आईपीसीसी की रिपोर्ट पर नया विवाद

  • 30 जनवरी 2010
Image caption अमेज़न के जंगलों का उपग्रह से लिया गया चित्र

वर्षाश्रित जंगलों का अध्ययन करने वाले एक प्रमुख वैज्ञानिक ने अमेज़न के जंगलों के बारे में आंकड़ों को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं करने के लिए जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय समिति आईपीसीसी की आलोचना की है.

उल्लेखनीय है कि आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के कारण अमेज़न के जंगल अनुमानित समय से पहले नष्ट हो जाएंगे.

अब जलवायु परिवर्तन संबंधी तथ्यों पर संदेह करने वाले कुछ लोगों ने ये रहस्योदघाटन किया है कि अमेज़न के जंगलों पर आईपीसीसी की चेतावनी पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ के एक प्रकाशन से लिया गया है.

उल्लेखनीय है कि हिमालय के ग्लेशियरों के 2035 तक लुप्त हो जाने के ख़तरे की बात डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ के ही एक प्रकाशन से होते हुए आईपीसीसी की रिपोर्ट में पहुँची थी. पिछले हफ़्ते आईपीसीसी ने ग्लेशियर संबंधी अपनी चेतावनी के ग़लत होने की बात स्वीकार की.

अमेज़न के जंगलों संबंधी चेतावनी के बारे में ब्रिटेन के लीड्स विश्वविद्यालय के डॉ. साइमन लुइस ने आईपीसीसी की आलोचना करते हुए सवाल किया है कि अमेज़न के जंगलों के नष्ट होने का ख़तरा कई वैज्ञानिक अध्ययनों में सामने आ चुका है, तो फिर आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में उन अध्ययनों का संदर्भ क्यों नहीं दिया.

'अमेज़नगेट'

जलवायु परिवर्तन पर मानवीय गतिविधियों के बुरे असर के दावों पर संदेह करने वाले गुट ताज़ा विवाद को अमेज़नगेट कह रहे हैं. उसी तर्ज पर जैसा कि हिमालय के ग्लेशियरों के अगले 25 वर्षों में ख़त्म हो जाने के दावे को ग्लेशियरगेट कहा गया था.

लेकिन विज्ञान जर्नल ‘साइंस’ के लिए वर्षाश्रित वनों पर शोध कर चुके लीड्स विश्वविद्यालय के डॉ. साइमन लुइस संदेहवादियों की दलील से सहमत नहीं हैं. उन्होंने कहा कि इस मामले में आईपीसीसी की ग़लती मात्र इतनी है कि अमेज़न के जंगलों पर जलवायु परिवर्तन के असर की सही रिपोर्ट करते हुए इसने सही स्रोतों का हवाला नहीं दिया है.

स्रोत के रूप में वैज्ञानिक शोधों की जगह पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले एक संगठन का नाम देने की ये ग़लती क्यों हुई? आईपीसीसी की संबंधित रिपोर्ट तैयार करने वाले वैज्ञानिक इस बारे में अभी कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं.

इस पूरे मामले में इतना तो तय है कि इससे आईपीसीसी में संगठनात्मक सुधार के लिए दबाव बढ़ेगा.

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