दुनिया की ओर खुलती खिड़की

अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से है जहाँ इतने बड़े पैमाने पर वायरलेस इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है.

लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि यह वक़्त की ज़रूरत थी. दशकों के निरंतर युद्ध ने वहाँ ज़मीन से होकर जाने वाली संचार की सारी सुविधाओं को ध्वस्त कर दिया है.

लेकिन इतनी सुविधा के बाद भी इसका लाभ उठाने वाले लोग अफ़ग़ान नहीं हैं. ज़्यादातर लोग इस सुविधा का खर्च ही वहन नहीं कर सकते.लेकिन इंटरनेट ने कुछ लोगों की ज़िंदगी बदल दी है.

बदल गई दुनिया

जमशीद सुल्तानज़ादा एक इंटरनेट उद्यमी हैं जो अब एक इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (आईएसपी) के लिए काम करते हैं. 1990 के दशक में कंप्यूटरों ने उनकी दुनिया ही बदल दी. उस समय अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान का शासन था और उन्होंने एक ट्रेनिंग सेंटर में शाम की कक्षाएँ लेनी शुरू की थीं.

अफ़ग़ानिस्तान को इस युग में इंटरनेट से वंचित रखना उसे फिर से अंधेरे में धकेलने जैसा ही होगा, जहाँ से उसने अभी-अभी उबरना शुरू किया है

इस ट्रेनिंग स्कूल में आने के लिए छात्रों को थोड़ी फ़ीस देनी होती थी. लेकिन वहाँ के छात्रों और कर्मचारियों को यह बात समझ में आ गई थी कि वहाँ सिखाए जाने वाले दो गुर बेहतर ज़िंदगी के लिए ज़रुरी हैं. एक तो अंग्रेज़ी और दूसरा कंप्यूटर.

बतूल मोहम्मदी एक मानवाधिकार संगठन के लिए काम करती हैं. वे बामियान प्रांत की रिपोर्ट लिखने और उसे भेजने के लिए कंप्यूटर और इंटरनेट का उपयोग करती हैं.

लेकिन वे ब्लॉग भी लिखती हैं जिससे कि वे बाहरी दुनिया को यहाँ के जीवन की सच्चाइयों से रूबरू करवा सकें.

समाज को ताक़त

बहुत से लोगों को लगता है कि इंटरनेट से उनके समाज को ताक़त मिल सकती है.

लेकिन मुस्लिम समाज में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें इंटरनेट की पूरी परिकल्पना पर ही आपत्ति है. वे इसे अमरीकी आविष्कार की तरह देखते हैं. सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का पश्चिम का एक और हथियार. वे मानते हैं कि इंटरनेट में अनैतिक और ग़ैर-इस्लामिक सामग्री से भरा पड़ा है.

तालेबान के शासनकाल में इंटरनेट पर पूरी तरह से प्रतिबंध था.

इस समय भी बहुत से अफ़ग़ान विदेशी प्रभाव को लेकर गहरे संशय में दिखते हैं. लेकिन इंटरनेट उनके लिए दुनिया की ओर एक खिड़की खोल सकता है जिससे वे दुनिया भर के दूसरे देशों के साथ फिर से जुड़ सकते हैं.

यह युद्ध और अतिवाद की कड़वी सच्चाई से बचने का एक रास्ता भी हो सकता है.

लेकिन अगर आप थम से गए सामाजिक विकास और ग़रीबी की त्रासदी को देखें तो समझ में आता है कि वहाँ इंटरनेट जैसी सुविधा बढ़ाने की माँग करना कितना बेतुका लग सकता है.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान को इस युग में इंटरनेट से वंचित रखना उसे फिर से अंधेरे में धकेलने जैसा ही होगा, जहाँ से उसने अभी-अभी उबरना शुरू किया है.

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.