े-बड़े स्त्रोत हैं, उनके पास कई तरह के राजनयिक तरीक़े हैं जिससे वो विकाशील देशों को प्रभावित कर सकते हैं. तो क्या लगता है कि कोपेनहेगन में भारत, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीक़ा जैसे देश आक्रमण या एक राजनयिक हमले के लिए तैयार हैं?

मैं ऐसी बात तो नहीं कह सकता कि विकासशील और विकसित देशों के बीच किसी तरह का युद्ध हो रहा है. हमें यदि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का समामना करना है तो ये बात ज़ेहन में रखनी होगी कि सहयोग के बिना इस चुनौती का सामना नहीं किया जा सकता. इसलिए कोशिश होनी चाहिए कि अबतक जिन मु्द्दों पर सहमति नहीं बन पाई है उनपर सहमति बनाई जाए.

इस मामले में विकाशील देशों के बीच जो एकता है उस क़ायम रखना बहुत ही ज़रूरी है. पिछले दिनों भारतीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश बीजिंग गए थे. वहाँ भारत, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीक़ा ने रणनीति बनाई है और तय किया है कि विकाशील देशों के बीच एकता और समन्वय बढाएंगे और जो बड़े-बड़े मुद्दे हैं उनमें किसी प्रकार से हल्कापन (डॉयलुशन) नहीं लाने देंगे.

क्या आपको अबतक कोई ऐसे संकेत मिले हैं कि विकसित देश किसी मुद्दे को हल्का करने की कोशिश कर रहे हैं.

देखिए डॉयलुशन तो हो रहा है. कहा जा रहा है कि कोपेनहेगन में राजनीतिक दस्तावेज़ सामने आएंगे और क़ानूनी तौर पर बाध्यकारी दस्तावेज़ नहीं लाए जाएंगे.

आपके अनुसार जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए बाली कार्य योजना के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र का फ़्रेमवर्क कॉन्वेंशन (यूएन-एफ़सीसीसी) है तो फिर कोपेनहेगन की आवश्यकता क्यों है?

हमारे सामने जो चुनौती है उसका मुक़ाबला करने के लिए पहले से जो समझौते हैं उन्हें प्रगति देना और लागू करना है. यानी पहले कार्बन उत्सर्जन में 10 प्रतिशत की कटौती करने का लक्ष्य दिया गया था अब उसे और बढ़ाना है. पहले के मुक़ाबले विकाशील देशों को और अधिक धन मुहैया कराने की बात होगी, क्योंकि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने के लिए विकाशील देशों को तकनीक और पैसा चाहिए.

यह बात सही है कि नई संधि की आवश्यकता नहीं है, लेकिन पहले से तय चीज़ों को लागू करने की आवश्यकता है.

जब विकसित देशों ने क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत कार्बन उत्सर्जन में कमी के जो लक्ष्य थे, उसे पूरा नहीं किया तो अब क्यों आशा करें कि वो ऐसा करेंगे.

क्योंकि विश्वभर में ये जागरूकता आई है कि जलवायु परिवर्तन की जो चुनौती है वो बहुत ही ख़तरनाक है. अगर सभी देश मिलजुलकर इस चुनौती का सामाधान नहीं ढूढंगे तो इसकी आँच सारे देश पर आएगी.

पर यह बात भी सही है कि विकसित देशों का पिछला रिकार्ड बहुत उत्साहजनक नहीं है. लेकिन आशा करेंगे की आगे की रिकॉर्ड अच्छी रहेगी. हमारे पास साधन सीमित हैं, लेकिन हमारी भी कोशिश होगी कि उस सीमित साधन से जो कर सकते हैं, करेंगे.

राष्ट्रपति ओबामा 17 प्रतिशत की कटौती की बात कर रहे हैं, जो सन् 1990 के स्तर पर नहीं है, लेकिन 2005 के स्तर पर है. भारत उनकी घोषणा को कैसे देखता है.

