इंटरनेट यानी दुनिया हाथ भर के फ़ासले पर

इंटरनेट

मैंने बहुत कम उम्र में काम करना शुरु कर दिया था. तब मेरी पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई थी. मैंने एक अख़बार में काम करना शुरु कर दिया.

एक बार काम में मन लग गया तो फिर काम छोड़ने का जी ही नहीं चाहा. बाक़ी की पढ़ाई मैंने काम करते-करते ही पूरी की.

अपने शुरुआती दिनों के काम के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि तकनीक की दृष्टि से कितनी दूर चले आए. कंप्यूटर का कमरा मानों मंदिर हुआ करता था. जूते उतारिए फिर भीतर जाइए. एसी के बिना कंप्यूटर नहीं रखे जाएँगे, आदि –आदि.

वो 1990 की बात है. डॉस के दिन थे और कंप्यूटर की स्क्रीन से रंग अभी दूर थे.

अब किसी से कहें तो यक़ीन न करे कि हम एक न्यूज़ अपडेट के लिए न जाने कितनी देर तक टेलीप्रिंटर के सामने खड़े रहते थे. कई बार अपडेट आने के बाद भी ख़बर छाप नहीं पाते थे क्योंकि उसे प्रोसेस करने का समय नहीं होता था. एक समाचार मिलने से लेकर उसके छपने के प्रोसेस में आने में दो घंटों से अधिक का समय लगता था.

अगर किसी ख़बर के लिए रिसर्च करनी हो तो फिर पूरा दिन गया समझिए. रेफ़रेंस लाइब्रेरी में सर खपाते ही दिन बीत जाता था. फिर भी कई बार काम की सामग्री नहीं मिल पाती थी.

विज्ञापनों की डिज़ाइनें ट्रेनों और बसों के रास्ते पहुँचती थीं और इस फेर में अक्सर देर हो जाया करती थी.

यह सब देखते समझते हुए मैं एक क्षेत्रीय अख़बार से राष्ट्रीय अख़बार में चला गया, फिर एक विज्ञापन की कंपनी में काम करने लगा. लेकिन कंप्यूटर तब मेरे काम की तुलना में धीरे-धीरे ही बदल रहा था. इंटरनेट तब भी भारत में दूर की कौड़ी थी.

बदली दुनिया

90 के दशक में इंटरनेट ने तेज़ी से पैर पसारने शुरु किए और एक नई दुनिया का उदय हुआ. सूचना प्रोद्योगिकी यानी आईटी का.

इसने अख़बार की दुनिया को पूरी तरह से बदल गई. इंटरनेट ने टेलीप्रिंटर, फ़्लॉपी, ट्रेन और बसों सबको एक झटके में विस्थापित कर दिया. अब ख़बरें ऑन लाइन आ रही थीं. हर क्षेत्रीय कार्यालय इंटरनेट पर कंपोज़ की हुई ख़बरें भेज रहा है और विज्ञापन की डिज़ाइनें कंप्यूटर पर तैयार मिल रही हैं.

अब एक ख़बर को प्रोसेस करना इस बात पर निर्भर करता था कि उसे संपादक कितनी देर में पढ़ लेता है.

मैं कभी इंजीनियरिंग का छात्र नहीं था लेकिन अपने काम के दौरान मैंने कंप्यूटर और इंटरनेट की तकनीक से ख़ासी दोस्ती कर ली थी. मैं अपने काम से ख़ुश था लेकिन कुछ नया करने की चाहत ने एक दिन अख़बार और विज्ञापन की दुनिया से अलग कर दिया और मैं भी आईटी की ओर चला गया.

पिछले छह सालों से मैं आईटी में काम कर रहा हूँ. अब मैं तीसरी कंपनी में काम कर रहा हूँ. कहने को इन छह सालों में सिर्फ़ दो शहर बदले हैं लेकिन सच कहूँ तो मेरी दुनिया मानों पूरी तरह से बदल गई है.

अख़बार के काम ने चौबीसों घंटे तैयार रहने की आदत डाल दी थी लेकिन इंटरनेट ने जो किया वह कल्पनातीत था. इसने चौबीसों घंटे अपने शहर में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मौजूद रहने को तैयार कर दिया.

कहने को मैं भारत में होता हूँ, मेरे बॉस अमरीका और जर्मनी में और मेरे कस्टमर्स दुनिया भर में. लेकिन कभी लगा ही नहीं कि हम एक छत के नीचे नहीं है. बस एक बटन भर की दूरी है. इंटरनेट शुरु तो पूरी दुनिया के लोग एक ही स्क्रीन के भीतर. रात और दिन का भी कोई फ़र्क नहीं.

हाथ भर का फ़ासला

इंटरनेट पर लगातार काम करते रहने के बाद मैंने पाया कि इसने मुझे बदल दिया है. अब दुनिया एटलस की गोल दुनिया भर नज़र नहीं आती. वह एक जीवंत आइडेंटिटी के रुप में दिखती हैं.

अब भाषा, धर्म और जाति की दीवारें रास्ते में खड़ी नहीं दिखाई पड़तीं. दूरियों की परिभाषाएँ बदल गई हैं. सब कुछ मानों हाथ भर के फ़ासले पर है.

सब कुछ सिमट रहा था. दूरियाँ सिमट रहीं थीं और समय सिमट रहा था. और यह सब कुछ इंटरनेट की वजह से हो रहा था.

कुछ लोगों को लगता है कि इसने प्राइवेसी या निजता को ख़त्म कर दिया है. लैपटॉप खोला और अचानक ही पूरी दुनिया के सामने होते हैं. इससे कौन इनकार कर सकता है कि इंटरनेट ने प्रत्यक्ष और परोक्ष का अंतर ख़त्म कर दिया है.

लेकिन इसी बीच मैंने इंटरनेट का मानवीय पहलू देखा. जो अख़बार मानवीय सा दिखता था उसने मुझे अपने परिवार से छीन लिया था. लेकिन बहुत तकनीकी और मशीनी से दिखने वाले इंटरनेट ने मुझे मेरा परिवार लौटा दिया.

अब मैं अपने परिवार के साथ ज़्यादा समय बिता पाता हूँ. जब मन होता है, दफ़्तर जाने की बजाय बच्चों के साथ खाना खाते हुए घर से काम करता हूँ. दूर शहरों में रहने वाली बहनों और मित्रों से निरंतर संपर्क में रहता हूँ. इंटरनेट के ज़रिए पुराने मित्रों से किसी साइबर चौराहे पर अक्सर टकरा ही जाता हूँ. नए मित्र मिल रहे हैं.

मेरे पिता को भी नहीं लगता कि वह बंगलौर में मेरे साथ रहते हुए मुंबई और कोरबा में रह रहीं अपनी बेटियों से दूर हैं.

अब यह कल्पना भी कठिन है कि इंटरनेट के बिना दुनिया कैसी होगी या इंटरनेट के बिना मेरा जीवन कैसा होगा.

और यह भी कल्पना से परे है कि अब इंटरनेट के बिना दुनिया का कारोबार कैसे चलेगा. अब तो इंटरनेट ही दुनिया है.

(यह आलेख बीबीसी की विशेष श्रृंखला 'सुपरपावर' का हिस्सा है जिसमें यह जानने की कोशिश की जा रही है कि इंटरनेट ने दुनिया को किस तरह प्रभावित किया है.)

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