'लगता था गए गुज़रे लोग हैं'

Image caption इंटरनेट आने के बाद बड़ी संख्या में कश्मीरियों ने ब्लॉग लिखना शुरू किया है

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर तरक्की के मोर्चे पर पिछड़ा हुआ है. यहाँ बारह-बारह घंटे बिजली नहीं रहती, सड़कें तबाह हैं और अगर हिमपात हुआ तो कश्मीर घाटी कई दिनों तक शेष दुनिया से कट जाती है.

पिछले बीस साल से यहाँ जो अलगाववादी हिंसा का दौर चला उसके चलते सरकार ने लोगों को वर्षों तक लोगों को आधुनिकतम तकनीकी से वंचित रखा. शिक्षा विभाग के एक कर्मचारी अहमद नज़ीर कहते हैं कि ऐसे हालात में आम कश्मीरियों का आत्मसम्मान कम हो गया और वे ख़ुद को उपेक्षित महसूस करने लगे.

सामाजिक कार्यकर्ता इम्तियाज़ ख़ान कहते हैं, "जब इंटरनेट उपलब्ध नहीं था तो लगता था कि जैसे हम गये-गुज़रे लोग हैं."

ज़िंदगी बदल गई

अब कश्मीर में इंटरनेट आए हुए लगभग 10 साल हो गए हैं. इस दौरान यहाँ ज़िंदगी का नक़्शा ही बदल गया है. लेखक पीजी रसूल कहते हैं, "ये यहाँ के लोगों के लिए एक किस्म की स्वतंत्रता थी."

कश्मीरी लोग सदियों से ये समझते थे कि वे हिमालय के पिछवाड़े में लॉक-अप में हैं. यहाँ दुनिया के साथ संपर्क बहुत कम होता है. एकमात्र सड़क है और छह महीने तक उस पर भी अनिश्चय की स्थिति रहती है. ऐसे में इंटरनेट के ज़रिये वे समझते हैं कि वे दुनिया के साथ संपर्क में आ गए हैं.

कश्मीर विश्वविद्यालय में इस्लामिक शिक्षा के प्रोफेसर हामिद नसीम कहते हैं, "दुनिया से अलग-थलग रहने का अहसास अब काफी हद तक ख़त्म हो गया है." वे कहते हैं, "अब हम दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी रिसर्चर के साथ संपर्क कर सकते हैं."

सुहैल मेहदी कवि हैं और उन्होंने एक ब्लॉग शुरू किया है. वे कहते हैं, "दुनिया में जहाँ भी उर्दू जानने वाले लोग मौजूद हैं वे मेरी कविताएँ पढ़ते हैं." उनका कहना है कि पाकिस्तान के कई कवियों ने उनसे संपर्क किया और कुछ कवियों ने उनकी कविताओं में कुछ संशोधन भी किए.

डॉ सरोश ख़ान ने कुछ और डॉक्टरों के साथ एक ऑनलाइन मेडिकल जरनल शुरू किया है. उनका कहना है कि उनका जरनल 70-80 देशों में पढ़ा जाता है और ये बड़ी उपलब्धि है.

ब्लॉग की दुनिया

लेकिन कश्मीर में इंटरनेट के इस्तेमाल का इससे भी महत्वपूर्ण पहलू है. वो ये कि कश्मीरी जनता विशेषकर युवा पीढ़ी ने इंटरनेट के माध्यम से अपने राजनीतिक विचारों और कश्मीर के हालात का खूब प्रचार किया है.

पत्रकार मुश्ताक अहमद कहते हैं, "कश्मीरी ब्लॉग के माध्यम से अपनी आजा़दी का संघर्ष इंटरनेट पर ले आए हैं. वे बताते हैं कि उनके साथ क्या हो रहा है." कश्मीर के लोगों ने इंटरनेट का सबसे अधिक इस्तेमाल दो साल पहले तब किया था जब लाखों की संख्या में लोग विरोध प्रदर्शनों के लिए सड़कों पर उतरे थे.

उस दौरान कई युवाओं ने जुलूसों और सुरक्षाबलों के कथित अत्याचारों की तस्वीरें यू-ट्यूब पर डाली थीं. ऐसे में जबकि भारतीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर कश्मीर की ख़बरों को तरज़ीह न देने या सही तस्वीर पेश न करने के आरोप लगते रहे हैं, यू-ट्यूब युवाओं के लिए अपनी बात लोगों तक पहुँचाने का अच्छा माध्यम बना है.

जानेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता ख़ुर्रम परवेज़ का मानना है कि यू-ट्यूब पर लगाई गई इन तस्वीरों ने विभिन्न देशों में असर पैदा किया. वे कहते हैं, "हमारे दोस्तों ने इंडोनेशिया, ईरान और अमरीका से फोन कर बताया कि उन्होंने ये तस्वीरें देखी हैं."

यही नहीं, कश्मीर घाटी से पलायन करने वाले पंडितों ने भी इंटरनेट का खूब इस्तेमाल किया है.

इंटरनेट अब कश्मीरी जनता के लिए जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन गया है, लेकिन लोगों को आशंका है कि सरकार सुरक्षा के नाम पर ये सेवा कभी भी बंद कर सकती है.

संबंधित समाचार