राष्ट्रपति ओबामा ने जलवायु परिवर्तन को अपने राष्ट्रीय एजेंडा में शामिल कर रखा है. इसका हम स्वागत करते हैं. लेकिन यह बात सही है कि ओबामा ने अबतक जो घोषणा की है वो काफ़ी नहीं है. उन्होंने जो भी घोषणा की है उसका स्वागत किया जाना चाहिए साथ ही और दबाव भी बनाने की आवश्यकता है कि अमरीका और अधिक करे, क्योंकि विश्व में सबसे अधिक उत्सर्जन अमरीका करता है. इसलिए उनका दायत्वि बनता है कि वो और देशों से अधिक करे और अमरीका के पास साधन भी है.

चीन ने भी जलवायु परिवर्तन को लेकर कुछ घोषणा की है. उसे भारत कैसे देखता है. क्या भारत भी अब इस तरह की घोषणा करने जा रहा है?

देखिए चीन ने जो कहा है वो उत्सर्जन में कटौती की बात नहीं कही है. उनका उद्देश्य यह है कि चीन का फ़िलहाल उत्सर्जन जिस दर से बढ़ रहा है उसे कम किया जाए. इसमें कटौती नहीं है. देखिए हमारी जो ऊर्जा दक्षता रिकॉर्ड हैं वो चीन से अच्छी हैं. पिछसे सालों में हमारी जो आर्थिक प्रगति है वो छह से सात प्रतिशत के बीच बढ़ रही हैं लेकिन हमारी ऊर्जा ज़रूरत केवल चार प्रतिशत से बढ़ रही हैं. इसका मतलब यह है कि अर्थव्यवस्था की जो ऊर्जा ज़रूरत है वो केवल चार प्रतिशत है. भारत ने इस सिलसिले में कई क़दम उठाए हैं जिससे उत्सर्जन कम होगा, लेकिन किसी लक्ष्य के बारे में सोचने की आवश्यकता है.

क्या हो सकता है कि कोपेनहेगन सम्मेलन के दौरान भारत कोई लक्ष्य की घोषणा कर दे.

फ़िलहाल इसपर कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है और जो आँकड़े हमारे पास हैं वो हमारे पक्ष में हैं. अगर कोपेनहेगन में इन आँकड़ों को रखने की बात होगी तो इसपर निर्णय लेना होगा.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ने त्रिनिडाडमें कहा कि जलवायु परिवर्तन पर बात करनी है तो ग़रीबी पर भी बात करनी होगी. 1974 में स्टॉकहोम में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने भी यही बात कही थी, तो क्या 1974 में भारत की जो नीति है उसे पर क़ायम है या उसमें कोई परिवर्तन हुआ है.

इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. मनमोहन सिंह का साफ़ कहना है कि जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ ग़रीबी उन्मूलन पर भी बात करनी होगी. यानी यह नहीं कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती है तो कोई देश ग़रीब ही रहे और ग़रीब को बिजली नहीं दी जा सकती है क्योंकि जलवायु ख़तरें में है. इसी तरह जलवायु के नाम पर ग़रीबों को परिवहन का साधन नहीं दिया जा सकता है. ये मंज़ूर नहीं होगा.

जब हम मिलजुल कर रहे हैं तो विकसित देशों को भी कुछ क़ुर्बानी देनी होगी. विकसित देशों का यह कहना है कि हमारी लाइफ़स्टाइल में कोई बदलाव नहीं होगा, लेकिन आप जहाँ हैं वहीं रहे, ये कैसे मुमकिन है?

तापमान में डेढ़ से दो डिग्री सिल्सियस तक ही वृद्धि की बात कही गई है, क्या इसपर भी बात होगी.

ज़रूर इस विषय पर बात होगी. भारत का कहना है कि जितना भी लक्ष्य रखना है ज़रूर रखा जाए, लेकिन उसे कैसे हासिल किया जाता है वो न्यायसंगत होना चाहिए. जब हम चाहते हैं कि तापमान दो डिग्री से अधिक नहीं बढ़े तो विकसित और विकाशील देशों में इस लक्ष्य के प्राप्ति के लिए न्यायसंगत होने के सिद्धांत पर ज़िम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए. जो विकासशील देश हैं उन्हें विकास करना है उसे ऊर्जा की आवश्यकता है ऐसे में उसका उत्सर्जन बढ़ेगा और जो विकसित देश हैं वो कहेंगे कि वो जिस स्तर पर हैं उसमें समझौता नहीं करेंगे तो यह न्यायसंगत होने का सिद्धांत कहाँ है?

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