ई कचरा क़ानून में मज़दूर शामिल हों

ई कचरा
Image caption देश में हर वर्ष साढ़े तीन लाख टन ई कचरा निकलता है.

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट का कहना है कि भारत में इलेक्ट्रानिक कचरे के प्रबंधन संबंधी नए क़ानून में अंसगठित क्षेत्र के मज़दूरों को शामिल करना अत्यंत ज़रुरी है.

सीएसई ने अपने एक शोध में कहा है कि देश में ई कचरे को तोड़ने, रिसाइक्ल करने और उसमें से महत्वपूर्ण धातु निकालने के काम में असंगठित क्षेत्र के हज़ारों मज़दूर काम कर रहे हैं जबकि सरकार के प्रस्ताव में इनके लिए कोई जगह नहीं है.

भारत में हर वर्ष अनुमानित साढ़े तीन लाख टन ई कचरा निकलता है लेकिन देश में इलेक्ट्रानिक कचरे से जुड़ा कोई क़ानून नहीं है लेकिन हाल ही में इससे जुड़ा मसौदा प्रस्ताव लाया गया है. हालांकि इस मसौदे में अंसगठित मज़दूरों की कोई भूमिका नहीं रखी गई है.

सीएसई का कहना है कि सरकार ने भारत में जिस एकमात्र कंपनी को ई कचरे की पूरी रिसाइक्लिंग की अनुमति दी है वो भी ये काम ठीक से नहीं कर रही है.

सीएसई के एसोसिएट निदेशक चंद्रभूषण बताते हैं, ‘‘भारत में एकमात्र कंपनी अटेरो है जिसे ये लाइसेंस मिला है लेकिन हमारी जांच के अनुसार वो भी अपना काम ठीक से नहीं कर रही है. रिसाइक्लिंग की बजाय कंपनी ई कचरे को अंसगठित क्षेत्र के लोगों को बेच रही है. यह ग़लत है.’’

हालांकि अटेरो के प्रतिनिधि नितिन गुप्ता इन आरोपों को ख़ारिज़ करते हुए कहते हैं, ‘‘ ऐसा बिल्कुल नहीं है. हमारे लाइसेंस में कहा गया है कि हम ई कचरे को रीफर्बिश करके यानी ठीक ठाक कर के बेच सकते हैं. वही हम करते हैं बाकी जो उपयोग नहीं हो सकता है उसमें से ज़रुरी पदार्थ निकाल लेते हैं.’’

असल में ई कचरा वो सारी चीज़ें हैं जो हम आम तौर पर घरों में इस्तेमाल करते हैं. मसलन टीवी, फ्रिज, कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन, वाशिंग मशीन. इन मशीनों में सोना, कोबाल्ट, चाँदी, कैडमियम और कई अन्य धातुओं का प्रयोग होता है जिन्हें निकालने की प्रक्रिया काफ़ी कठिन और नुकसानदेह होती है.

सीएसई के टाक्सिन मामलों के जानकारी कुशल यादव कहते हैं, ‘‘देश में असंगठित क्षेत्र के मज़दूर ये काम कर रहे हैं जो बहुत ख़तरनाक है. ये काम कंपनियों में मशीनों से होना चाहिए. इन धातुओं के निकालने की प्रक्रिया के दौरान कई प्रकार की बीमारियां होती हैं. इसलिए हम चाहते हैं कि लोगों को इस काम से हटाया जाए.’’

तो क्या लोग बेरोज़गार नहीं होंगे. चंद्रभूषण कहते हैं, ‘‘ नहीं नहीं.. हम चाहते हैं कि ई कचरे को जमा करने और प्राथमिक रीसाइक्लिंग में उनकी बड़ी भूमिका हो लेकिन आगे जो प्रक्रिया होती है धातुओं को निकालने की जो ख़तरनाक होती है उस काम से उन्हें अलग किया जाए और उसके लिए सरकार कोई बड़ी व्यवस्था करे. ’’

भारत में दिन प्रतिदिन कंप्यूटरों और मोबाइलों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन इससे जो कचरा बन रहा है उसके प्रबंधन के लिए न तो कठोर क़ानून हैं और न ही लोगों और सरकार में पर्याप्त जागरुकता. नए मसौदा प्रस्ताव के बाद कम से कम ई कचरे के प्रबंधन का एक क़ानून बनेगा लेकिन आने वाले दिनों में इसमें और सुधार की ज़रुरत पड़ेगी.

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