अब होगा नींद की बीमारी का इलाज

  • 1 अप्रैल 2010
Image caption यह दवा मनुष्य पर परीक्षण के लिए डेढ़ साल में तैयार हो जाएगी.

वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने नींद की बीमारी के एक कारगर इलाज की पहचान की है.

इस बीमारी से हर साल अफ़्रीका में क़रीब 60 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है.

ब्रिटेन और कनाडा के विशेषज्ञों ने कहा है कि यह दवा उस परजीवी के एंजाइम पर हमला कर सकती है जिससे यह बीमारी होती है.

विशेषज्ञों के मुताबिक़ अगले डेढ़ साल में यह दवा मनुष्यों पर परीक्षण के लिए तैयार हो सकती है.

मक्खी है कारण

नींद की बीमारी एक मक्खी के काटने से फैलती है और यह इसके परिजीवी के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर हमले के कारण होती है.

मलेरिया जैसे मिलते-जुलते लक्षण के कारण इसका इलाज़ कठिन हो जाता है. कई बार इलाज भी नहीं हो पाता है. इसका असर रीढ़ की हड्डी और दिमाग पर पड़ता है जिससे मानसिक भ्रम पैदा होता है और कई बार मरीज की मौत भी हो जाती है.

यह सफलता डंडी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को मिली है जिन्हें इस बीमारी पर शोध करने के लिए पैसा दिया गया. इस बीमारी की दवा कंपनियाँ अनदेखी कर देती हैं.

इस परियोजना के निदेशक प्रोफ़ेसर पॉल ब्यात कहते हैं, ''उपेक्षित बीमारियों के लिए दवा खोजने की दिशा में हाल के वर्षों में यह एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज है. ''

उन्होंने बताया कि यह शोध वैज्ञानिक शोध पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित हुआ है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर साल इस बीमारी के 50 से 70 हज़ार मामले सामने आते हैं और भविष्य में इससे छह करोड़ लोग संक्रमित हो सकते हैं.

शोध के लिए ब्रिटेन के यॉर्क विश्वविद्यालय और कनाडा के स्ट्रक्चरल जीनोमिक्स कंसोर्टियम ने मदद दी.

कारगर दवा

इस समय दो दवाएँ नींद की बीमारी के इलाज के लिए उपलब्ध हैं लेकिन दोनों के साथ कुछ समस्याएँ भी जुड़ी हुई हैं.

इनमें से एक है आर्सेनिक पर आधारित दवा. इसके दुष्प्रभाव भी हैं और इससे 20 में से एक मरीज की मौत तक हो सकती है. दूसरी दवा है इफ़्लोरोइथाइन, जो बहुत महँगी है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बहुत अधिक प्रभावी भी नहीं है और इससे इलाज से मरीज़ को बहुत अधिक समय तक अस्पताल में रहना पड़ता है.

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