विकासशील देशों का पक्ष

जयराम रमेश
Image caption भारत विकासशील देशों की ओर से अग्रणी वार्ताकार है.

कोपेनहेगन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भाग लेने वाले देशों को औद्योगीकृत और विकासशील देशों के वर्ग में स्पष्ट रूप से बाँटा जा सकता है. जलवायु परिवर्तन पर विकासशील देशों के हित विकसित देशों से बिल्कुल अलग हैं.

विकासशील देशों के बीच चार बातों पर पर पूर्ण सहमति है-

- ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से औद्योगीकृत देश ज़िम्मेवार है.

-औद्योगीकृत देशों को वर्ष 2020 तक अपने कार्बन उत्सर्जन की मात्रा में भारी कटौती का वचन देना होगा.

-विकसित देश, पूरी दुनिया को स्वच्छ उर्जा की प्रौद्योगिकी सुलभ कराएँ.

-जलवायु परिवर्तन के ख़तरे को कम करने के उपायों पर आने वाली लागत का मुख्य भार औद्योगीकृत देश उठाएँ.

हालाँकि ये सच्चाई है कि विकासशील देशों के समूह में भी अलग-अलग देशों के अपने-अपने अलग हित हैं.

मसलन भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे तेज़ी से विकास करते देशों के हित, और थाइलैंड, मिस्र, ज़ाम्बिया और पेरू जैसे देशों के हित एक समान नहीं हो सकते हैं.

इसी तरह मालदीव और बांग्लादेश जैसे देशों की चिंताएँ कुछ और हैं. इनकी माँग है कि कोई भी बाध्यकारी संधि पर बनने वाली सहमति में समुद्र के बढ़ते जलस्तर के ख़तरे पर्याप्त महत्व दिया जाए.

इसलिए कोपेनहेगेन में विकास-शील देश अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए अलग-अलग गुटों में शामिल नज़र आएँगे.

अलग-अलग हित

चीन और भारत जैसे देश अपने ऊपर कार्बन उत्सर्जन में कटौती संबंधी कोई बाध्यकारी शर्त लगाए जाने के ख़िलाफ़ हैं. साथ ही इन देशों का कहना है कि विकसित देश, 2020 तक अपने लिए उत्सर्जन में कम-से-कम 40 प्रतिशत कटौती का लक्ष्य रखें.

अफ़्रीकी देशों की माँग है कि उन्हें साफ़-सुथरी ऊर्जा वाली टेक्नोलॉजी अपनाने के लिए सालाना 67 अरब डॉलर की सहायता दी जाए.

खाड़ी के तेल उत्पाद देशों का कहना है कि पेट्रोलियम के उपयोग में कटौती पर कोई सहमति बनने की स्थिति में उन्हें आर्थिक सहायता चाहिए होगी.

छोटे द्वीपीय देशों की माँग है कि वर्ष 2015 में कार्बन उत्सर्जन की स्थिति को अधिकतम घोषित कर दिया जाए, और 2050 तक उत्सर्जन की मात्रा 1990 के मुक़ाबले 85 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य निर्धारितत हो.

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