विकासशील देशों में ही मतभेद

जलवायु परिवर्तन के चिन्ह
Image caption समुद्र के किनारे वाले देशों पर ज़्यादा ख़तरा है

कोपनहेगन में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में किसी समझौते पर विकासशील देशों मतभेद उभरकर सामने आए हैं. जलवायु परिवर्तन के सबसे ज़्यादा असर का सामना करने वाले देशों ने सख़्त समझौते की माँग की है.

यह माँग करने वाले देशों में तवालू द्वीप और अफ्रीका के ग़रीब द्वीप देश हैं. इन देशों ने माँग रखी है कि क्योटो से सख़्त समझौता होना चाहिए जो क़ानूनी रूप से बाध्यकारी भी हो.

जबकि जबकि भारत और चीन जैसे धनी विकासशील देशों ने इसका विरोध किया है क्योंकि उनका मानना है कि अगर बहुत सख़्त समझौता किया गया तो इससे उनके आर्थिक विकास पर असर पड़ सकता है.

तुवालू द्वीप देश ने इस मुद्दे पर कोई आम राय नहीं बन जाने तक औपचारिक बातचीत स्थगित करने की माँग की और ये माँग मान भी ली गई. इसका परिणाम ये हुआ कि बुधवार को तीसरे दिन की बातचीत अधर में लटक गई है और अनौपचारिक बातचीत ही हो रही है.

आमतौर पर विकासशील देशों में ही इस तरह के मतभेद नहीं देखे जाते हैं क्योंकि विकासशील देश एक सुर में विकसित देशों के सामने अपनी बात रखते रहे हैं.

तुवालू के मुख्य वार्ताकार इयन फ्राई ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनका देश उस प्रस्ताव पर पूर्ण बहस चाहता जिसमें एक क़ानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते की पेशकश की गई है और ये प्रस्ताव छह महीने पहले संयुक्त राष्ट्र जलवायु विभाग को सौंप दिए गए थे.

इयन फ्राई ने कहा, "हमारे देश के प्रधानमंत्री और अन्य अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष या सरकाराध्यक्ष इस इरादे से कोपनहेगन सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए आने वाले हैं कि वो एक क़ानूनी समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे."

उन्होंने कहा, "तुवालू दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के ख़तरे का सामना करने वाले देशों में सबसे ज़्यादा जोखिम में है और हमारे देश का भविष्य इस सम्मेलन में होने वाले समझौते पर निर्भर करेगा."

बाध्यकारी हो

इस रुख़ का समर्थन एसोसिएशन ऑफ़ स्मॉल आईलैंड स्टेट्स ने भी किया जिसमें कुक आईलैंड, बारबडोस, फीज़ी शामिल हैं. इनके अलावा सियरा लियोन और सेनेगल जैसे ग़रीब अफ्रीकी देशों ने भी समर्थन किया.

तेज़ी से आर्थिक विकास के रास्ते पर चलने वाले भारत और चीन के अलावा अफ्रीका ने 350पीपीएम जैसा कम लक्ष्य निर्धारित करने करने का विरोध किया क्योंकि उनका मानना है कि इससे उनका आर्थिक विकास धीमा पड़ सकता है.

इन देशों ने नए क़ानूनी समझौते के तुवालू के आहवान का भी विरोध किया. इनका कहना था कि मौजूदा संधियाँ और समझौते तथा क्योटो संधि में पहले से ही ख़ासे सख़्त प्रावधान मौजूद हैं.

लेकिन बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ये मौजूदा प्रावधान छोटे और ख़तरे का ज़्यादा सामना कर रहे देशों के लिए काफ़ी नहीं हैं क्योंकि उन्हें समुद्र के बढ़ते जल स्तर से ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ सकत है लेकिन अगर सख़्त प्रावधान किए जाते हैं तो उनसे उन्हें कोई ख़ास नुक़सान नहीं होगा.

बीबीसी के पर्यावरण मामलों के संवाददाता का कहना है कि यह स्थिति स्पष्ट संकेत देती है कि ग़रीब और ख़तरे का सामना करने वाले देश किसी सख़्त समझौते के लिए संकल्पबद्ध हैं, भले ही वो उनके सामान्य सहयोगी देशों को नाराज़ करने की क़ीमत पर ही क्यों ना हो.

लीक रिपोर्ट

इस बीच पर्यावरणविदों ने कोपनहेगन सम्मेलन में डेनमार्क की एक लीक हुई रिपोर्ट पर भारी ग़ुस्सा जताते हुए कहा है कि यह रिपोर्ट विकसित देशों पर बहुत लचीली है.

'फ्रेंड्स ऑफ़ द अर्थ' नामक एक पर्यावरणवादी संगठन ने कहा है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए विकसित देश की तरफ़ से विकासशील देशों को जो धन देने का जो प्रस्ताव है, वो ज़रूरत से बहुत कम है.

कोपनहेगन में 'फ्रेंड्स ऑफ़ अर्थ' के एक प्रवक्ता असद रहमान का कहना था, "लीक हुई यह रिपोर्ट धनी देशों की ज़िम्मेदारी कम करती है जिन्हें कार्बन उत्सर्जन में कटौती की क़ानूनी रूप से बाध्यकारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त किया जा रहा है. यह रिपोर्ट धनी देशों को ज़िम्मेदारी से मुक्त करती है, क्योटो संधि का ख़ात्मा करती है, यह जलवायु परिवर्तन कोष का नियंत्रण विश्व बैंक के हाथों में देती है."

असद रहमान का कहना था कि यह ज़िम्मेदारी से मुँह फेरने की बात है. यह रिपोर्ट कुछ देशों का ऐसा प्रयास है जिससे ना तो विज्ञान की नज़र से मुद्दे का हल निकलेगा और न ही न्याय की नज़र से.

उन्होंने कहा कि विकसित देशों को कार्बन उत्सर्जन में 40 प्रतिशत तक कटौती करनी होगी.

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