इलैक्ट्रॉनिक कचरे से भारी ख़तरा

  • 22 फरवरी 2010
इलैक्ट्रॉनिक कचरा बेतहाशा बढ़ रहा है
Image caption इलैक्ट्रॉनिक कचरा बेतहाशा बढ़ रहा है जिससे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भारी ख़तरा है

संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि मोबाइल फ़ोन और लैपटॉप कंप्यूटर जैसी इलैक्ट्रॉनिक चीज़ें जब इस्तेमाल के बाद फेंक दी जाती हैं तो उनसे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भारी ख़तरा पैदा हो रहा है.

यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम ने तैयार की है जिसमें ऐसे नए नियम और क़ानून बनाने का आहवान किया गया है जो ये सुनिश्चित करें कि इस तरह का इलैक्ट्रॉनिक कूड़ा-कचरना फेंकने के लिए कड़े मानदंड अपनाए जाएँ.

यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की गवर्निंग काउंसिल की इंडोनेशिया के बाली में सोमवार को शुरू हो रही एक बैठक के अवसर पर जारी की गई है.

विश्लेषकों का कहना है कि इलैक्ट्रॉनिक दुनिया में इतनी तेज़ी से हो रही प्रगति और बदलावों के फ़ायदों के अलावा नुक़सान वाला पक्ष भी है, ख़ासतौर से विकासशील देशों में इलैक्ट्रॉनिक कूड़े-कचरे ने पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य के लिए भारी ख़तरा पैदा कर दिया है.

मुश्किल ये है कि जिस रफ़्तार से टेलीविज़न, मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर ख़रीदे जाते हैं उसी रफ़्तार से पुरानी इलैक्ट्रॉनिक चीज़ों को सुरक्षित तरीक़े से फेंकने के प्रयास नहीं किए जाते हैं. इन चीज़ों की बिक्री हाल के समय में बहुत तेज़ी से बढ़ी है.

इसके उलट विकसित देशों में इन चीज़ों को इस्तेमाल के बाद ख़राब होने पर फेंकने का एक सुरक्षित तरीका अपनाया जाता है जिसे री-साइकलिंग कहा जाता है जबकि विकासशील देशों में इसके लिए कुछ ख़ास चिंता नज़र नहीं आती है.

संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम में अनुमान लगाया गया है कि इलैक्ट्रॉनिक कूड़ा-कचरा दुनिया भर में प्रतिवर्ष चार करोड़ टन की रफ़्तार से बढ़ रहा है, ख़ासतौर से भारत और चीन जैसे देशों में इस तरह का कूड़ा-कचरा अगले दस वर्षों में 500 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा.

उपाय महंगे मगर...

इलैक्ट्रॉनिक चीज़ों में धातु और कुछ इस तरह के तत्व होते हैं जो पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए बेहद ख़तरनाक होते हैं इसलिए इन वस्तुओं को सुरक्षित तरीके से फेंकने की व्यवस्था यानी री-साइकलिंग एक जटिल और महंगा काम है.

Image caption तरह-तरह की इलैक्ट्रॉनिक चीज़ें बन रही हैं जिनसे ख़तरनाक किरणें निकलती हैं

लेकिन बहुत से देशों में इलैक्ट्रॉनिक चीज़ों को इस्तेमाल के बाद उनसे होने वाले नुक़सान की परवाह किए बिना ही सामान्य कूड़े-कचरे में ही फेंक दिया जाता है और ऐसे देशों में चीन भी शामिल है. इलैक्ट्रॉनिक कूड़े-कचरे में से इस तरह की किरणें निकलती हैं जो हवा में जाती हैं जिससे पर्यावरण को नुक़सान पहुँचता है.

जबकि हम जानते हैं कि चीन दुनिया भर में इलैक्ट्रॉनिक सामान तैयार करने वाला एक बड़ा देश है जिसका इलैक्ट्रॉनिक सामान यूरोप और अमरीका के बाज़ारों में भरा पड़ा है.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इलैक्ट्रॉनिक कूड़े-कचरे को फेंकने और सुरक्षित तरीक़े से उसे फिर से इस्तेमाल करने के लिए तुरंत ठोस क़दम उठाने होंगे नहीं तो बहुत से देशों में इस कचरे के पहाड़ खड़े हो जाएंगे जिससे ना सिर्फ़ पर्यावरण को नुक़सान होगा बल्कि लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी भारी ख़तरा पैदा हो जाएगा.

रिपोर्ट में आहवान किया गया है कि इलैक्ट्रॉनिक सामान को फेंकने और उसे ठिकाने लगाने यानी री-साइकिलिंग के लिए ठोस नियम और क़ानून तुरंत बनाए जाएँ.

हालाँकि संयुक्त राष्ट्र ने यह भी स्वीकार किया है कि ऐसे नियमों का नतीजा महंगा साबित हो सकता है मगर उनसे नई नौकरियाँ मिलेंगी, सोना और चाँदी जैसे महंगे धातु इकट्ठे होंगे जो इलैक्ट्रानिक चीज़ों में इस्तेमाल होते हैं और एक साफ़-सुथरा पर्यावरण क़ायम रखने में मदद तो मिलेगी जिससे लोगों के स्वास्थ्य को भी कम ख़तरा पैदा होगा.

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